सौरभ वार्ष्णेय
भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और इसके साथ ही कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैस के आयात पर देश की निर्भरता भी एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में केंद्र सरकार का समुद्र की गहराइयों में छिपे तेल और गैस के भंडार की खोज को गति देने का फैसला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है। सरकार ने इसी उद्देश्य से ‘समुद्र मंथनÓ यानी नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम को मंजूरी दी है। यह योजना केवल तेल और गैस की खोज का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा बचत और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। 31 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर इस योजना का उद्देश्य समुद्र तल के नीचे मौजूद संभावित हाइड्रोकार्बन संसाधनों की खोज को प्रोत्साहित करना है। योजना के पहले चरण के तहत वित्त वर्ष 2030-31 तक 84,084 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रस्ताव है। सरकार का अनुमान है कि समुद्र के नीचे करीब 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट के बराबर संभावित ऊर्जा संसाधनों की खोज की जा सकती है।
भारत के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल उपभोक्ताओं में शामिल है। पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन, पेट्रोकेमिकल उद्योग और परिवहन क्षेत्र की बढ़ती मांग के कारण तेल की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, घरेलू उत्पादन उस गति से नहीं बढ़ पाया है जिस गति से खपत बढ़ी है। परिणामस्वरूप भारत को हर वर्ष भारी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से खरीदना पड़ता है।
कच्चे तेल का महंगा आयात देश के व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि भी भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों में संकट अथवा प्रमुख तेल उत्पादक देशों की उत्पादन नीति में बदलाव का सीधा असर भारत के ऊर्जा बिल पर पड़ता है। ऐसे में घरेलू तेल और गैस संसाधनों की खोज को बढ़ावा देना स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय प्राथमिकता बन जाता है।
भारत के पास विशाल समुद्री क्षेत्र है। पश्चिमी और पूर्वी तटों से लगे ऑफशोर बेसिनों में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं बताई जाती हैं। लेकिन समुद्र के भीतर तेल और गैस की खोज जमीन पर कुआं खोदने जितनी आसान नहीं है। कई संभावित क्षेत्र समुद्र की हजारों मीटर गहराई में स्थित हैं।
डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर क्षेत्रों में खोज के लिए अत्याधुनिक तकनीक, विशेष ड्रिलिंग रिग, अनुभवी वैज्ञानिक और इंजीनियर तथा भारी पूंजी निवेश की जरूरत होती है। एक कुएं की ड्रिलिंग में ही करोड़ों डॉलर खर्च हो सकते हैं। इसके बावजूद यह निश्चित नहीं होता कि वहां व्यावसायिक मात्रा में तेल या गैस मिलेगी ही। किसी कंपनी के लिए अरबों रुपये खर्च करके कई किलोमीटर गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करना और फिर वहां व्यावसायिक भंडार नहीं मिलना बड़ा वित्तीय नुकसान हो सकता है। इसके अलावा खोज से लेकर व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने तक कई वर्ष लग सकते हैं। यही कारण है कि कई कंपनियां ऐसे क्षेत्रों में निवेश करने से पहले जोखिम और संभावित लाभ का बहुत सावधानी से आकलन करती हैं।
‘समुद्र मंथनÓ योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि इसमें सरकार निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ जोखिम साझा करने की कोशिश कर रही है। इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों में खोज को बढ़ावा देना है जहां भारी प्रारंभिक निवेश के कारण कंपनियां स्वयं आगे आने में हिचकती हैं।यदि सरकार खोज के जोखिम का एक हिस्सा वहन करती है तो कंपनियों के लिए डीपवाटर एक्सप्लोरेशन में निवेश करना अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकता है। इससे नई तकनीक और निजी पूंजी भी इस क्षेत्र में आ सकती है।इसका दूसरा लाभ यह होगा कि देश में ऑफशोर एक्सप्लोरेशन की तकनीकी क्षमता विकसित होगी। ड्रिलिंग, समुद्री इंजीनियरिंग, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, डेटा विश्लेषण और संबंधित सेवाओं के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।यहां सरकार और जनता दोनों को यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। समुद्र के नीचे संभावित संसाधन मिलने और उनसे वास्तविक उत्पादन शुरू होने के बीच लंबा अंतर हो सकता है।किसी क्षेत्र में तेल या गैस मिलने के बाद भी यह देखना पड़ता है कि वहां भंडार कितना बड़ा है, उसे निकालना आर्थिक रूप से कितना व्यवहार्य है, उत्पादन के लिए किस प्रकार का बुनियादी ढांचा चाहिए और पर्यावरणीय मंजूरियां किस तरह प्राप्त होंगी।इसलिए ‘समुद्र मंथनÓ को तत्काल तेल आयात कम करने वाली योजना के बजाय दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के रूप में देखना अधिक उचित होगा। यदि खोज सफल होती है और बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है तो निश्चित रूप से भारत की आयात निर्भरता कम हो सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक सुरक्षा मिलेगी।
समुद्र की गहराइयों में तेल और गैस की खोज जितनी आकर्षक है, उससे जुड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऑफशोर ड्रिलिंग के दौरान समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है। तेल रिसाव की स्थिति में समुद्री जीव-जंतुओं, मछलियों, प्रवाल भित्तियों और तटीय समुदायों को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए खोज और उत्पादन की प्रक्रिया में अत्याधुनिक सुरक्षा व्यवस्था तथा कड़े पर्यावरणीय मानकों का पालन अनिवार्य होना चाहिए।भारत की बड़ी आबादी समुद्री संसाधनों और मत्स्य व्यवसाय पर निर्भर है। किसी भी परियोजना से स्थानीय मछुआरों की आजीविका प्रभावित नहीं होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना इस योजना की सफलता की महत्वपूर्ण शर्त होगी।
‘समुद्र मंथनÓ भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पूरा कर सकता है, लेकिन इसे ऊर्जा संक्रमण का विकल्प नहीं समझना चाहिए। दुनिया धीरे-धीरे स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रही है।सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में भारत पहले से निवेश बढ़ा रहा है। इसलिए एक ओर जहां देश को निकट और मध्यम अवधि में तेल और गैस की जरूरत पूरी करने के लिए घरेलू संसाधनों का इस्तेमाल करना होगा, वहीं दूसरी ओर भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था के निर्माण में भी तेजी लानी होगी।यानी भारत की ऊर्जा नीति का रास्ता केवल समुद्र के नीचे तेल खोजने से पूरा नहीं होगा। उसे तेल और गैस की जरूरतों के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार को भी समान प्राथमिकता देनी होगी।यदि योजना सफल होती है तो इसका लाभ केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। ऑफशोर एक्सप्लोरेशन के लिए ड्रिलिंग उपकरण, समुद्री जहाज, इंजीनियरिंग सेवाएं, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, डेटा प्रोसेसिंग और तकनीकी प्रशिक्षण की जरूरत बढ़ेगी।इससे देश में तेल एवं गैस क्षेत्र से जुड़े नए उद्योगों को बढ़ावा मिल सकता है। उच्च कौशल वाले इंजीनियरों, भूवैज्ञानिकों, समुद्री विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि इस पूरी प्रक्रिया में घरेलू कंपनियों और भारतीय तकनीक को बढ़ावा दिया जाता है तो भारत की ऊर्जा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी।’समुद्र मंथनÓ का बजट बड़ा है और इससे जुड़ी उम्मीदें भी बड़ी हैं। ऐसे में योजना में पारदर्शिता, वैज्ञानिक मूल्यांकन और जवाबदेही जरूरी होगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि सार्वजनिक धन का इस्तेमाल केवल उन परियोजनाओं में हो जहां तकनीकी और आर्थिक संभावनाओं का उचित आकलन किया गया हो।साथ ही निजी निवेशकों के लिए नीति स्पष्ट और स्थिर होनी चाहिए। बार-बार नियमों में बदलाव, अनुमति प्रक्रिया में देरी अथवा अस्पष्टता से निवेश प्रभावित हो सकता है।सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि खोज की प्रक्रिया में पर्यावरणीय नियमों से समझौता न हो। भारत के लिए ‘समुद्र मंथनÓ केवल समुद्र की गहराइयों में तेल और गैस खोजने की योजना नहीं है। यह उस चुनौती का जवाब तलाशने का प्रयास है जिसमें देश की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है और आयात पर निर्भरता अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।यदि योजना के तहत अनुमानित संसाधनों की सफल खोज और व्यावसायिक उत्पादन संभव होता है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है । लेकिन इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता केवल कितने कुएं खोदे गए या कितने ब्लॉक खोजे गए, इससे तय नहीं होगी। असली सफलता तब होगी जब खोज से उत्पादन तक की पूरी प्रक्रिया आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार और तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बने। भारत को समुद्र की गहराइयों से ऊर्जा निकालते समय भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा। आज के लिए तेल और गैस की सुरक्षा तथा कल के लिए स्वच्छ ऊर्जा—इन्हीं दोनों के संतुलन में भारत की वास्तविक ऊर्जा आत्मनिर्भरता छिपी है।





