सत्य भूषण शर्मा
आज के समय में निजी विद्यालय शिक्षा का एक बड़ा आधार बन चुके हैं। चमचमाती इमारतें, अंग्रेज़ी माध्यम का आकर्षण, आधुनिक सुविधाएँ और ऊँची फीस वाले इन विद्यालयों की सफलता के पीछे यदि किसी का सबसे बड़ा योगदान है, तो वह है वहाँ कार्यरत शिक्षक। दुर्भाग्य से यही शिक्षक आज सबसे अधिक उपेक्षित, असुरक्षित और मानसिक दबाव से ग्रस्त दिखाई देता है। “निजी विद्यालय के शिक्षक की विवशता” केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का कटु यथार्थ है।
एक निजी विद्यालय का शिक्षक सुबह से शाम तक विद्यार्थियों के भविष्य को सँवारने में लगा रहता है। वह पाठ पढ़ाने के साथ-साथ परीक्षा कार्य, रिकॉर्ड संधारण, ऑनलाइन पोर्टल, अभिभावक मीटिंग, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रवेश अभियान और विद्यालय की छवि सुधारने जैसे अनेक कार्य करता है। इसके बावजूद उसे वह सम्मान और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल पाती, जिसकी वह वास्तविक रूप से अपेक्षा रखता है।
अधिकांश निजी विद्यालयों में शिक्षकों को असंगत वेतन दिया जाता है। कई स्थानों पर तो स्थिति यह है कि शिक्षक से अधिक वेतन का हस्ताक्षर करवाकर हाथ में कम राशि थमा दी जाती है। कुछ विद्यालयों में समय पर वेतन भी नहीं मिलता। महँगाई के इस दौर में परिवार का पालन-पोषण, बच्चों की शिक्षा, घर का किराया और सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाना शिक्षक के लिए अत्यंत कठिन हो जाता है। आर्थिक असुरक्षा उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करती है।
विडम्बना यह भी है कि जिस शिक्षक से अनुशासन, नैतिकता और आदर्शवाद की अपेक्षा की जाती है, उसी के श्रम का उचित मूल्यांकन नहीं होता। नौकरी जाने का भय हर समय उसके सिर पर मंडराता रहता है। यदि शिक्षक विद्यालय प्रशासन की किसी अनुचित बात का विरोध करे, तो उसे आसानी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कई विद्यालयों में नियुक्ति पत्र तक नहीं दिए जाते, जिससे शिक्षक कानूनी अधिकारों से भी वंचित रह जाता है।
निजी विद्यालयों में कार्यरत महिला शिक्षिकाओं की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। उन्हें घर और विद्यालय दोनों की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। मातृत्व अवकाश, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सुरक्षित कार्य वातावरण जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की कमी कई बार उनकी समस्याओं को और बढ़ा देती है।
कोविड-19 महामारी के समय यह विवशता और अधिक स्पष्ट होकर सामने आई। अनेक शिक्षकों का वेतन घटा दिया गया, कुछ को बिना सूचना नौकरी से निकाल दिया गया। ऑनलाइन शिक्षा के दौरान शिक्षकों ने अपने निजी संसाधनों का उपयोग कर विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखी, फिर भी उनकी समस्याओं पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई।
यह भी एक कटु सत्य है कि समाज में निजी विद्यालयों के शिक्षक को वह प्रतिष्ठा नहीं मिलती, जो सरकारी शिक्षक को सहज रूप से प्राप्त हो जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि निजी विद्यालय का शिक्षक भी उतनी ही मेहनत और समर्पण से विद्यार्थियों को शिक्षित करता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और संस्कारों का विकास भी है, और इस कार्य में निजी विद्यालयों के शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सरकार और समाज दोनों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। निजी विद्यालयों में शिक्षकों के लिए न्यूनतम वेतनमान सुनिश्चित होना चाहिए। नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो, सेवा सुरक्षा मिले, समय पर वेतन दिया जाए तथा शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए। शिक्षा को व्यवसाय नहीं, राष्ट्र निर्माण का माध्यम मानकर नीतियाँ बनाई जानी चाहिए।
एक शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाता, वह भविष्य गढ़ता है। यदि वही शिक्षक असुरक्षा, अपमान और आर्थिक तंगी में जीवन बिताने को मजबूर होगा, तो शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। इसलिए समय की मांग है कि निजी विद्यालयों के शिक्षकों की समस्याओं को समझा जाए और उन्हें सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ।





