प्रेम प्रकाश
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जब हाथ मिलाते हुए सोन नदी जल समझौते की फाइल एक-दूसरे को सौंपी, तो यह कोई साधारण घटना नहीं थी। करीब 25 वर्षों से लंबित एक अंतर्राज्यीय जल विवाद के समाधान की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम था। अच्छी बात यह रही कि मीडिया ने भी इस खबर में दिलचस्पी ली और इसे ठीक-ठाक कवरेज मिला। लेकिन इस समझौते की अहमियत एक दिन की खबर बनकर थम जाने से कहीं ज्यादा है।
दरअसल, यह समझौता उस बड़े बदलाव पर ठहरकर सोचने का अवसर देता है, जो पिछले एक दशक में भारत के नदी-जल संबंधों में दिखाई देता है। नदी जल प्रवाह और उससे जुड़े सरोकारों में हो रहे बदलावों के बीच अंतर्राज्यीय जल के सवाल अब केवल विवादों, दावों और अधिकारों तक सीमित नहीं रह गए हैं। वे संवाद और सहमति की मेज तक पहुंच रहे हैं। सोन समझौता इसी बदलती सोच और नए जल-संबंधों का महत्वपूर्ण उदाहरण है। आज जरूरत सिर्फ यह देखने की नहीं है कि कौन-सी नदी कितनी बही, कहां बाढ़ आई या किस राज्य को कितना पानी मिला; जरूरत यह समझने की भी है कि समाज और सरकार का नदियों के साथ रिश्ता कैसे बदल रहा है और इन बदलावों से हमने क्या सबक सीखे हैं।
नदियों का बहाव और स्वरूप इस बदलाव की सबसे कठिन परीक्षा हैं। उनकी कोई प्रशासनिक सीमा नहीं होती, जबकि पानी के उपयोग और अधिकार राज्यों में बंटे हैं। दशकों तक कई अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद चलते रहे और अनेक मामले न्यायाधिकरणों तथा अदालतों तक पहुंचे। ऐसे में 2026 का घटनाक्रम खास महत्व रखता है। इस वर्ष अब तक चार महत्वपूर्ण अंतर्राज्यीय जल समझौते हुए हैं—किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना, यमुना जल परियोजना, नर्मदा से जुड़े लंबित वित्तीय मुद्दे और बिहार-झारखंड के बीच सोन नदी जल-बंटवारा समझौता।
सोन समझौते की अहमियत महज इसलिए नहीं है कि इसने करीब 25 साल पुराने विवाद को समाधान की दिशा दी, बल्कि इसलिए भी है कि इसके पीछे संवाद और केंद्रीय समन्वय की भूमिका रही। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की पहल और मध्यस्थता इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रही। 31 अगस्त को नई दिल्ली में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की उपस्थिति में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।
यह समझौता महज पानी के बंटवारे का करार नहीं, बल्कि सहकारी संघवाद के जरिए लंबे समय से अटके अंतर्राज्यीय जल विवादों को सुलझाने की नई कार्यसंस्कृति का उदाहरण है। समझौते से बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना जैसे जिलों में सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ने की संभावना है, वहीं झारखंड के पलामू, गढ़वा और अन्य क्षेत्रों को भी लाभ मिलेगा। बिहार की प्रस्तावित इंद्रपुरी जलाशय परियोजना सहित सिंचाई और जल-संचयन से जुड़ी योजनाओं के आगे बढ़ने का रास्ता भी इससे साफ हुआ है। इस लिहाज से सोन समझौता बताता है कि लंबे समय से अटके नदी-जल प्रश्नों का समाधान केवल कानूनी लड़ाई में नहीं, बल्कि संवाद, केंद्रीय समन्वय और साझा विकास हितों में भी तलाशा जा सकता है।
इसी दिशा के दूसरे उदाहरण केन-बेतवा और संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदी जोड़ो परियोजनाएं हैं। मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश-राजस्थान के बीच बनी सहमतियां बताती हैं कि नदियां अब केवल जल-बंटवारे का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास और साझा जल-सुरक्षा की परियोजनाओं का आधार भी बन रही हैं।
फिर भी 2026 की परिस्थितियां एक जरूरी सवाल सामने रखती हैं। क्या नदी प्रबंधन को केवल बांध, बराज, तटबंध और जलाशयों के नजरिये से देखा जा सकता है? शायद नहीं। नदी का प्राकृतिक प्रवाह, उसका जलग्रहण क्षेत्र, बाढ़ का मैदान, भूजल, पारिस्थितिकी और उससे जुड़े समुदाय—सब एक ही नदी-तंत्र के हिस्से हैं। कोसी जैसी सीमा-पार नदियां यह भी बताती हैं कि नदी प्रबंधन केवल राज्यों के बीच सहयोग का विषय नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ सतत समन्वय का भी प्रश्न है।
इसी व्यापक संदर्भ में पिछले एक दशक की भारत की जल-यात्रा को देखें तो तस्वीर बदलती दिखाई देती है। जल नीति की दृष्टि केवल पानी जुटाने और बांटने से आगे बढ़कर संरक्षण, जल-सुरक्षा और साझा प्रबंधन की ओर बढ़ी है। खासतौर पर 2019 में जल शक्ति मंत्रालय का गठन इस बदलाव का महत्वपूर्ण संस्थागत पड़ाव था। नमामि गंगे ने नदी को केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवित इकोसिस्टम के रूप में देखने की समझ को मजबूत किया। जल जीवन मिशन ने पेयजल को केवल पहुंच नहीं, बल्कि नियमित सेवा से जोड़ा। भूजल प्रबंधन ने यह स्पष्ट किया कि जमीन के नीचे का पानी असीमित भंडार नहीं है। धीरे-धीरे स्रोत, उपयोग, संरक्षण और पुन: उपयोग को एक ही जल-चक्र में देखने की समझ विकसित हुई।
इस बदलाव के बावजूद चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। आने वाले वर्षों में संकट केवल भूजल दोहन या नदी प्रदूषण तक सीमित नहीं रहेगा। बदलते मौसम के साथ कम समय में अत्यधिक वर्षा, अचानक बाढ़, लंबे सूखे और जल उपलब्धता में बढ़ती अनिश्चितता नदी प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्थाओं की परीक्षा लेंगी। इसलिए नदियों को केवल जलधारा नहीं, बल्कि पूरे नदी-तंत्र के रूप में समझना होगा। जलग्रहण क्षेत्र, बाढ़ के मैदान, भूजल, जलाशय और पारिस्थितिकी को एक साथ देखते हुए विकास की योजना बनानी होगी। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और बाढ़ के लिए उपलब्ध स्थान को बचाना होगा। वहीं कोसी जैसी सीमा-पार नदियों के मामले में भारत और पड़ोसी देशों के बीच वास्तविक समय के आंकड़ों, पूर्व चेतावनी और संयुक्त बाढ़ प्रबंधन को नई प्राथमिकता देनी होगी।
बीते दशक में बनी जल-सुरक्षा की संस्थागत नींव को अब नदी-घाटी आधारित, जलवायु-संवेदी और सहयोगात्मक जल-नीति में बदलने का वक्त है। सोन समझौते जैसे उदाहरण बताते हैं कि आने वाले समय में जल-सुरक्षा का रास्ता सिर्फ नई परियोजनाओं से नहीं, बल्कि राज्यों के बीच विश्वास, संवाद और साझा हितों से भी निकलेगा। अगला दशक तय करेगा कि हम नदियों को सिर्फ पानी और बाढ़ के स्रोत के रूप में देखते हैं या उन्हें जीवित, साझा और गतिशील प्राकृतिक तंत्र मानकर अपनी नीतियां बनाते हैं। यही चुनाव भारत की आने वाली जल-सुरक्षा की दिशा तय करेगा।





