महेन्द्र तिवारी
खेलों की दुनिया में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो जाते हैं। ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने ठीक ऐसा ही एक स्वर्णिम अध्याय लिखा है। जब रिंग में भारत के मुक्केबाज उतर रहे थे तो उनके चेहरों पर एक अलग ही आत्मविश्वास और आंखों में जीत की अचूक चमक थी। यह चमक केवल एक दिन की मेहनत का परिणाम नहीं थी बल्कि इसके पीछे सालों का पसीना, अनगिनत संघर्ष और वैश्विक पटल पर खुद को साबित करने की अदम्य इच्छाशक्ति छिपी थी। भारतीय दल ने इस बार बॉक्सिंग इवेंट के दस फाइनल मुकाबलों में हिस्सा लिया और सभी दस में पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि भारतीय मुक्केबाजी अब एक नए मुकाम पर पहुंच चुकी है। सात स्वर्ण और तीन रजत पदक जीतना कोई सामान्य बात नहीं है। यह राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में भारत का अब तक का सबसे बेहतरीन मुक्केबाजी प्रदर्शन है जिसने देश का सिर फक्र से ऊंचा कर दिया है।
इस ऐतिहासिक सफलता को केवल पदकों की संख्या से नहीं आंका जा सकता है। इसके पीछे भारत के छोटे शहरों, गांवों और कस्बों से निकलकर आई उन प्रतिभाओं की कहानी है जिन्होंने तमाम अभावों के बावजूद अपने सपनों को मरने नहीं दिया। जब हम मुक्केबाजी की बात करते हैं तो हरियाणा के भिवानी और रोहतक जैसे शहरों का जिक्र आना स्वाभाविक है लेकिन इस बार पदक विजेताओं की सूची इस बात की गवाही देती है कि अब खेल का यह जुनून पूरे देश में फैल चुका है। भारतीय मुक्केबाजी महासंघ की दूरदर्शी नीतियां, सरकार का निरंतर समर्थन और प्रशिक्षकों की दिन रात की मेहनत ने मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है जहां अब केवल हिस्सा लेने के लिए नहीं बल्कि जीतने के लिए खिलाड़ी रिंग में उतरते हैं। इस बार का प्रदर्शन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारतीय मुक्केबाज अब तकनीकी और शारीरिक दोनों ही मोर्चों पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को धूल चटाने का माद्दा रखते हैं।
इस अभूतपूर्व सफलता में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात भारतीय महिला मुक्केबाजों का दबदबा रहा है। महिला वर्ग में भारत ने पांच अलग-अलग भार वर्गों में सीधे स्वर्ण पदक अपने नाम किए जो महिला सशक्तिकरण की एक जीती जागती मिसाल है। इक्यावन किलोग्राम भार वर्ग में साक्षी चौधरी, चौवन किलोग्राम में प्रीति पवार, सत्तावन किलोग्राम में जैस्मिन लंबोरिया, साठ किलोग्राम में प्रिया घंघस और सत्तर किलोग्राम भार वर्ग में अरुंधति चौधरी ने जिस आक्रामकता और तकनीकी कौशल का प्रदर्शन किया उसने पूरी दुनिया के खेल पंडितों को चकित कर दिया। इन महिला खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि भारतीय बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। उनके घूंसे केवल विरोधी खिलाड़ियों पर ही नहीं पड़े बल्कि समाज की उन रूढ़िवादी सोच पर भी पड़े हैं जो लड़कियों को चारदीवारी में सीमित रखना चाहती है। रिंग के अंदर उनकी फुर्ती, सटीक फुटवर्क और सही समय पर पंच मारने की कला ने उन्हें अजेय बना दिया। यह जीत भारत की हर उस युवा लड़की के लिए एक प्रेरणा है जो अपने लिए एक बड़ा सपना देखने की हिम्मत जुटा रही है।
पुरुष वर्ग में भी भारतीय मुक्केबाजों ने अपने शानदार प्रदर्शन से पदकों की झड़ी लगा दी। साठ किलोग्राम भार वर्ग में सचिन सिवाच और अस्सी किलोग्राम भार वर्ग में अंकुश पंघाल ने स्वर्ण पदक जीतकर यह संदेश दिया कि भारतीय पुरुष मुक्केबाजी का भविष्य अत्यंत सुरक्षित और उज्ज्वल है। इन दोनों युवा खिलाड़ियों ने रिंग में जिस संयम और आक्रामकता का संतुलन दिखाया वह देखने लायक था। उन्होंने अपने विरोधियों को कोई मौका नहीं दिया और अपनी अचूक रणनीतियों से मुकाबलों को एकतरफा बना दिया। इसके अलावा पचपन किलोग्राम में जदुमणि सिंह और नब्बे प्लस किलोग्राम भार वर्ग में नरेंद्र बेरवाल ने भी रजत पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया। यह रजत पदक भी सोने से कम नहीं हैं क्योंकि उन्होंने फाइनल तक के सफर में दुनिया के कई दिग्गज मुक्केबाजों को मात दी थी। उनका यह प्रदर्शन आने वाले विश्व कप और ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों के लिए एक मजबूत नींव का काम करेगा।
अनुभवी खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी इस दल की एक बड़ी ताकत रहा। ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने पचहत्तर किलोग्राम भार वर्ग में रजत पदक जीतकर अपनी निरंतरता साबित की। खेल में उतार चढ़ाव आते रहते हैं और कई बार फाइनल मुकाबले बहुत ही करीबी अंतर से छूट जाते हैं लेकिन लवलीना का पोडियम तक पहुंचना यह बताता है कि उनके अंदर अभी भी खेल के प्रति वही पुरानी आग बाकी है। उनकी उपस्थिति मात्र से ही युवा खिलाड़ियों को बहुत कुछ सीखने को मिला होगा। एक वरिष्ठ खिलाड़ी के रूप में उन्होंने पूरे दल का मार्गदर्शन किया और उनका यह अनुभव भविष्य की प्रतियोगिताओं में भारत के लिए बहुत उपयोगी साबित होने वाला है।
इस जीत के पीछे के विज्ञान और तकनीकी पहलुओं को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आज के दौर में मुक्केबाजी केवल ताकत का खेल नहीं रह गया है। यह दिमाग, तकनीक, स्पोर्ट्स साइंस और वीडियो एनालिटिक्स का एक जटिल मिश्रण बन चुका है। भारतीय मुक्केबाजों की इस सफलता के पीछे उनके कोच और सपोर्ट स्टाफ का एक बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने हर विरोधी खिलाड़ी की कमजोरियों का बारीकी से अध्ययन किया और उसी के अनुसार रणनीतियां बनाईं। खिलाड़ियों की डाइट से लेकर उनकी मानसिक सेहत तक हर छोटी-छोटी बात का ख्याल रखा गया। हाल ही में खेलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा जो भारी भरकम बजट आवंटित किया गया है उसका असर अब जमीन पर दिखने लगा है। जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को तराशने की जो मुहिम शुरू की गई थी वह अब वटवृक्ष का रूप ले रही है। जब किसी एथलीट को विश्व स्तरीय सुविधाएं मिलती हैं तो उसका आत्मविश्वास अपने आप बढ़ जाता है और यही आत्मविश्वास हमें ग्लासगो के बॉक्सिंग अरीना में देखने को मिला।
राष्ट्रमंडल खेलों में मुक्केबाजी के इस स्वर्णिम प्रदर्शन ने भारत की समग्र पदक तालिका में भी एक बड़ा उछाल ला दिया है। इसके कारण भारत अंक तालिका में शीर्ष देशों की कतार में मजबूती से खड़ा हो गया है। एक समय था जब भारत केवल शूटिंग या कुश्ती जैसे कुछ गिने चुने खेलों पर ही पदकों के लिए निर्भर रहता था लेकिन अब मुक्केबाजी ने भी खुद को एक प्रमुख खेल के रूप में स्थापित कर लिया है। यह बदलाव रातोंरात नहीं आया है। वर्ष दो हजार अठारह के गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने तीन स्वर्ण सहित कुल सात पदक जीते थे जो उस समय तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। लेकिन अब उस रिकॉर्ड को तोड़ते हुए दस पदक और उनमें भी सात स्वर्ण जीतना एक बहुत बड़ी छलांग है। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय खेल प्रणाली अब एक परिपक्व अवस्था में पहुंच चुकी है जहां हम अपने ही रिकॉर्ड को तोड़कर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।
इस ऐतिहासिक जीत का असर केवल पदक तालिका तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सबसे बड़ा प्रभाव भारत के उन लाखों युवाओं पर पड़ेगा जो खेल की दुनिया में अपना करियर बनाना चाहते हैं। जब देश का कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रध्वज लेकर खड़ा होता है और राष्ट्रगान बजता है तो वह पल पूरे देश को एक सूत्र में पिरो देता है। आज साक्षी, प्रीति, सचिन और अंकुश जैसे खिलाड़ी युवाओं के नए रोल मॉडल बन गए हैं। वे गांव और कस्बों में बने अखाड़ों और रिंग में पसीना बहा रहे बच्चों के लिए एक जीती जागती उम्मीद हैं। यह जीत खेल संस्कृति को एक नया आयाम देगी और माता पिता को भी यह विश्वास दिलाएगी कि खेलों में भी एक सुनहरा भविष्य बनाया जा सकता है। यह खेल संघों और प्रायोजकों को भी मुक्केबाजी में और अधिक निवेश करने के लिए प्रेरित करेगा जिससे आने वाले समय में हमें और भी बेहतर सुविधाएं और परिणाम देखने को मिलेंगे।
अंत में यह कहना बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ग्लासगो में भारतीय मुक्केबाजों ने जो किया है वह सदियों तक याद रखा जाएगा। सात स्वर्ण और तीन रजत पदक केवल धातु के टुकड़े नहीं हैं बल्कि यह भारतीय मुक्केबाजी की नई पहचान हैं। यह उस नए भारत की गूंज है जो विश्व पटल पर अब किसी से कमतर नहीं है। इन खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत से साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा में ईमानदारी से प्रयास किया जाए तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। अब निगाहें आगामी विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक खेलों पर टिकी होंगी। ग्लासगो की इस स्वर्णिम सफलता ने देशवासियों की उम्मीदों को आसमान पर पहुंचा दिया है और यह पूरी तरह से तय है कि हमारे मुक्केबाज आने वाली चुनौतियों के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। भारतीय मुक्केबाजी का यह स्वर्णिम युग अभी बस शुरू ही हुआ है और आने वाले समय में यह खेल दुनिया भर में भारत का नाम और भी रोशन करेगा।





