कान्हा से सीखें जीने का सूत्र

Learn the secret of living from Kanha

डॉ वंदना शर्मा

श्री कृष्ण का पूर्ण जीवन ही हम सबके लिए आदर्श जीवन सूत्र है। योगी श्री कृष्ण ने हमें कर्म का महत्व बताया। कर्म करना ही मनुष्य के हाथ में है। फल ईश्वर के हाथ में। इसीलिए निष्काम होकर कर्म करना चाहिए।

श्री कृष्ण के जीवन से हमें एक बात जरूर सीखनी चाहिए कि इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है उसे संघर्ष तो करना ही पड़ता है। सुख-दुःख भी सभी के जीवन में आते हैं। लेकिन परिस्थितियों से कैसे निपटना है, ये सीखना है।

जब से कान्हा का जन्म हुआ उनसे सब कुछ छूटता चला गया। पैदा होते ही माँ-बाप का साथ छूटा। जिन माँ-बाप ने पाला उनका साथ भी 11 वर्ष की अवस्था में ही उनका भी साथ छूट गया। राधा रानी का संग छूटा। मथुरा भी छोड़कर द्वारका नगरी बसाई। फिर भी हमेशा उनके चेहरे पर एक मधुर मुस्कान रही। उनका स्थिर मन, शांत चितवन हमें सीख देती है कि दुःख तो आते रहते हैं। विधि का लेख अमिट है, होकर ही रहेगा लेकिन अतीत को याद कर वर्तमान को व्यर्थ नहीं करना चाहिए। धर्म की रक्षा के लिए स्व बलिदान से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।

आज मैं यहाँ भारतवर्ष के वर्तमान पर कुछ चर्चा करना चाहती हूँ। हमारा देश युवा शक्ति वाला देश है। लेकिन हमारे युवा इस समय दिशा भ्रमित हैं, शिक्षा व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है। बेरोजगारी और संस्कारहीनता ने युवाओं को मानसिक अवसाद, उन्माद और अपराध की ओर धकेला है।

ऐसे में श्री कृष्ण का जीवन दर्शन ही हमें राह दिखा सकता है।

कान्हा ने हमें सिखाया कि जीवन में कितनी भी बड़ी बाधा क्यों न आए, मन को विचलित नहीं करना है। कंस जैसे आततायी का वध करने के लिए उन्होंने सही समय की प्रतीक्षा की। आज के युवा को भी यही सीखने की जरूरत है। सोशल मीडिया की चकाचौंध, तुरंत सब कुछ पा लेने की होड़ में वह धैर्य खो रहा है। कृष्ण हमें धैर्य, संयम और सही समय पर सही निर्णय लेना सिखाते हैं।

दूसरा सूत्र है – योगेश्वर होने के बाद भी कर्मयोगी बने रहना। उन्होंने गीता में कहा – “योगः कर्मसु कौशलम्।” अर्थात कुशलता से कर्म करना ही योग है। आज का युवा नौकरी न मिलने पर निराश हो जाता है। जबकि उसे कौशल विकास पर ध्यान देना चाहिए। केवल डिग्री नहीं, अपने कर्म में निपुणता हासिल करनी चाहिए।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है – प्रेम और कर्तव्य में संतुलन। राधा से प्रेम किया तो अनंत प्रेम किया, पर कर्तव्य के लिए मथुरा छोड़ना पड़ा तो छोड़ दिया। प्रेम में आसक्ति नहीं, समर्पण होना चाहिए। आज के रिश्ते टूटने का कारण यही आसक्ति और अपेक्षा है। कान्हा सिखाते हैं कि प्रेम बंधन नहीं, मुक्ति है।

अंत में, श्री कृष्ण ने सिखाया कि जीवन एक उत्सव है। बांसुरी बजाते हुए, मुस्कुराते हुए हर परिस्थिति का सामना करो। जन्माष्टमी केवल एक त्यौहार नहीं, एक जीवन पद्धति है।

आओ इस जन्माष्टमी पर हम संकल्प लें कि हम दुःख में भी मुस्कुराएंगे, निष्काम भाव से कर्म करेंगे और अपने राष्ट्र को फिर से विश्वगुरु बनाने के लिए अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। यही कान्हा को सच्ची भेंट होगी उनकी जन्मदिन की।