महेन्द्र तिवारी
दक्षिण एशिया की भू राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां सैन्य शक्ति, कूटनीति और तकनीकी वर्चस्व तीनों मिलकर नए क्षेत्रीय समीकरण बना रहे हैं। भारत के पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश द्वारा चीन से 20 जे 10सीई लड़ाकू विमान खरीदने की दिशा में बढ़ाया गया कदम इसी परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। लगभग 2.3 अरब डॉलर के इस प्रस्तावित रक्षा समझौते ने केवल ढाका और बीजिंग के संबंधों को ही चर्चा में नहीं लाया, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, बंगाल की खाड़ी के सामरिक महत्व और पूरे दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर भी नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह सौदा अभी अंतिम प्रक्रिया में है, लेकिन दोनों देशों के बीच सरकारी स्तर पर इसकी तैयारी को क्षेत्र की सबसे बड़ी रक्षा परियोजनाओं में गिना जा रहा है।
चीन पिछले दो दशकों में बांग्लादेश का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बन चुका है। नौसैनिक युद्धपोतों से लेकर टैंक, मिसाइल प्रणालियां और लड़ाकू विमानों तक, चीनी सैन्य उपकरण बांग्लादेश की रक्षा संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। जे 10सीई की खरीद इस दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करती है। यही कारण है कि नई दिल्ली इस घटनाक्रम को केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की व्यापक रणनीति के रूप में देख रही है।
इस रक्षा समझौते की आर्थिक संरचना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विमान की मूल कीमत लगभग 62.7 मिलियन डॉलर प्रति इकाई बताई जाती है, किंतु वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक है। पायलटों का प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, रखरखाव, कल-पुर्जों की दीर्घकालिक आपूर्ति, हथियारों का भंडार और हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण को जोड़ने पर प्रत्येक विमान की प्रभावी लागत लगभग 115 मिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है। कुल भुगतान वर्ष 2035 तक किश्तों में किए जाने की योजना है, जिससे बांग्लादेश तत्काल आर्थिक दबाव से बच सकेगा। यह व्यवस्था बताती है कि चीन केवल हथियार नहीं बेच रहा, बल्कि दीर्घकालिक रक्षा निर्भरता भी स्थापित कर रहा है।
किसी भी विकासशील राष्ट्र के लिए इतनी बड़ी सैन्य खरीद एक राजनीतिक निर्णय भी होती है। बांग्लादेश को अभी भी रोजगार, आधारभूत संरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद वायुसेना के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देना यह संकेत देता है कि ढाका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को नए स्तर पर ले जाना चाहता है। यदि यह समझौता पूरी तरह लागू होता है तो पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश चीन के इस आधुनिक लड़ाकू विमान का दूसरा विदेशी संचालक बन जाएगा।
इस खरीद के समर्थन में बांग्लादेश के भीतर एक विशेष राजनीतिक कथा भी गढ़ी जा रही है। वहां यह तर्क दिया जा रहा है कि मई 2025 के भारत पाकिस्तान सैन्य संघर्ष में चीनी तकनीक वाले जे 10सीई ने अपनी प्रभावशीलता सिद्ध कर दी थी। कुछ राजनीतिक नेताओं और समर्थकों ने इसे पश्चिमी तकनीक के मुकाबले अधिक सक्षम विमान के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। हालांकि स्वतंत्र रक्षा विशेषज्ञों का मत इससे अलग है। उनका कहना है कि उस संघर्ष से जुड़े अनेक दावों की निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए किसी विमान की श्रेष्ठता का निष्कर्ष केवल राजनीतिक प्रचार के आधार पर नहीं निकाला जा सकता।
तकनीकी दृष्टि से जे 10सीई निश्चित रूप से एक आधुनिक लड़ाकू विमान है। यह चौथी और आधी पीढ़ी की श्रेणी में रखा जाता है तथा इसमें सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग रडार, डिजिटल उड़ान नियंत्रण प्रणाली और लंबी दूरी तक मार करने वाली पीएल 15 मिसाइल लगाने की क्षमता है। इसका उद्देश्य हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों प्रकार के अभियानों को सफलतापूर्वक पूरा करना है। यही कारण है कि इसे बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान कहा जाता है।
भारत के लिए वास्तविक चिंता केवल इस विमान की क्षमता नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति है। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पहले से इसी प्रकार के चीनी विमान का संचालन कर रहा है। यदि पूर्व में बांग्लादेश भी वही तकनीक अपनाता है तो भारतीय वायुसेना को दोनों मोर्चों पर समान प्रकार की रडार प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीक और मिसाइल खतरों का सामना करना पड़ सकता है। सामरिक भाषा में इसे तकनीकी मानकीकरण कहा जाता है। इससे विरोधी देशों के बीच प्रशिक्षण, रखरखाव और सूचना साझाकरण की संभावना भी बढ़ जाती है, जो किसी भी क्षेत्रीय शक्ति के लिए गंभीर रणनीतिक विषय होता है।
इन परिस्थितियों में भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमान की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। राफेल केवल एक विमान नहीं, बल्कि एक समग्र युद्ध प्रणाली है। इसमें दो शक्तिशाली इंजन लगे हैं, जबकि जे 10सीई एक इंजन पर आधारित है। दो इंजन होने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि युद्ध या तकनीकी खराबी की स्थिति में भी विमान सुरक्षित लौटने की संभावना अधिक रहती है। विशेषकर समुद्र और पर्वतीय क्षेत्रों में यह विशेषता पायलट की सुरक्षा और अभियान की सफलता दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राफेल की मारक क्षमता भी उल्लेखनीय है। यह लगभग 9500 किलोग्राम तक हथियार, बम और अतिरिक्त ईंधन ले जा सकता है। इसके लिए इसमें 14 हथियार बिंदु उपलब्ध हैं। दूसरी ओर जे 10सीई की क्षमता लगभग 5600 किलोग्राम और 11 हथियार बिंदुओं तक सीमित मानी जाती है। इसका सीधा अर्थ है कि राफेल एक ही उड़ान में अधिक विविध प्रकार के हथियार लेकर लंबी दूरी तक प्रभावी हमला करने में सक्षम है। यही कारण है कि भारतीय वायुसेना इसे गहरे प्रहार वाले अभियानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है।
आधुनिक हवाई युद्ध का सबसे निर्णायक क्षेत्र इलेक्ट्रॉनिक युद्ध है। आज जीत केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि रडार, सेंसर और डिजिटल सुरक्षा प्रणालियों से तय होती है। राफेल की स्पेक्ट्रा प्रणाली दुनिया की सबसे उन्नत इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा प्रणालियों में गिनी जाती है। यह दुश्मन के रडार संकेतों का विश्लेषण करके उन्हें भ्रमित करती है, मिसाइल की चेतावनी देती है और आवश्यकता पड़ने पर इलेक्ट्रॉनिक प्रतिरोध उत्पन्न करती है। इससे विमान की उत्तरजीविता कई गुना बढ़ जाती है। चीन ने भी अपने विमानों में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियां विकसित की हैं, लेकिन उनकी वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में विश्वसनीयता को लेकर वैश्विक स्तर पर अभी भी सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाता है।
लंबी दूरी की मिसाइलों की बात करें तो भारत के पास मीटिओर जैसी अत्याधुनिक प्रणाली उपलब्ध है, जबकि जे 10सीई पीएल 15 मिसाइल से लैस हो सकता है। दोनों ही लंबी दूरी की मिसाइलें हैं, लेकिन उनकी तकनीकी संरचना अलग है। मीटिओर में विशेष प्रणोदन तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे अंतिम चरण तक उसकी ऊर्जा और गति बनी रहती है। यही कारण है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञ इसे वर्तमान समय की सबसे प्रभावी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों में शामिल करते हैं।
यह भी समझना आवश्यक है कि किसी देश की सैन्य शक्ति केवल विमान की संख्या से निर्धारित नहीं होती। प्रशिक्षण, हवाई चेतावनी प्रणाली, उपग्रह आधारित सूचना, रसद व्यवस्था, साइबर सुरक्षा और संयुक्त सैन्य अभ्यास भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। भारतीय वायुसेना वर्षों से जटिल बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यासों में भाग लेती रही है और उसके पायलटों का प्रशिक्षण विश्व के श्रेष्ठ मानकों में गिना जाता है। यही अनुभव किसी भी आधुनिक युद्ध में तकनीकी क्षमता के समान ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बांग्लादेश का यह रक्षा सौदा भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है कि पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों को केवल सांस्कृतिक या आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सुरक्षा साझेदारी के स्तर पर भी मजबूत करना होगा। बंगाल की खाड़ी आने वाले वर्षों में विश्व व्यापार, समुद्री ऊर्जा मार्गों और सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बनने जा रही है। ऐसे में भारत को अपनी समुद्री शक्ति, पूर्वी वायु कमान और उत्तर पूर्वी राज्यों की रक्षा संरचना को और अधिक सुदृढ़ करना होगा।
दीर्घकालिक समाधान केवल आयातित हथियारों में नहीं, बल्कि स्वदेशी रक्षा उत्पादन में निहित है। उन्नत लड़ाकू विमान, स्वदेशी इंजन, आधुनिक रडार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणाली और घरेलू मिसाइल तकनीक भारत की भविष्य की सुरक्षा के वास्तविक आधार बन सकते हैं। आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग न केवल विदेशी निर्भरता कम करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में भी एक महत्वपूर्ण स्थान दिला सकता है।
दक्षिण एशिया की बदलती भू राजनीति यह स्पष्ट कर रही है कि आने वाला समय केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि तकनीक, कूटनीति और सामरिक दूरदृष्टि का होगा। बांग्लादेश और चीन का यह रक्षा सहयोग भारत के लिए चिंता का विषय अवश्य है, लेकिन उससे कहीं अधिक यह सजगता, संतुलित नीति और आत्मनिर्भर सैन्य क्षमता को मजबूत करने का अवसर भी है। राष्ट्रीय सुरक्षा का भविष्य केवल शक्तिशाली हथियारों से नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णयों और दीर्घकालिक रणनीतिक तैयारी से सुरक्षित होगा।





