प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
सेबी की मंजूरी के साथ रिलायंस जियो प्लेटफॉर्म्स का करीब 37,700 करोड़ रुपये का आईपीओ भारतीय शेयर बाजार में नया कीर्तिमान बना सकता है। करीब 27 करोड़ नए शेयर जारी होंगे और कंपनी का मूल्यांकन 137 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज की 66 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी बनी रहेगी। मेटा और गूगल जैसे वैश्विक तकनीकी दिग्गज निवेश बनाए रखेंगे। आईपीओ से करीब 27,500 करोड़ रुपये रिलायंस जियो इन्फोकॉम का कर्ज चुकाने में जाएंगे। बाजार के लिए यह बड़ी पूंजी जुटाने की खबर है, लेकिन भारत के लिए सवाल बड़ा है—जियो का शेयर किस भाव पर बिकेगा, यह नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल दुनिया की चाबी किन हाथों में रहेगी।
2016 में जियो का आगमन महज नई टेलीकॉम कंपनी का प्रवेश नहीं था; उसने भारत में इंटरनेट की तस्वीर बदल दी। मुफ्त-सस्ते डेटा ने इंटरनेट को महानगरों से गाँव-कस्बों की जरूरत बना दिया। वीडियो कॉल, ऑनलाइन पढ़ाई, मनोरंजन बढ़े और छोटे कारोबार डिजिटल बाजार में आए। आज जियो के 53 करोड़ से अधिक ग्राहक हैं, जिनमें 50.6 करोड़ वायरलेस ग्राहक हैं (जुलाई 2026, ट्राई रिपोर्ट)। वह दुनिया के बड़े मोबाइल ऑपरेटरों में है। फिक्स्ड ब्रॉडबैंड में हिस्सेदारी 40% से अधिक, कुल ब्रॉडबैंड में करीब 49% और 5G फिक्स्ड वायरलेस एक्सेस में 70% से ज्यादा है। राजस्व 1.47 लाख करोड़ और मुनाफा करीब 30 हजार करोड़ रुपये है। आंकड़े ताकत बताते हैं, लेकिन सवाल है—जियो की इस ऊँचाई के बाद दूसरों के लिए मैदान कितना बचा है?
जियो की सफलता का दूसरा पहलू यहीं दिखता है। सस्ते डेटा ने करोड़ों भारतीयों को इंटरनेट से जोड़ा, लेकिन इस कीमत-क्रांति ने छोटे खिलाड़ियों की जगह भी घटाई। जब दो बड़ी कंपनियाँ ब्रॉडबैंड कनेक्शनों का करीब 84 प्रतिशत नियंत्रित करती हों, तो प्रतिस्पर्धा सिर्फ सस्ता पैकेज नहीं रह जाती। असली प्रतिस्पर्धा तब है, जब नया खिलाड़ी बाजार में आ सके, उपभोक्ता के पास विकल्प हों और छोटा खिलाड़ी बड़े को चुनौती दे सके। जियो ने दूरसंचार का खेल बदला, जिससे कई पुराने खिलाड़ी हाशिये पर चले गए या बाहर हो गए। यह पूंजीवाद की स्वाभाविक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में सवाल जरूरी है—कहीं बाजार की जीत धीरे-धीरे विकल्पों की हार तो नहीं बन रही?
आईपीओ की असली तस्वीर निवेशकों के व्यवहार में दिखती है। कोई मौजूदा निवेशक हिस्सेदारी बेच नहीं रहा; रिलायंस, मेटा और गूगल निवेश बनाए रख रहे हैं। यानी यह निकासी नहीं, विस्तार का आईपीओ है। कर्ज चुकाने के बाद कंपनी के पास विस्तार का मजबूत आधार होगा। विस्तार मोबाइल सिम तक सीमित नहीं; जियो एआई, क्लाउड और डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रही है। यहीं दूरसंचार डेटा की दुनिया में बदलता है। करोड़ों ग्राहकों का नेटवर्क उनकी पसंद, जरूरत और डिजिटल व्यवहार के संकेत जुटाता है। आज डेटा कारोबार की पूंजी, कल एआई की ताकत बन सकता है। इसलिए जियो की असली पूंजी टावर, स्पेक्ट्रम, ग्राहक और उनसे पैदा होने वाला डेटा है।
डिजिटल दौर में एकाधिकार की शक्ल बदल चुकी है। भारत में चर्चा अब तक स्पेक्ट्रम, लाइसेंस और टैरिफ तक रही, लेकिन नई सत्ता अदृश्य है। किसी कंपनी को हर घर पर कब्जा करने की जरूरत नहीं; डिजिटल निर्भरता का सबसे बड़ा दरवाजा बनना ही काफी है। सवाल इंटरनेट की कीमत का नहीं, बल्कि सूचना किस नेटवर्क से गुजरती है, विज्ञापन की दिशा कौन मोड़ता है और छोटी डिजिटल कंपनियाँ ग्राहकों तक किस तंत्र से पहुँचती हैं। स्थानीय समाचार मंच, ऐप कंपनियाँ और क्षेत्रीय डिजिटल सेवाएँ ऐसे डिजिटल जंगल में जगह तलाशती हैं, जिसकी सबसे ऊँची छत पहले ही किसी और के कब्जे में है। यह न सरकारी नियंत्रण है, न पुराना निजी एकाधिकार—यह नेटवर्क, पूंजी और डेटा से उभरती नई सत्ता है।
जियो को इस पूरी कहानी का खलनायक मानना जितना आसान है, उतना ही अधूरा। भारत को डिजिटल बनाने में उसका योगदान ऐतिहासिक रहा है। सस्ता डेटा न आता तो करोड़ों भारतीय इतनी तेजी से इंटरनेट की मुख्यधारा में नहीं पहुँचते। लेकिन इतिहास चेताता है—समाज को जोड़ने वाली शक्ति जब एक जगह सिमटती है, तो विकल्प सिकुड़ते हैं। रेलवे ने भारत को जोड़ा, पर अगर हर पटरी, स्टेशन और टिकट एक ही हाथ में होता तो? डिजिटल भारत में नेटवर्क पटरी है, डेटा टिकट और उपभोक्ता यात्री। फर्क यह है कि इस यात्रा में यात्री अपने व्यवहार के निशान भी छोड़ता है। इसलिए मुद्दा जियो के योगदान को नकारना नहीं, उसकी शक्ति की लोकतांत्रिक सीमा तय करना है।
डिजिटल बाजार की दिशा अब नियामकों की चौकसी तय करेगी। सेबी की जिम्मेदारी आईपीओ और निवेशक पारदर्शिता तक है, लेकिन प्रतिस्पर्धा बचाने का दायित्व प्रतिस्पर्धा आयोग और दूरसंचार नियामक का भी है। डेटा पोर्टेबिलिटी, इंटरऑपरेबिलिटी, प्लेटफॉर्म की निष्पक्षता और छोटे खिलाड़ियों के लिए समान अवसर अब तकनीकी शब्द नहीं, डिजिटल लोकतंत्र की बुनियाद हैं। जियो की तकनीकी ताकत भारत को तेज 5-जी, बेहतर ब्रॉडबैंड, क्लाउड और एआई सेवाएँ दे सकती है, तो उसका लाभ देश तक पहुँचना चाहिए। लेकिन यही ताकत प्रतिस्पर्धियों को दबाने लगे, तो नियामकों का हस्तक्षेप जरूरी है। सफलता महत्वपूर्ण है, पर स्वतंत्र बाजार उससे भी बड़ा मूल्य है।
जियो का आईपीओ बाजार के लिए उत्सव, पर भारत के लिए बड़ा संकेत है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के साथ सत्ता के केंद्रीकरण की आशंका बढ़ रही है। मुकेश अंबानी ने जोखिम उठाकर पूंजी लगाई और भारतीय डिजिटल बाजार बदल दिया—यह बड़ी उपलब्धि है। लेकिन लोकतंत्र किसी सफलता को स्थायी अधिकार नहीं देता। सवाल यह नहीं कि जियो 137 अरब डॉलर की होगी या आगे जाएगी; सवाल है कि उसके बाद नागरिक के पास कितने वास्तविक विकल्प रहेंगे। आज डेटा हमारी आदतों का रिकॉर्ड है, कल वही एआई की ताकत और अर्थव्यवस्था की मुद्रा बन सकता है। इसलिए जियो का आईपीओ केवल शेयरों की बिक्री नहीं, स्क्रीन के पीछे जमा डेटा से आकार लेती सत्ता की कहानी है।





