महेन्द्र तिवारी
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव घटाने के उद्देश्य से 2 नई सीधी संपर्क रेखाओं यानी त्वरित संवाद तंत्र और 2 अतिरिक्त सीमांत कार्मिक बैठक स्थलों की स्थापना पर बनी सहमति द्विपक्षीय संबंधों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामरिक मोड़ का संकेत देती है। वर्ष 2020 की गलवान घाटी की दुर्भाग्यपूर्ण हिंसक झड़प के बाद से दोनों एशियाई महाशक्तियों के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई बन गई थी, जिसने दोनों पक्षों को हजारों सैनिकों और भारी सैन्य उपकरणों को सीमांत क्षेत्रों में तैनात करने के लिए विवश कर दिया था। इस पृष्ठभूमि में संवाद के नए संस्थागत माध्यमों का निर्माण केवल एक सामान्य प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व द्वारा सीमा पर किसी भी अप्रत्याशित सैन्य संघर्ष की संभावना को टालने की एक व्यावहारिक और यथार्थवादी इच्छाशक्ति को भी दर्शाता है। हिमालय की दुर्गम और संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों में स्थित 3488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखना क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता दोनों के लिए अनिवार्य है।
सीमा प्रबंधन के इतिहास पर दृष्टि डालें तो भारत और चीन के बीच वर्ष 1993 में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने का समझौता हुआ था। इसके बाद वर्ष 1996 में सैन्य क्षेत्र में विश्वास बहाली के उपायों पर सहमति बनी और आगे चलकर वर्ष 2005 तथा 2013 में भी सीमा रक्षा सहयोग के विभिन्न समझौतों को अंतिम रूप दिया गया। इन सभी समझौतों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि दोनों देशों के सैनिक जब गश्त के दौरान आमने-सामने आएँ तो किसी भी प्रकार के हथियारों का प्रयोग न हो और तनाव को स्थानीय स्तर पर ही शांत कर लिया जाए। वर्ष 2020 की घटनाओं ने इस पुराने तंत्र की सीमाओं और व्यावहारिक कमजोरियों को उजागर कर दिया था। ऐसे में 2 नई सीधी संपर्क व्यवस्थाओं और 2 नए बैठक स्थलों को जोड़ना इस पुराने सुरक्षा ढांचे को आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप अधिक प्रभावी, त्वरित और जवाबदेह बनाने का एक ठोस प्रयास है।
त्वरित संचार तंत्र अथवा सीधी संपर्क रेखा का मुख्य लाभ यह होता है कि यह संकट के समय समय की बर्बादी को न्यूनतम कर देता है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जहाँ अत्यधिक ठंड, ऑक्सीजन की कमी और विषम मौसम के कारण संचार के पारंपरिक माध्यम बाधित हो सकते हैं, वहाँ विशेष सैन्य कमानों के बीच त्वरित संपर्क किसी भी गलत सूचना को फैलने से रोकता है। अक्सर सीमा पर तनाव सैनिकों की आक्रामक गश्त, एक-दूसरे के गश्ती दल के मार्ग में आने या अनजाने में नियंत्रण रेखा पार करने से उत्पन्न होता है। यदि स्थानीय कमांडर तुरंत एक-दूसरे से बात करने में सक्षम न हों, तो यह स्थानीय घटना कुछ ही घंटों में रणनीतिक स्तर के बड़े सैन्य संकट का रूप ले सकती है। नई संचार रेखाएँ दोनों सेनाओं के उच्चाधिकारियों को तत्काल स्थिति स्पष्ट करने और निचले स्तर के सैनिकों को शांत रहने का आदेश देने का प्रत्यक्ष अधिकार प्रदान करती हैं।
इसी प्रकार सीमा कार्मिक बैठक स्थलों का अपना अलग व्यावहारिक महत्व है। वर्तमान में भारत और चीन के बीच लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक केवल 5 आधिकारिक बैठक स्थल सक्रिय रहे हैं, जिनमें दौलत बेग ओल्डी, चुशूल, नाथू ला, बुम ला और किबिथू शामिल हैं। इतनी लंबी और भौगोलिक रूप से कटी हुई सीमा के लिए 5 बिंदु अक्सर पर्याप्त नहीं होते थे, क्योंकि दूरदराज के क्षेत्रों में किसी विवाद की स्थिति में अधिकारियों को औपचारिक वार्ता के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। 2 नए बैठक स्थलों की स्थापना से स्थानीय स्तर पर कमान संभालने वाले अधिकारियों को अपने ही क्षेत्र में बहुत कम समय में आमने-सामने बैठकर बातचीत करने की सुविधा मिलेगी। जब दोनों पक्षों के सैन्य प्रतिनिधि नियमित रूप से मिलते हैं, तो न केवल सामयिक समस्याओं का समाधान होता है, बल्कि एक-दूसरे के दृष्टिकोण और संवेदनशीलताओं को समझने का मानवीय अवसर भी विकसित होता है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा की सबसे बड़ी जटिलता यह है कि यह दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से सीमांकित या चिन्हित नहीं है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी धारणाओं के आधार पर गश्त करते हैं, जिससे कई क्षेत्रों में दोनों की सीमा रेखाएँ आपस में टकराती हैं। डेपसांग, डेमचोक, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और पैंगोंग त्सो जैसे क्षेत्रों में यह टकराव बार-बार देखने को मिला है। ऐसे में विश्वास बहाली के नए उपाय सैनिकों के बीच अप्रत्याशित मुठभेड़ों को रोकने के लिए एक प्राथमिक रक्षा कवच की तरह कार्य करते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जब तक राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर सीमा का अंतिम समाधान नहीं निकल जाता, तब तक जमीनी स्तर पर कोई अनचाहा संघर्ष न भड़के।
हालाँकि, इस नए कूटनीतिक समझौते के सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ जमीनी यथार्थ से जुड़ी गंभीर चुनौतियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संचार तंत्र और बैठक बिंदु केवल संकट प्रबंधन के साधन हैं, वे विवाद का अंतिम समाधान नहीं हैं। सबसे पहली और प्रमुख चुनौती वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों ओर से बड़े पैमाने पर तैनात सैनिकों और हथियारों की वापसी है। जब तक अग्रिम मोर्चों से भारी सैन्य जमावड़ा पीछे नहीं हटता, तब तक अविश्वास का वातावरण पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता। सैनिकों की भारी उपस्थिति सदैव एक अंतर्निहित तनाव को बनाए रखती है, जहाँ एक छोटी सी मानवीय चूक भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है।
दूसरी बड़ी चुनौती सीमांत क्षेत्रों में हो रहा व्यापक ढांचागत विकास है। हाल के वर्षों में दोनों देशों ने सीमा के पास बारहमासी सड़कों, सुरंगों, पुलों, आधुनिक बंकरों और हवाई पट्टियों का तेजी से निर्माण किया है। बुनियादी ढांचे का यह विकास दोनों पक्षों की अपनी सीमाओं की रक्षा करने की सामरिक तत्परता को तो बढ़ाता है, लेकिन साथ ही यह एक निरंतर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को भी जन्म देता है। जब सीमा पर दोनों सेनाओं की रसद और सैन्य पहुँच की गति कई गुना बढ़ जाती है, तो किसी भी संकट के समय प्रतिक्रिया का समय बहुत कम रह जाता है। इसलिए नए संवाद माध्यमों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इस तेज गति वाले सैन्य परिवेश में कितनी कुशलता से काम करते हैं।
तीसरी चुनौती संधियों और प्रोटोकॉल के ईमानदारी से पालन की है। अतीत के अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि समझौतों का होना एक बात है और जमीनी स्तर पर गश्ती दलों द्वारा उनका अक्षरशः पालन किया जाना दूसरी बात है। विश्वास की पुनः स्थापना केवल कागजी घोषणाओं से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए दोनों ओर के फील्ड कमांडरों को अपने दृष्टिकोण में संयम और परिपक्वता दिखानी होगी। पूर्व में स्थापित बफर जोन और गश्त से जुड़े नियमों की स्पष्ट समझ दोनों पक्षों के निचले स्तर के सैनिकों तक पहुंचनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के संशय की गुंजाइश न रहे।
भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारत और चीन के बीच सीमा पर शांति का बना रहना केवल इन 2 देशों के हित में ही नहीं है, बल्कि संपूर्ण एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। 21वीं सदी में दुनिया पहले से ही अनेक युद्धों, आर्थिक अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला के संकटों से जूझ रही है। ऐसे दौर में 2 विशाल जनसंख्या वाले परमाणु संपन्न पड़ोसियों के बीच सीधा सैन्य टकराव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। सीमा पर तनाव कम करने की यह नई सहमति यह संदेश देती है कि दोनों देश अपने गहरे रणनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक और क्षेत्रीय स्थिरता के व्यापक महत्व को समझते हैं।
भारत के लिए अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता है, जिससे कभी कोई समझौता नहीं किया जा सकता। भारत ने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि सीमा पर अमन-चैन और स्थिरता ही द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य होने की पहली पूर्व-शर्त है। साथ ही, एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में भारत ने सदैव शांतिपूर्ण संवाद और कूटनीतिक बातचीत के रास्तों को खुला रखा है। नई संचार रेखाओं और बैठक बिंदुओं की स्थापना भारत की इसी संतुलित नीति का प्रमाण है, जहाँ एक ओर सैन्य स्तर पर पूरी सतर्कता और तैयारी रखी जा रही है, वहीं दूसरी ओर कूटनीति के माध्यम से तनाव को शांत करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि 2 नई सीधी संपर्क रेखाओं और 2 अतिरिक्त सीमांत बैठक बिंदुओं पर बनी सहमति भारत-चीन सीमा प्रबंधन की दिशा में एक अत्यंत विवेकपूर्ण और स्वागत योग्य कदम है। यह पहल सीमा पर सैनिकों के बीच आकस्मिक टकराव के जोखिम को कम करेगी, गलतफहमियों को समय रहते दूर करेगी और दोनों पक्षों को शांतिपूर्ण संवाद का एक मजबूत मंच प्रदान करेगी। फिर भी, इस व्यवस्था को वास्तविक सफलता तभी माना जाएगा जब यह अग्रिम मोर्चों से सेनाओं की वास्तविक और सत्यापन योग्य वापसी का मार्ग प्रशस्त करे तथा दोनों देशों के बीच सीमा के स्थायी, निष्पक्ष और परस्पर सम्मानजनक समाधान की नींव तैयार कर सके।





