एन जी भट्ट
देश में “वन नेशन, वन इलेक्शन” की अवधारणा पर राष्ट्रीय बहस के बीच राजस्थान में अब “वन स्टेट, वन इलेक्शन” की चर्चा तेज हो गई है। राज्य सरकार स्थानीय स्वशासन संस्थाओं—नगर निगम, नगर परिषद, नगर पालिका तथा जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायतों—के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं पर विचार कर रही है। यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो राजस्थान चुनावी प्रबंधन में देश के लिए एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन इस महत्वाकांक्षी अवधारणा को लागू करने से पहले कई संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियों का समाधान आवश्यक होगा।
इस विषय को राजस्थान हाई कोर्ट के हालिया रुख ने भी नई दिशा दी है। स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में हो रही देरी पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव अनावश्यक रूप से टालना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। अदालत ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को समयबद्ध ढंग से परिसीमन, आरक्षण, मतदाता सूची पुनरीक्षण तथा अन्य आवश्यक प्रक्रियाएँ पूरी कर चुनाव कराने की अपेक्षा जताई। न्यायालय का स्पष्ट संदेश था कि प्रशासनिक कठिनाइयाँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक स्थगित करने का आधार नहीं बन सकतीं।
दरअसल, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-यू पंचायतों और नगरीय निकायों का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में कार्यकाल समाप्त होने से पहले अथवा संविधान के अनुरूप निर्धारित अवधि के भीतर नए चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग का दायित्व है। यही कारण है कि न्यायपालिका समय पर चुनाव कराने को लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा मानती है।
वर्तमान व्यवस्था में राजस्थान के अधिकांश स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल अलग-अलग समय पर समाप्त होता है। परिणामस्वरूप लगभग पूरे वर्ष किसी न किसी स्तर पर चुनावी गतिविधियाँ चलती रहती हैं। इससे प्रशासनिक मशीनरी, पुलिस बल और हजारों सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी दायित्व निभाने पड़ते हैं। आदर्श आचार संहिता बार-बार लागू होने से विकास कार्यों और नीतिगत निर्णयों की गति भी प्रभावित होती है।
इसी पृष्ठभूमि में “वन स्टेट, वन इलेक्शन” का विचार आकर्षक प्रतीत होता है। यदि सभी स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ हों तो चुनावी खर्च में कमी आएगी, प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, सुरक्षा प्रबंधन अधिक प्रभावी होगा तथा सरकारी मशीनरी को बार-बार चुनावी प्रक्रिया में नहीं लगाना पड़ेगा। मतदाताओं को भी एक ही चरण में अपने सभी स्थानीय प्रतिनिधियों का चुनाव करने का अवसर मिलेगा।
लेकिन इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग कार्यकाल वाले निकायों को एक समान चुनावी चक्र में लाना है। इसके लिए कुछ निकायों का कार्यकाल घटाना या बढ़ाना पड़ सकता है, जो संवैधानिक और कानूनी परीक्षण का विषय बनेगा। इसके अतिरिक्त यदि कोई नगर निकाय या पंचायत बीच कार्यकाल में भंग हो जाए, अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए अथवा न्यायालय के आदेश से उसका कार्यकाल प्रभावित हो, तो ऐसी स्थिति में साझा चुनावी चक्र को कैसे बनाए रखा जाएगा, इसका स्पष्ट समाधान भी आवश्यक होगा।
राजनीतिक दृष्टि से भी इस प्रस्ताव पर व्यापक सहमति बनाना आसान नहीं होगा। स्थानीय निकायों के चुनाव स्थानीय समस्याओं और विकास के मुद्दों पर आधारित होते हैं। आशंका यह भी व्यक्त की जाती है कि सभी चुनाव एक साथ होने पर स्थानीय मुद्दे बड़े राजनीतिक विमर्श के प्रभाव में आ सकते हैं। दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि बार-बार चुनाव और आचार संहिता से शासन व्यवस्था प्रभावित होती है, इसलिए चुनावी कैलेंडर का एकीकरण समय की आवश्यकता है।
राजस्थान यदि वास्तव में “वन स्टेट, वन इलेक्शन” की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है तो उसे राज्य निर्वाचन आयोग, विधि विशेषज्ञों, सभी राजनीतिक दलों और स्थानीय निकायों से व्यापक परामर्श करना होगा। न्यायालय की समयबद्ध चुनाव कराने की अपेक्षा, संविधान की मर्यादा और प्रशासनिक व्यवहार्यता—इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित किए बिना यह व्यवस्था सफल नहीं हो सकती।
स्पष्ट है कि “वन स्टेट, वन इलेक्शन” केवल चुनावों की तिथियाँ बदलने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र को अधिक प्रभावी, कम खर्चीला और प्रशासनिक दृष्टि से सक्षम बनाने का एक व्यापक सुधार है। यदि राजस्थान इस दिशा में संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप आगे बढ़ता है, तो वह स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था में देश के लिए एक नई मिसाल कायम कर सकता है।





