मध्य एशिया में भारत का रणनीतिक अभ्युदय और उज्बेकिस्तान यात्रा

India's Strategic Rise in Central Asia and the Visit to Uzbekistan

अशोक भाटिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय उज्बेकिस्तान यात्रा केवल एक राजनयिक औपचारिकता मात्र नहीं थी, बल्कि यह बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव का एक ठोस घोषणापत्र बनकर उभरी है। ताशकंद के कुकसारोय राष्ट्रपति पैलेस में आयोजित एक विशेष गरिमामयी समारोह में उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव द्वारा पीएम मोदी को उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ ओली दाराजाली दोस्तलिक’ प्रदान किया जाना, इस बात का सीधा प्रमाण है कि दोनों देशों के रिश्ते अब सामान्य द्विपक्षीय विमर्श से कहीं आगे निकलकर एक प्रगाढ़ और अटूट रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं। प्रधानमंत्री का यह 36वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान वैश्विक पटल पर भारत की बढ़ती स्वीकार्यता और ‘विश्वमित्र’ की उसकी साख को और पुख्ता करता है। हालांकि, इस ऐतिहासिक यात्रा का वास्तविक मूल्यांकन केवल प्रतीकों और मेडल से नहीं, बल्कि उन रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा समझौतों से होना चाहिए जो भारत के दीर्घकालिक हितों को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।

उज्बेकिस्तान को मध्य एशिया का हृदय स्थल माना जाता है और इस भू-भाग में अपनी पैठ मजबूत किए बिना भारत अपने यूरेशियाई सपनों को साकार नहीं कर सकता। इस यात्रा का सबसे बड़ा और गेम-चेंजर नतीजा यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए एक स्थायी रणनीतिक ढांचे का निर्माण होना है। भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं और परमाणु ऊर्जा क्षमताओं के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन से इतर विकल्पों की तलाश कर रहा है। उज्बेकिस्तान दुनिया के शीर्ष यूरेनियम उत्पादक देशों में शामिल है, और वहां से परमाणु ईंधन की निर्बाध आपूर्ति का मार्ग प्रशस्त होना भारत की भावी ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। इस एकल समझौते ने भारत को ऊर्जा के मोर्चे पर एक बड़ी आत्मनिर्भरता और विविधता प्रदान की है। इसके साथ ही, दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक अपग्रेड कर दिया है। यह केवल एक शब्दावली नहीं है, बल्कि इसके तहत दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक आपसी व्यापार को 5 अरब डॉलर तक ले जाने का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां 1 अरब डॉलर के स्तर को पार कर चुकी हैं और संयुक्त उपक्रमों में सात गुना की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का दृष्टिकोण अब केवल कागजी समझौतों तक सीमित रहने का नहीं है, बल्कि उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया है कि समझौतों को फाइलों की धूल से निकालकर धरातल पर क्रियान्वित किया जाना चाहिए। इसी सोच के तहत भारत ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और शहरी नियोजन के अनुभवों को उज्बेकिस्तान के साथ साझा करने की प्रतिबद्धता जताई है। उज्बेकिस्तान द्वारा बनाए जा रहे ‘न्यू ताशकंद’ शहर के विकास में भारत अपने गुजरात के गिफ्ट सिटी के सफल मॉडल, आधुनिक तकनीक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुभवों का उपयोग करने का अवसर दे रहा है।

रक्षा और सुरक्षा के मोर्चे पर भी इस यात्रा ने एक नई इबारत लिखी है। दोनों देशों ने अपनी रक्षा प्रणालियों को सह-विकास और संयुक्त उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए अपनी रक्षा उद्योगों को प्रोत्साहित करने का फैसला किया है। आतंकवाद, कट्टरपंथ और अलगाववाद जैसी साझा चुनौतियों से निपटने के लिए दोनों देशों का एक साथ आना मध्य एशियाई क्षेत्र की स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत ने कनेक्टिविटी की बाधाओं को दूर करने के लिए डिजिटल भुगतान प्रणाली के विस्तार, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आयुर्वेद के क्षेत्र में भी उज्बेकिस्तान के साथ 11 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा, अरल सागर क्षेत्र में पर्यावरण पुनर्वास के लिए भारत द्वारा 1 मिलियन डॉलर का अनुदान देना यह साबित करता है कि भारत इस क्षेत्र के केवल आर्थिक दोहन में नहीं, बल्कि इसके सतत विकास में भी अपनी जिम्मेदारियां समझता है। सांस्कृतिक कूटनीति के स्तर पर, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज में आईसीसीआर संस्कृत चेयर की स्थापना और प्राचीन बौद्ध विरासत स्थलों के संरक्षण की पहल ने दोनों सभ्यताओं के ऐतिहासिक जुड़ाव को पुनर्जीवित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने उज्बेकिस्तान के इस सर्वोच्च सम्मान ‘दोस्तलिक’ का श्रेय भारत के 140 करोड़ नागरिकों और दोनों देशों की सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत को देकर कूटनीति में एक संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण का परिचय दिया।

विदेश नीति के मोर्चे पर सरकार की इस बड़ी कूटनीतिक सफलता के बावजूद, घरेलू राजनीति में इस पर तीखी और बंटी हुई प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। भारत की राजनीतिक परंपरा रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर अमूमन एक व्यापक सहमति दिखती है, लेकिन हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय दौरों और सम्मानों को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हुई है। कांग्रेस सहित मुख्य विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री को मिले सर्वोच्च सम्मान का स्वागत तो किया, लेकिन सरकार के इस दावों पर सवाल भी उठाए कि यह देश के इतिहास की सबसे अनूठी घटना है। विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि भारत के प्रधानमंत्रियों को अतीत में भी विभिन्न देशों से सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलते रहे हैं, और इसे किसी एक व्यक्ति की निजी छवि चमकाने के उपकरण के रूप में प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। विपक्ष ने इसे “इवेंट मैनेजमेंट” करार देते हुए कहा कि सरकार को विदेशी धरती पर मिलने वाले सम्मानों से अधिक ध्यान देश के आर्थिक संकट, बेरोजगारी और आंतरिक सुरक्षा पर देना चाहिए।

सामरिक विशेषज्ञों और विपक्षी विचारकों ने उज्बेकिस्तान के साथ 5 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को तो सराहा, लेकिन व्यावहारिक बाधाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। विपक्ष का कहना है कि पाकिस्तान द्वारा जमीनी मार्ग रोके जाने के कारण भारत के लिए मध्य एशिया तक सीधी पहुंच हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के विकास की सुस्त रफ्तार को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब तक कनेक्टिविटी के इन प्रोजेक्ट्स को युद्धस्तर पर पूरा नहीं किया जाता, तब तक उज्बेकिस्तान या किसी अन्य मध्य एशियाई देश के साथ बड़े व्यापारिक लक्ष्यों को हासिल करना केवल एक कागजी कोरी कल्पना ही बना रहेगा।

उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद का नाम आते ही भारत के मानस पटल पर पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु की यादें ताजा हो जाती हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में विपक्षी समर्थकों और कुछ क्षेत्रीय दलों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि ताशकंद की धरती पर होने के बावजूद, शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़े रहस्यों को उजागर करने या उस ऐतिहासिक संदर्भ पर कड़े राजनयिक प्रयास करने की दिशा में इस यात्रा में कोई ठोस बात सामने नहीं आई। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इतिहास के प्रतीकों का इस्तेमाल केवल अपनी सुविधा के अनुसार करती है। वामपंथी और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने भारत की पारंपरिक गुटनिरपेक्ष नीति के कमजोर होने की आशंका जताई। हालांकि, विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा यह संदेश देती है कि भारत किसी स्थायी खेमे या ब्लॉक (जैसे पश्चिमी देश या चीन-रूस ब्लॉक) का हिस्सा बनने के बजाय, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र और व्यावहारिक कूटनीति का संचालन कर रहा है। विपक्ष का एक वर्ग इस बात को लेकर भी सतर्क है कि शंघाई सहयोग संगठन और मध्य एशिया में चीन के भारी आर्थिक दबदबे के बीच भारत खुद को कितनी मजबूती से स्थापित कर पाता है, क्योंकि केवल ऋण और अनुदानों के छोटे पैकेजों से चीन की ‘चेकबुक डिप्लोमेसी’ का मुकाबला नहीं किया जा रहा है।

अंततः यह स्पष्ट है कि उज्बेकिस्तान की यह यात्रा भारत के लिए सामरिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी कामयाबी है। यूरेनियम आपूर्ति की गारंटी और यूरेशियाई क्षेत्र में भारत की मजबूत होती उपस्थिति देश के दूरगामी हितों को सुरक्षित करती है। जहां सत्तापक्ष इसे वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते दबदबे और प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व के रूप में देख रहा है, वहीं विपक्ष की आलोचनाएं सरकार को जमीन से जुड़े रहने, परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन और घरेलू मोर्चे पर चुनौतियों को न भूलने की याद दिलाती हैं। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि जहां विदेशी धरती पर देश का मान बढ़ता है, वहीं देश के भीतर उस सफलता के व्यावहारिक पहलुओं पर तीखी और तार्किक बहस भी जरूरी होती है।