प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
हर युग अपने प्रतीक स्वयं गढ़ता है। कभी कोई शब्द अपमान का पर्याय होता है और कभी वही शब्द परिवर्तन का ध्वज बन जाता है। हाल के दिनों में भारतीय लोकतंत्र ने यही देखा, जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की एक टिप्पणी में प्रयुक्त ‘कॉकरोच’ शब्द को युवाओं ने अपमान नहीं, पहचान बना लिया। देखते ही देखते वही कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का प्रतीक बन गया। जंतर-मंतर से उठी यह आवाज़ न किसी राजनीतिक दल की रैली थी, न पारंपरिक छात्र आंदोलन; यह उस पीढ़ी का सामूहिक प्रतिरोध था, जिसने वर्षों तक परीक्षाएँ दीं, लेकिन पहली बार परीक्षा लेने वाली व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए केवल पदत्याग नहीं, बल्कि उस शिक्षा तंत्र के विरुद्ध पहला सार्वजनिक अभियोग है, जिसकी जवाबदेही लंबे समय से टलती रही।
विचार जब व्यंग्य का वस्त्र पहन ले, सत्ता सबसे अधिक असहज होती है। भारतीय छात्र आंदोलनों का इतिहास नारों, धरनों और टकरावों से भरा है, लेकिन सीजेपी ने प्रतिरोध की नई व्याकरण रची। जिस शब्द को अपमान माना गया, युवाओं ने उसे अपनी पहचान बना लिया। यह भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, मनोवैज्ञानिक विजय थी। महात्मा गांधी ने जैसे नमक को साम्राज्यवादी कानून के विरुद्ध नैतिक हथियार बनाया, वैसे ही इन युवाओं ने उपहास को अपनी ताकत बना लिया। पहली बार किसी व्यंग्यात्मक नाम ने राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बन यह साबित किया कि डिजिटल युग में प्रतीक बंदूक नहीं, बुद्धिमत्ता गढ़ती है और सम्मान दूसरों की भाषा नहीं, आत्मविश्वास से मिलता है।
हँसी कभी-कभी आँसुओं से अधिक क्रांतिकारी होती है। सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका ह्यूमर था। जहाँ पारंपरिक आंदोलनों में गुस्सा भीड़ जुटाता है, वहीं मीम्स, रील्स, व्यंग्यपूर्ण पोस्टरों और ‘कीड़े’ की थीम ने लाखों युवाओं को जोड़ दिया। पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज, बढ़ते तनाव और सोशल मीडिया ट्रोलिंग के बावजूद आंदोलन ने अपनी मुस्कान नहीं छोड़ी। यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता थी। सूचना युग में इन युवाओं ने साबित किया कि विचार केवल भाषणों से नहीं, रचनात्मक अभिव्यक्ति से भी फैलते हैं। यहाँ ह्यूमर मनोरंजन नहीं, प्रतिरोध की रणनीति था, जिसने आक्रोश को अराजकता बनने से रोका और आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन दिलाया।
भविष्य की भूख सबसे बड़ी राजनीतिक ऊर्जा होती है। सीजेपी की दूसरी ताकत उसका हंगर था—सत्ता परिवर्तन से अधिक भरोसेमंद शिक्षा व्यवस्था की भूख। नीट पेपर लीक, बार-बार परीक्षाओं का रद्द होना, परिणामों में देरी, कोचिंग माफिया का बढ़ता प्रभाव और विद्यार्थियों की आत्महत्याएँ अलग-अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि उस टूटते विश्वास के प्रमाण थीं, जिसे ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवार अपनी उम्मीद, बचत और संघर्ष से वर्षों से सँजोए हुए थे। सीजेपी ने इसी मौन पीड़ा को संगठित किया। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस भूख की महत्वपूर्ण राजनीतिक अभिव्यक्ति है, लेकिन असली सवाल अब भी यही है—क्या केवल चेहरा बदलेगा या व्यवस्था का चरित्र भी?
नीति की सबसे कठिन परीक्षा वही होती है, जिसमें प्रश्न जनता पूछती है। नीट की अवधारणा गलत नहीं थी। पूरे देश के लिए एक समान परीक्षा, मेरिट आधारित चयन और पारदर्शिता उसका उद्देश्य था। लेकिन श्रेष्ठ विचार भी क्रियान्वयन पर लगातार उठते संदेहों से अविश्वसनीय हो जाते हैं। पेपर लीक, परीक्षा रद्द, तकनीकी अव्यवस्था और विलंब ने इस सुधार को संकट में बदल दिया। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का संकेत हो सकता है, लेकिन भारतीय शिक्षा की बीमारी कहीं अधिक गहरी है। सीबीआई जाँच, दोषियों की गिरफ्तारी, परीक्षा रद्द करना और सीबीटी (कंप्यूटर आधारित परीक्षा) आवश्यक कदम हैं, पर वे लक्षणों का उपचार हैं, रोग का नहीं। असली बीमारी उस संरचना में है, जहाँ करोड़ों विद्यार्थियों का भविष्य एक केंद्रीकृत परीक्षा पर टिका है।
जब शिक्षा नियंत्रण का औजार बन जाए, प्रतिभा सबसे पहले घायल होती है। हमारी व्यवस्था आज भी कंट्रोल एंड कमांड मॉडल पर चल रही है। छात्र की जिज्ञासा से अधिक रैंक, और विद्यालयों की गुणवत्ता से अधिक प्रवेश परीक्षा की तैयारी को महत्व मिलता है। कोचिंग उद्योग शिक्षा का पूरक नहीं, समानांतर सत्ता बन चुका है। सफलता का अर्थ सीखना नहीं, चयनित होना रह गया है। ऐसे में प्रश्न है—क्या हमारी शिक्षा छात्र-केंद्रित है या परीक्षा-केंद्रित? क्या हम ज्ञान, कौशल, अनुसंधान और सृजनशीलता विकसित कर रहे हैं, या लाखों युवाओं को एक विशाल फ़िल्टर से गुजार रहे हैं? यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल छँटनी रह जाएगा, तो प्रतिभा का विस्तार संभव नहीं होगा। सीजेपी ने यही मूल प्रश्न राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रख दिया है।
साहस सबसे अधिक तब चमकता है, जब उसके पीछे कोई सिंहासन न हो। जंतर-मंतर पर डटे युवाओं ने लाठीचार्ज, मुकदमे और डिजिटल ट्रोलिंग झेली, फिर भी उद्देश्य से नहीं डिगे। इस आंदोलन के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं था। अभिजीत दिपके जैसे युवा चेहरे उभरे, लेकिन नेतृत्व सामूहिक रहा। यही नई पीढ़ी का संदेश है—वह किसी मसीहा की प्रतीक्षा नहीं करती, स्वयं मंच बनाती है। हर जनआंदोलन का खतरा यही है कि उसके शांत होते ही पुरानी व्यवस्था लौट आती है। सीजेपी ने केवल इस्तीफा नहीं, बल्कि क्षतिपूर्ति, दर्ज मामलों की वापसी और व्यापक सुधारों की भी मांग की। यदि इन्हें केवल तत्कालिक शांति का उपाय माना गया, तो विफलता लौटेगी। इसलिए परीक्षा सुरक्षा में ब्लॉकचेन जैसी पारदर्शी तकनीक, कोचिंग उद्योग पर प्रभावी नियमन, विद्यालयों-महाविद्यालयों की गुणवत्ता और वैकल्पिक करियर पाथवे जैसे दीर्घकालिक सुधार अब अनिवार्य हैं।
किसी भी आंदोलन की असली जीत सत्ता नहीं, सोच बदलने में होती है। सीजेपी ने भारतीय लोकतंत्र और शिक्षा व्यवस्था को आईना दिखाया। उसने साबित किया कि जिन्हें कभी ‘कीड़ा’ कहकर तुच्छ समझा गया, वही बदलाव की उड़ान बन सकते हैं। यह आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति का प्रोटोटाइप है, जहाँ भारी-भरकम संगठनों की जगह मुद्दा-आधारित, रचनात्मक नागरिक आंदोलन सत्ता से जवाब मांगेंगे। भारतीय शिक्षा की सबसे बड़ी फेलियर रिपोर्ट प्रश्नपत्र लीक नहीं, बल्कि वह सोच है जिसने युवाओं को प्रतियोगिता का बंदी बना दिया, सृजन का स्वामी नहीं। अब परीक्षा नीट की नहीं, नीति की है; जवाब पूरे तंत्र को देना है। यदि व्यवस्था यह संदेश समझ ले, तो ‘कॉकरोच’ केवल प्रतीक नहीं, बल्कि ह्यूमर, हंगर और हिम्मत से बदलाव की पहचान बन जाएंगे।





