कूटनीति के नए मोड़ पर भारत-चीन संबंध

India-China relations at a new diplomatic juncture

अशोक भाटिया

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बीते कुछ वर्षों से जारी अभूतपूर्व सैन्य गतिरोध के बाद अब सीमा पर एक सापेक्षिक शांति दिखाई दे रही है। बीजिंग में आयोजित हुई विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की वार्ता ने दोनों देशों के कूटनीतिक गलियारों में एक नई सुगबुगाहट पैदा कर दी है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई इस उच्च स्तरीय मुलाकात को महज एक नियमित बैठक के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह वार्ता एक ऐसे नाजुक समय पर हो रही है, जब नई दिल्ली सितंबर 2026 में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की तैयारियों में जुटी है, जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन की प्रबल संभावना है। इस पृष्ठभूमि में भारत का रुख अत्यंत स्पष्ट और सुदृढ़ रहा है कि जब तक सीमा पर पूर्ण शांति और 2020 से पहले की स्थिति बहाल नहीं होती, तब तक द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य पटरी पर नहीं लाया जा सकता। वर्तमान कूटनीतिक विमर्श का सबसे मुख्य बिंदु यह है कि अब समय केवल ‘तनाव प्रबंधन’ का नहीं है, बल्कि सीमा विवाद के ‘स्थायी समाधान’ की ओर ठोस कदम बढ़ाने का है।

बीजिंग वार्ता में दोनों पक्षों के कूटनीतिक दृष्टिकोण का एक बड़ा अंतर सतह पर आ गया है। चीनी पक्ष की रणनीति हमेशा से यह रही है कि वह विवाद को किश्तों में सुलझाए, जिसे कूटनीतिक भाषा में ‘अर्ली हार्वेस्ट’ या कम विवादित क्षेत्रों पर पहले समझौता करने की नीति कहा जाता है। चीन चाहता है कि जिन क्षेत्रों पर सहमति बन चुकी है, वहां पेट्रोलिंग फिर से शुरू कर दी जाए और बाकी के जटिल मुद्दों को भविष्य के लिए टाल दिया जाए। इस रणनीति के पीछे चीन का मुख्य उद्देश्य भारत के विशाल बाजार तक अपनी आर्थिक पहुंच को निर्बाध बनाए रखना है, जबकि सीमा पर वह अपनी रणनीतिक बढ़त को बरकरार रखना चाहता है। इसके विपरीत, भारत का दृष्टिकोण पूरी तरह से व्यापक और एकमुश्त समाधान का है। भारतीय नीति निर्माताओं का मानना है कि पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश (पूर्वी सेक्टर) तक, पूरी एलएसी पर एक साथ और पारदर्शी तरीके से समाधान निकाला जाना चाहिए। भारत का स्पष्ट मानना है कि टुकड़ों में किए गए समझौते भविष्य में फिर से किसी नए संकट को जन्म दे सकते हैं, जैसा कि हमने 2020 में गलवान घाटी में देखा था। इसलिए, जब तक संपूर्ण सीमा रेखा का सीमांकन और स्पष्टीकरण नहीं होता, तब तक किसी भी अस्थायी शांति को टिकाऊ नहीं माना जा सकता।

2020 के गलवान संघर्ष ने भारतीय रक्षा और विदेश नीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। पिछले छह वर्षों में भारत ने चीन के प्रति अपनी पारंपरिक रक्षात्मक नीति को त्यागकर एक आक्रामक और निवारक रुख अपनाया है। आज एलएसी पर भारत की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और तकनीकी रूप से उन्नत है। भारतीय सेना ने अग्रिम मोर्चों पर चौबीसों घंटे निगरानी के लिए अत्याधुनिक सैटेलाइट नेटवर्क, एआई-संचालित ड्रोन्स और थर्मल इमेजिंग प्रणालियों को तैनात किया है। इसके साथ ही, इन्फ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर सीमा सड़क संगठन ने कमाल का काम किया है। दुर्गम से दुर्गम इलाकों में बारहमासी चालू रहने वाली सुरंगों, रणनीतिक पुलों और ऑल-वेदर रोड्स का जाल बिछाया जा चुका है, जिससे अब भारतीय सैनिकों और भारी हथियारों को चंद घंटों में एलएसी के किसी भी सेक्टर में स्थानांतरित किया जा सकता है। यह बुनियादी ढांचागत मजबूती ही है जो आज भारत को चीन के साथ बराबरी के स्तर पर बैठकर बातचीत करने की कूटनीतिक शक्ति प्रदान करती है। अब चीन के लिए भारत को डराकर या सैन्य दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाना मुमकिन नहीं रह गया है।

एक तरफ जहां चीन कूटनीतिक बैठकों में शांति और स्थिरता की दुहाई देता है, वहीं दूसरी तरफ एलएसी के पार तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में उसका सैन्य ढांचा लगातार मजबूत हो रहा है। उपग्रह से प्राप्त हालिया तस्वीरें और खुफिया रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि चीन एलएसी के बेहद करीब नए सैन्य शिविर, हेलीपैड, मिसाइल ठिकाने और दोहरे उपयोग वाले ‘श्याओकांग’ (सीमावर्ती मॉडल गांव) बसा रहा है। चीन द्वारा किया जा रहा यह निरंतर निर्माण कार्य उसकी नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। चीन की यह दोहरी नीति—वार्ता की मेज पर सहयोग की बात करना और जमीन पर यथास्थिति बदलने का प्रयास करना—भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि भारतीय वार्ताकार चीन के किसी भी खोखले आश्वासन पर भरोसा करने के मूड में नहीं हैं। भारत ने बीजिंग वार्ता में साफ कर दिया है कि जब तक चीन सीमा के पास अग्रिम मोर्चों से अपने भारी हथियारों, टैंकों और अतिरिक्त सैनिकों को पीछे नहीं हटाता, तब तक केवल पेट्रोलिंग अधिकारों की बहाली को पूर्ण समाधान नहीं माना जाएगा।

भारत-चीन संबंधों का सबसे पेचीदा पहलू यह है कि सीमा पर जारी गंभीर तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध लगातार बढ़ रहे हैं, जो भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक चिंता का विषय है। वर्ष 2026 के शुरुआती छह महीनों के आंकड़े बताते हैं कि भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर लगभग 67.1 अरब डॉलर के चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। भारत आज भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जैसे फार्मास्युटिकल सामग्री , इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा पैनल और भारी मशीनरी के लिए बड़े पैमाने पर चीनी आयात पर निर्भर है। सरकार द्वारा ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘प्रॉडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ जैसी योजनाएं शुरू करने के बावजूद, चीनी सामानों पर निर्भरता को रातों-रात कम करना संभव नहीं हो सका है। कूटनीतिक वार्ताओं में भारत इस आर्थिक असंतुलन को भी एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। भारत ने चीन को यह संदेश दे दिया है कि यदि वह सीमा पर ईमानदारी से समाधान नहीं खोजता, तो भारत में चीनी निवेश और कंपनियों के लिए कारोबारी माहौल सख्त बना रहेगा, जो मंदी से जूझ रही चीनी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है।

सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए अपनी वैश्विक कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन करने का एक बड़ा मंच है। इस सम्मेलन में शी जिनपिंग की संभावित उपस्थिति ने दोनों देशों पर सीमा विवाद को किसी तार्किक परिणति तक पहुंचाने का दबाव बढ़ा दिया है। भारत इस वैश्विक मंच का उपयोग अपनी शर्तों पर शांति स्थापित करने के लिए करना चाहता है, न कि किसी कूटनीतिक समझौते के दबाव में आकर। इतिहास गवाह है कि चीन केवल उसी शक्ति का सम्मान करता है जो सैन्य और आर्थिक रूप से उसके समकक्ष खड़ी हो सके। इसलिए, भारत को अपनी त्रि-आयामी रणनीति पर कायम रहना होगा: पहला, एलएसी पर सैन्य और तकनीकी सतर्कता में कोई कमी न आने देना; दूसरा, वैश्विक साझेदारों जैसे क्वाड देशों के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ाना; और तीसरा, देश के भीतर आर्थिक आत्मनिर्भरता को और तेज करना।

अंततः, भारत और चीन के बीच संबंधों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि बीजिंग इस विशेष प्रतिनिधि वार्ता के नतीजों को जमीन पर किस तरह लागू करता है। अब वह दौर बीत चुका है जब केवल संधियों और बयानों से सीमा पर शांति की उम्मीद की जा सकती थी। भारत को चीन की ‘सलामी स्लाइसिंग’ (धीरे-धीरे जमीन हड़पने की नीति) के प्रति निरंतर सतर्क रहना होगा। एशिया और पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए इन दो महाशक्तियों के बीच शांति आवश्यक है, लेकिन यह शांति भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान की कीमत पर कभी नहीं हो सकती। अब प्रबंधन के ढुलमुल रवैये को छोड़कर, दोनों देशों की सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण करने और एक स्थायी, सर्वमान्य और बाध्यकारी समाधान खोजने की बारी है। नई दिल्ली को अपनी कूटनीतिक दृढ़ता और सैन्य तत्परता के इसी संतुलन को बनाए रखना होगा, क्योंकि चीन के साथ शांति का रास्ता केवल और केवल आंतरिक शक्ति और सतर्कता से होकर ही गुजरता है।