प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
किसी देश की सीमाएं केवल नक्शे की रेखाएं नहीं; वे मिट्टी, पानी, हवा और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा की चौकी हैं। जब समुद्र पार से आया जहाज माल नहीं, दूसरे देश का कचरा उगलता है, तो मामला सीमा शुल्क से उठकर राष्ट्र की अस्मिता तक पहुंच जाता है। जून 2026 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन बंदरगाह पर ‘वेस्ट पेपर’ बताकर लाए कंटेनरों से इस्तेमाल प्लास्टिक बोतलें, डिब्बे, थैलियां और विदेशी सड़कों की झाड़-पोंछ निकलना इसी सच्चाई का प्रमाण है। मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति डी. भारथा चक्रवर्ती ने इसे नियमों की धज्जियां उड़ाना नहीं, बल्कि भारत की धरती पर कचरा उड़ेलने वाला ‘देशद्रोह का गंभीर रूप’ कहा। यह शब्द चौंकाते हैं, क्योंकि हम पर्यावरणीय अपराध को अभी तक राष्ट्रीय अपराध की तरह देखना नहीं सीख पाए हैं।
विडंबना की इससे बड़ी तस्वीर क्या होगी—जिस देश में रोज लगभग 1.7 लाख टन नगरपालिका कचरा पैदा होता है, लैंडफिल कराह रहे हैं, नदियां प्लास्टिक से घुट रही हैं और मिट्टी में जहर उतर रहा है, वही भारत विदेशों का कचरा खरीद रहा है। 2024-25 में पुनर्चक्रण योग्य कचरे और स्क्रैप का आयात 12.74 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि 2021 से 2023 के बीच करीब दो करोड़ किलोग्राम प्लास्टिक कचरा (आधिकारिक और अवैध/गलत घोषणा वाले दोनों स्रोतों को मिलाकर) देश में आया। सवाल यह नहीं कि कितना कचरा काम आ सकता है; सवाल है कि जब देश में रीसाइक्लिंग उद्योग के लिए पर्याप्त सामग्री है, तो विदेशी कचरे की जरूरत किसे? यदि जवाब कारोबारी मुनाफा है, तो यह व्यापार नहीं, मुनाफे की पैकिंग में छिपा पर्यावरणीय शोषण है।
यहां एक नए किस्म का उपनिवेशवाद जन्म लेता है। पहले शक्तिशाली देश गरीब देशों की जमीन और संसाधन हड़पते थे; अब अपने कचरे के लिए उन्हीं देशों की कमजोर निगरानी और सस्ते श्रम को खोजते हैं। विकसित देशों में पर्यावरणीय नियम जितने कठोर होते जाते हैं, जहरीला बोझ कमजोर व्यवस्थाओं वाले देशों पर डालने का लालच उतना बढ़ता है। भारत यदि इसे स्वीकार करता है तो वह केवल विदेशी कचरा नहीं खरीद रहा, बल्कि अपने लोगों का स्वास्थ्य, मिट्टी की उर्वरता और नदियों का भविष्य गिरवी रख रहा है। इसे ‘वेस्ट कोलोनियलिज्म’ कहना अतिशयोक्ति नहीं। कचरा भी सत्ता का औजार हो सकता है—बस उसकी भाषा व्यापार और पुनर्चक्रण की होती है।
मद्रास हाईकोर्ट का महत्व यही है कि उसने सवाल को केवल ‘यह कचरा कहां जाए’ तक सीमित नहीं किया। अदालत ने न दुबई भेजने, न भारत में जलाने-दफनाने की अनुमति स्वीकार की। बासेल कन्वेंशन और खतरनाक अपशिष्ट नियम, 2016 की भावना स्पष्ट है—अवैध कचरा उसी देश को लौटना चाहिए जहां से वह आया है। उसे किसी तीसरे देश के गरीब हिस्से में भेजना समाधान नहीं, अपराध की जिम्मेदारी खिसकाना है। घरेलू भट्टियों में जला देना भी नैतिक विजय नहीं, क्योंकि वही विष धुएं के रूप में लौटेगा। अदालत ने केंद्र से बायोमेडिकल और नगरपालिका कचरे के पुनः निर्यात संबंधी प्रावधानों को स्पष्ट और कठोर बनाने का आग्रह कर जिम्मेदारी को नीति के दरवाजे तक पहुंचा दिया है।
सबसे बड़ा विरोधाभास हमारे नारों में छिपा है। एक ओर स्वच्छ भारत, प्लास्टिक नियंत्रण और आत्मनिर्भरता की घोषणाएं हैं; दूसरी ओर बंदरगाहों पर विदेशी कचरे के कंटेनर खुलते हैं। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ उत्पादन में आत्मनिर्भर होना है, तो क्या कचरे में आत्मनिर्भर होने का गौरव नहीं? हम अपना कचरा नहीं संभाल पा रहे और दूसरों का कचरा संभालने को बंदरगाह खोल रहे हैं। मिट्टी, पानी और खाद्य श्रृंखला में घुलते विष आज न दिखें, पर आने वाली पीढ़ियां उनकी कीमत स्वास्थ्य, बीमारी और घटती जीवन-गुणवत्ता से चुकाएंगी। ऐसी विकास-रफ्तार किस काम की, जिसके पीछे जहरीला पदचिह्न छूटे?
समाज की चुप्पी इस कारोबार की सबसे बड़ी ताकत है। यह मामला उतनी बड़ी सार्वजनिक बहस नहीं बन पाया, जितनी बननी चाहिए थी। पर्यावरण सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से अलग देखना अब पुरानी सोच है। जैसे सीमा पार हथियारों की तस्करी खतरा है, वैसे ही जहरीला कचरा भी। फर्क इतना—हथियार एक दिन में मारते हैं, कचरा वर्षों में। उद्योगपति मुनाफा गिनता है, अधिकारी कागज, नागरिक अस्पताल की पर्ची। इस त्रिकोण को तोड़े बिना कोई स्वच्छता अभियान सफल नहीं होगा। अदालत की चेतावनी को महज न्यायिक टिप्पणी समझना भूल होगी; यह उस सार्वजनिक विवेक को जगाने का प्रयास है, जो धीरे-धीरे सुविधा का आदी हो गया है।
रास्ता कठिन है, अस्पष्ट नहीं। संदिग्ध या गलत घोषित कचरे पर कठोर दंड हो, बंदरगाहों पर वैज्ञानिक और स्वतंत्र जांच हो, आयात नियमों की आड़ में छिपे रास्ते बंद हों और पुनर्चक्रण उद्योग को विदेशी कचरे पर निर्भर बनाने के बजाय देश में पैदा कचरे के वैज्ञानिक उपयोग की ओर मोड़ा जाए। पूर्ण प्रतिबंध पर विचार करना होगा, खासकर उन कचरा श्रेणियों पर जिनका घरेलू प्रबंधन संकट में है। सर्कुलर इकोनॉमी का अर्थ दुनिया भर का कचरा भारत में घुमाना नहीं; संसाधनों का बार-बार उपयोग और अपशिष्ट न्यूनतम करना है। 2047 का विकसित भारत कचरे के आयात से विकसित नहीं होगा। वह तब विकसित कहलाएगा, जब बंदरगाह माल के लिए खुलें, कचरे के लिए नहीं।
मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी का गहरा अर्थ यही है कि पर्यावरणीय स्वतंत्रता भी स्वतंत्रता का रूप है। राजनीतिक आजादी हमें शासन चुनने का अधिकार देती है; पर्यावरणीय संप्रभुता यह अधिकार देती है कि अपनी धरती के साथ क्या करना है, इसका फैसला हम करें। भारत की जमीन किसी दूसरे देश की सफाई का सस्ता विकल्प नहीं हो सकती। विदेशी कचरा लौटाना केवल कंटेनर लौटाना नहीं; उस मानसिकता को लौटाना है, जिसमें गरीब देश को अमीर दुनिया का कूड़ाघर मान लिया जाता है। अब फैसला भारत को करना है—वह अपनी शर्तों पर दुनिया का रीसाइक्लिंग केंद्र बनेगा या कूड़ाघर। इन दोनों रास्तों का फर्क केवल नीति का नहीं, राष्ट्रीय आत्मसम्मान का है।





