अशोक भाटिया
भारतीय राजनीति में पंजाब हमेशा से एक ऐसा राज्य रहा है जिसकी राजनीतिक हवाएं पूरे देश के मिजाज को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। सीमावर्ती सूबा होने के नाते यहाँ की राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक ताना-बाना और दिल्ली के साथ इसके रिश्ते हमेशा से राष्ट्रीय सुरक्षा और नीति-निर्धारण के केंद्र में रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में आम आदमी पार्टी के उदय के बाद पंजाब की पारंपरिक द्विदलीय राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है और मुख्यधारा के दल अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए छटपटा रहे हैं। ऐसे में, दिल्ली के राजनीतिक गलियारों से एक के बाद एक आए दो बड़े घटनाक्रमों ने पंजाब की सुलगती सियासत में घी डालने का काम किया है। पहली बड़ी घटना संसद भवन परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के बीच हुई औचक और बेहद गोपनीय मुलाकात है। इसके ठीक बाद, कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक हल्के-फुल्के सत्र के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान भाजपा नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को भाजपा में अपना सबसे पसंदीदा राजनेता बताकर सबको चौंका दिया। इन दोनों प्रसंगों ने केवल सतह पर ही नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीति की अंतर्धाराओं में एक नया ध्रुवीकरण शुरू कर दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम आने वाले चुनावों में देखने को मिलेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की इस मुलाकात के क्रोनोलॉजी और इसके पीछे की कूटनीति को समझना बेहद जरूरी है। सितंबर 2020 में जब केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानून लाए गए थे, तब देशव्यापी किसान आंदोलन के भारी दबाव के चलते अकाली दल को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अपना ढाई दशक पुराना नाता तोड़ना पड़ा था। वह अलगाव केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उसने पंजाब के ग्रामीण और सिख मतदाताओं के बीच अकाली दल की साख को भारी नुकसान पहुंचाया था। 2022 के विधानसभा चुनावों में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और परिणाम यह हुआ कि दोनों पार्टियां हाशिए पर चली गईं। अकाली दल मात्र तीन सीटों पर सिमट गया और भाजपा को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा। हालिया आंतरिक सर्वेक्षणों और जमीन से आ रही रिपोर्टों ने सुखबीर बादल को यह अहसास करा दिया है कि ग्रामीण पंजाब में कट्टरपंथी और पंथक ताकतों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, जिससे अकाली दल का पारंपरिक वोट बैंक खिसक रहा है। ऐसी स्थिति में, अकेले चुनाव लड़कर सत्ता में वापसी करना अकाली दल के लिए एक असंभव चुनौती बन चुका था।
सूत्रों के मुताबिक, इस गतिरोध को तोड़ने और प्रधानमंत्री मोदी के साथ सुखबीर बादल की इस मुलाकात की पटकथा लिखने में पड़ोसी राज्य हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। गुरुवार की देर रात प्रधानमंत्री कार्यालय से सुखबीर बादल को फोन जाना और अगले ही दिन दिल्ली में यह बैठक होना साफ संकेत देता है कि पर्दे के पीछे की बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। हालांकि, दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने इस बैठक को एक अनौपचारिक और पंजाब के ज्वलंत मुद्दों पर आधारित शिष्टाचार भेंट बताया है, लेकिन राजनीति में कोई भी मुलाकात बिना किसी ठोस निहितार्थ के नहीं होती। सुखबीर बादल ने प्रधानमंत्री के सामने भगवंत मान सरकार की कथित प्रशासनिक विफलता, राज्य में चरमराती कानून-व्यवस्था, नशीली दवाओं की बढ़ती समस्या, भर्ती परीक्षाओं में हो रहे पेपर लीक और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप जैसे गंभीर मुद्दों को रखा। लेकिन इस रणनीतिक संवाद का असली मकसद पंजाब के शहरी हिंदू मतदाताओं (जो भाजपा की ताकत हैं) और ग्रामीण सिख मतदाताओं ( जो अकाली दल का आधार रहे हैं) के पुराने सामाजिक-राजनीतिक गठजोड़ को पुनर्जीवित करना है, जिसने दशकों तक पंजाब को एक स्थिर शासन दिया था।
अभी राजनीतिक पंडित इस संभावित ‘घर वापसी’ के नफा-नुकसान का गणित लगा ही रहे थे कि राहुल गांधी के एक बयान ने राष्ट्रीय और प्रांतीय मीडिया की सुर्खियां बदल दीं। नई पीढ़ी के मतदाताओं और छात्रों के साथ इंस्टाग्राम पर आयोजित एक संवाद सत्र ‘आस्क मी एनीथिंग’ में जब राहुल गांधी से पूछा गया कि भाजपा में उनका सबसे पसंदीदा राजनेता कौन है, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम लिया। राहुल ने न केवल कैप्टन को बेहद “कूल” इंसान बताया बल्कि सैन्य इतिहास के क्षेत्र में उनके गहन ज्ञान की भी जमकर तारीफ की और हंसते हुए “हेलो, अंकल अमरिंदर” कहकर संबोधित किया। पहली नजर में यह एक बेहद अनौपचारिक और मानवीय टिप्पणी लग सकती है, लेकिन जब राजनीति के उच्चतम स्तर पर ऐसा कोई बयान आता है, तो उसके राजनीतिक संदेश बहुत गहरे होते हैं। यह वही कैप्टन अमरिंदर सिंह हैं जिन्हें 2021 में पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस आलाकमान ने बेहद अपमानजनक तरीके से मुख्यमंत्री पद से हटाया था, जिसके बाद उन्होंने भारी मन से कांग्रेस छोड़ी और अंततः भाजपा का दामन थाम लिया था।
राहुल गांधी का यह ‘कैप्टन मोह’ ऐसे समय में सामने आया है जब पंजाब कांग्रेस के भीतर अंदरूनी गुटबाजी और कलह एक बार फिर चरम पर है। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और अन्य गुटों के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है। राहुल गांधी के इस बयान ने राज्य के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और वर्तमान प्रांतीय नेताओं के बीच एक अजीब सी असहजता और दुविधा पैदा कर दी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी इस पर त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी की बड़प्पन की तारीफ की और याद दिलाया कि गांधी परिवार और पटियाला राजघराने के बीच के संबंध राजनीतिक उतार-चढ़ाव से परे हैं। कैप्टन और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी दून स्कूल में सहपाठी और गहरे दोस्त थे, और यह पारिवारिक वफादारी आज भी बची हुई है। हालांकि, कैप्टन ने तुरंत यह स्पष्ट कर दिया कि वे वैचारिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के प्रति समर्पित हैं, लेकिन इस बयान ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब की राजनीति में व्यक्तिगत संबंध आज भी राजनीतिक सीमाओं को लांघने की ताकत रखते हैं।
इन दोनों घटनाओं के समानांतर होने से पंजाब की राजनीति में एक त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले की नई तस्वीर उभर रही है। वर्तमान में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार पर पंजाब के फंड रोकने और ग्रामीण विकास कोष को फ्रीज करने का आरोप लगाकर लगातार क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड खेल रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार अपनी मुफ्त बिजली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के दम पर जमीन मजबूत बनाए रखने का दावा कर रही है, लेकिन कानून-व्यवस्था और वित्तीय कुप्रबंधन के मोर्चे पर वह लगातार विपक्ष के निशाने पर है। यदि भाजपा और अकाली दल का गठबंधन दोबारा जमीन पर उतरता है, तो यह सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी के उस वोट बैंक में सेंध लगाएगा जो अकाली दल के बिखरने के बाद उनकी तरफ शिफ्ट हुआ था। भाजपा के पास पंजाब में एक कद्दावर सिख चेहरे की कमी हमेशा से खलती रही है, और राहुल गांधी द्वारा कैप्टन अमरिंदर सिंह को दी गई यह ‘सर्टिफिकेट’ भाजपा के लिए पंजाब के सिख और राष्ट्रवादी मतदाताओं के बीच कैप्टन की स्वीकार्यता को और मजबूत करने का हथियार बन सकती है।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे पेचीदा पहलू यह है कि पंजाब का मतदाता अब बहुत सचेत और बदलाव की ओर झुका हुआ है। वह पारंपरिक दलों के खोखले वादों और अंतिम समय में किए जाने वाले गठबंधनों को बहुत बारीकी से देखता है। अकाली दल के लिए भाजपा के साथ दोबारा जाना एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहां उन्हें शहरी क्षेत्रों में वित्तीय और राजनीतिक मजबूती मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में उन्हें इस बात का जवाब देना होगा कि जिस भाजपा को उन्होंने किसानों का विरोधी बताकर छोड़ा था, उसके पास वे किस मजबूरी में वापस गए हैं। दूसरी ओर, भाजपा की राज्य इकाई का एक बड़ा धड़ा यह मानता है कि पार्टी को पंजाब में छोटे भाई की भूमिका से बाहर निकलकर सभी सीटों पर अकेले लड़ना चाहिए ताकि भविष्य के लिए एक स्वतंत्र आधार तैयार किया जा सके। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व व्यावहारिक राजनीति और सीमावर्ती राज्य की संवेदनशीलता को देखते हुए एक मजबूत और भरोसेमंद क्षेत्रीय साथी (अकाली दल) के साथ मिलकर चलना ज्यादा सुरक्षित समझता है।
देखा जाए तो मोदी-बादल मुलाकात और राहुल गांधी का कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रति उमड़ा यह प्रेम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय राजनीति अब पूरी तरह से व्यावहारिक और परिणाम-केंद्रित हो चुकी है, जहां पुरानी कड़वाहटों और वैचारिक मतभेदों की म्याद बहुत छोटी होती है। पंजाब की जनता इस समय आर्थिक मंदी, कृषि संकट, रोजगार के अभाव और युवाओं के बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन जैसे बुनियादी संकटों से जूझ रही है। राजनीतिक दलों के ये शीर्ष स्तर के पैंतरे और बयानबाजी तब तक जमीन पर रंग नहीं लाएगी जब तक कि वे पंजाब के इन बुनियादी मुद्दों का कोई ठोस रोडमैप लेकर जनता के बीच नहीं जाएंगे। दिल्ली में होने वाली इन मुलाकातों और सोशल मीडिया पर चलने वाले इन बयानों ने पंजाब की सियासी बिसात पर मोहरे तो सजा दिए हैं और राजनीतिक हलचल को भी चरम पर पहुंचा दिया है, लेकिन इस बिसात का असली सुल्तान कौन बनेगा, इसका फैसला अंततः पंजाब के खेतों, गांवों और शहरों की वो आम जनता ही करेगी जो फिलहाल शांति से इस पूरे सियासी ड्रामे को देख रही है।





