जनादेश में दिखा हिंदुत्व का नया चेहरा

The new face of Hindutva was seen in the mandate

देवेन्द्र नाथ राय
वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने आ गए हैं। इनमें से पश्चिम बंगाल के परिणाम भारत की राजनीति में दूरगामी प्रभाव डालने वाले साबित हुए हैं। यहां की जनता ने तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करके भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जनादेश दिया है।

राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस राज्य की जनता ने हिंदुत्ववादी ताकतों को सत्ता सौंपकर हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच लंबे समय से चली आ रही उस वैचारिक धारा को उभार दिया है, जो कालांतर में दब गई थी। वह धारा सबको साथ लेकर चलने वाली है और भारत वर्ष की सनातन संस्कृति की यही तासीर रही है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि बंगाल में भाजपा और संघ परिवार के हिंदुत्व को जो मानने वाले लोग इस धारा के प्रवाह को भविष्य में पुष्ट करेंगे।

आज एक टीवी चैनल पर पश्चिम बंगाल का एक आम मुसलमान यह कह रहा था कि मैं पांच वक्त का नमाजी हूं। कुरान और हदीस में मेरा पूरा विश्वास है। मुझे “वन्दे मातरम्” बोलने में कोई हर्ज नहीं है। इसके बाद उसके आसपास खड़ी भीड़ ने ऊंची आवाज में वन्दे मातरम् का जयघोष किया। इसके बाद उसने अपने बगल में खड़े एक हिंदू व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि मंदिर में जब पूजा करने की नौबत आएगी तो उसके लिए मेरा भाई मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। यह बंगाल ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में जमीनी स्तर पर हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच सह-अस्तित्व का मूल बीज है। इस वैचारिक बीज को अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से दबा दिया था, जिसके परिणामस्वरूप भारत की भौगोलिक एकता खंडित हुई थी।

देश की सीमा से बाहर इस जनादेश की आवाज तो अवश्य पहुंचेगी, लेकिन फिलहाल देश के सभी दलों के रहनुमाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि देश के भीतर भी यह मजबूत हो। यहां विपक्ष की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह आत्मचिंतन करे और जनता की नब्ज को सही तरीके से पहचाने। ईवीएम और चुनाव आयोग को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहराने से काम नहीं चलने वाला है।

“वन्दे मातरम्” हमारा राष्ट्रगीत है। इसे पहली बार अक्षय नवमी के दिन 7 नवंबर, 1875 को बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा शुरू की गई साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित किया गया। बाद में इसे 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल करके प्रकाशित किया गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध किया था। वर्ष 1896 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् गाया। जल्द ही, इसके पहले दो पद कांग्रेस की सभाओं का एक नियमित हिस्सा बन गए। इतना ही नहीं यह गीत आज़ाद हिंद की अंतरिम सरकार की उद्घोषणा के समय भी गाया गया था। वर्ष 1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ को सर्व-भारतीय आयोजनों के लिये अपनाया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 नवंबर, 2025 को वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक वर्ष तक चलने वाले समारोहों का उद्घाटन किया और बाद में इसके पूरे अंश के गायन को सभी सरकारी कार्यक्रमों और विद्यालयों में अनिवार्य करने का आदेश जारी किया। कुछ लोगों को अभी भी इसे पूरा गाने में आपत्ति है, क्योंकि उनके मजहब में इसकी अनुमति नहीं है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, 150 साल पहले उन्हीं के पूर्वजों ने हिंदुओं के कंधे से कंधा मिलाकर इस गीत को गाया था।

यह इतिहास आज एक बार फिर से हमारे सामने खड़ा है। यह इतिहास ही हमारे उज्जवल भविष्य का सबसे उत्तम रास्ता दिखाता है। इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि देश के मुस्लिम समाज की कुछ कट्टरपंथी ताकतें “वंदे मातरम्” के पूर्ण गायन को मजहब के विरुद्ध मानती हैं। पिछले कुछ दशकों के दौरान इन ताकतों की आवाज बढ़ी हुई थी, जिसे बंगाल के ताजा जनादेश ने खारिज कर दिया है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि बंगाल के जनादेश के 151 वर्ष पहले बंगाल की जमीन से उठी “वन्दे मातरम्” की आवाज एक दिन पूरे हिंदू मुस्लिम समाज की आवाज बनकर टुकड़ों में बंटे मानव समाज को दिशा देगी।