प्रधानमंत्री मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का 30 अगस्त को 137 वां एपिसोड देश ने सुना। मैंने भी इसे ईस्ट दिल्ली में एक पार्क में सुना, जहां पर केन्द्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा मौजूद थे। मैंने महसूस किया कि देश मन की बात कार्यक्रम को बहुत मन से सुनता है।
विवेक शुक्ला
पिछले रविवार को ईस्ट दिल्ली के एक पार्क में सुबह से भीड़ जमा हो गई थी। व्यवसायी, पेशेवर, महिलाएं और नौजवान सब टीवी सेट के आगे बैठे थे। उनके बीच किसी सामान्य नागरिक की तरह से केन्द्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा भी विराजमान थे। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज आई, तो पार्क एक सभा-सा लगने लगा। यह दृश्य अकेला नहीं था। देश के हजारों स्थानों पर उसी सुबह वही आवाज सुनी जा रही थी। कार्यक्रम का नाम मन की बात है, और 30 अगस्त को इसका 137वां एपिसोड प्रसारित हुआ।
तीन अक्टूबर 2014 को विजयदशमी के दिन जब पहला एपिसोड आया, तब कई लोग हैरान थे। टेलीविजन और सोशल मीडिया के दौर में प्रधानमंत्री रेडियो क्यों चुनेंगे? वह चुनाव बाद में इसकी सबसे बड़ी ताकत निकला। देश के गांवों और दूरस्थ इलाकों में टीवी या तेज इंटरनेट हर जगह नहीं है, लेकिन आकाशवाणी का जाल वहां तक पहुंचता है। आज यह कार्यक्रम रेडियो के साथ दूरदर्शन, यूट्यूब और मोबाइल तक फैल चुका है, पर उसकी जड़ वही सरल माध्यम है।
प्रधानमंत्री बार-बार कहते हैं कि इसके असली एंकर देश के नागरिक हैं। हर महीने लाखों पत्र, संदेश और सुझाव आते हैं। कुछ लोग फोन पर अपनी बात रखते हैं। इन्हीं कहानियों को प्रधानमंत्री अपनी भाषा में पिरोते हैं। कोई किसान चाची, कोई घाट साफ करने वाला छात्र, कोई शिकारा चलाने वाला बच्चा, कोई गांव में बदलाव लाने वाली महिला। जब आम आदमी रेडियो पर अपनी जैसी जिंदगी सुनता है, तो दूरी घट जाती है। लगता है प्रधानमंत्री उसे जानते हैं।
भाषा इसमें सबसे बड़ा पुल है। भारी शब्द और आंकड़ों का ढेर नहीं होता। बात परिवार के बड़े सदस्य की तरह होती है। नारा नहीं, कहानी होती है। नसीहत नहीं, प्रेरणा होती है। रेडियो पर चेहरा नहीं, सिर्फ आवाज होती है। ईस्ट दिल्ली में मन की बात सुन रहे प्रख्यात आयकर सलाहकार सुरेन्द्र कुमार गंभीर कहते हैं कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें राजनीति नहीं होती। आवाज दिल तक पहुंचती है।
आईआईएम रोहतक की उस रिपोर्ट के अनुसार, जो आकाशवाणी के लिए तैयार हुई थी, देश की लगभग 96 प्रतिशत जनता इस कार्यक्रम से परिचित है। करीब 23 करोड़ लोग इसे नियमित सुनते हैं और 100 करोड़ से अधिक लोगों ने कम से कम एक बार सुना है। श्रोताओं ने लोकप्रियता का कारण सशक्त नेतृत्व और भावनात्मक जुड़ाव बताया। सर्वे में 60 प्रतिशत लोगों ने राष्ट्र निर्माण में रुचि दिखाई और 73 प्रतिशत ने माना कि देश सही दिशा में जा रहा है।
कार्यक्रम ने कई सामाजिक पहलों को बल दिया। पहले एपिसोड में खादी की बात हुई तो बिक्री बढ़ी। स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, वोकल फॉर लोकल और हर घर तिरंगा जैसी मुहिमों को इससे गति मिली। योग, पर्यावरण, स्टार्टअप, अंगदान, शिक्षा और स्वास्थ्य बार-बार आए। कोरोना काल में यह घर बैठे सही जानकारी का स्रोत बना।
यह सिर्फ बोलने का मंच नहीं, सुनने का भी माध्यम है। प्रधानमंत्री हर महीने सुझाव मांगते हैं। लोग लिखते हैं कि अगली बार किस विषय पर बात हो। इससे नागरिक को लगता है कि उसकी राय मायने रखती है। लोकतंत्र में संवाद दो तरफा होना चाहिए। मन की बात उसी संवाद का आधुनिक रूप है। भारत में इतने लंबे समय तक इतनी नियमितता से चलने वाला ऐसा कार्यक्रम दुर्लभ है।
एक और वजह सकारात्मकता है। खबरों में अक्सर नकारात्मक बातें छाई रहती हैं। यहां गुमनाम नायकों और छोटी-बड़ी सफलताओं की चर्चा होती है। युवा इसे यूट्यूब पर भी देखते हैं। शिक्षा जैसे विषय सबसे प्रभावशाली माने गए। कार्यक्रम कई भाषाओं और बोलियों में अनुवाद होकर पहुंचता है, इसलिए दक्षिण से पूर्वोत्तर तक श्रोता अपनी भाषा में सुन सकता है।
आलोचक इसे प्रचार कहते हैं। लेकिन बारह साल लगातार चलना और इतने लोगों तक पहुंचना आसान नहीं है। अगर लोग न सुनते तो यह इतना लंबा न चलता। कई श्रोता बताते हैं कि मन की बात के कारण वे फिर से रेडियो सुनने लगे।
आत्मीयता का सबसे गहरा कारण विश्वास है। जब नेता आम भाषा में, आम विषयों पर, आम लोगों की कहानी सुनाता है तो पद की ऊंचाई कम लगती है। लगता है कोई अपने में से ही बात कर रहा है। विविधताओं वाले देश में यह सरलता काम आती है।
बारह साल बाद भी हर महीने लोग इसका इंतजार करते हैं।कोई नया उदाहरण होगा, कोई नई पहल होगी। यही इंतजार आत्मीयता है। देश सुनता है क्योंकि उसे लगता है कि उसकी बात भी कहीं सुनी जा रही है। मन की बात इसलिए सिर्फ प्रधानमंत्री की बात नहीं रह गई। यह देश के मन की बात बन गई है। सरल भाषा, सच्ची कहानियां और सीधा संवाद ही इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। जब बात दिल से निकलती है, तो दिल तक पहुंचती है।





