नेताओं की मेज पर दुनिया, जनता की मेज पर सवाल

The world is on the table of the leaders, questions are on the table of the people

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

दिल्ली इन दिनों राजधानी नहीं, दुनिया की कूटनीति का बड़ा पड़ाव है। सड़कों पर झंडे, होटलों में विदेशी मेहमान और भारत मंडपम में ब्रिक्स का मंच तैयार है। पुतिन पहुंच चुके हैं, शी जिनपिंग आने वाले हैं और मोदी मेजबान हैं। कैमरे मुलाकात दर्ज करेंगे, दुनिया नतीजे देखेगी। उम्मीद है, पुतिन-शी-मोदी की बैठक ब्रिक्स को नई दिशा देगी। लेकिन दिशा की परीक्षा मंजिल पर होती है। सवाल यह नहीं कि कितनी देर बैठक होगी या कितनी तस्वीरें आएंगी; सवाल है कि बंद कमरे का फैसला उस आदमी तक कब पहुंचेगा, जो तेल का भाव सुनकर जेब टटोलता है। क्या महंगाई को राहत मिलेगी, ऊर्जा संकट का रास्ता निकलेगा या फिर एक चमकदार बयान ही आएगा?

इस त्रिकोण की अहमियत है कि तीनों देशों के हित अलग हैं। रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा है, चीन सीमाओं और व्यापारिक विस्तार में व्यस्त है, जबकि भारत दोनों से रिश्ते निभाते हुए स्वतंत्र राह तलाश रहा है। गलवान की कड़वी स्मृति के बाद करीब सात साल में शी जिनपिंग का दिल्ली आना सामान्य यात्रा नहीं है। यह भरोसे की वापसी है, मजबूरी या रणनीतिक जरूरत—समय बताएगा। उधर ईरान युद्ध ने पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है और कच्चा तेल सौ डॉलर प्रति बैरल के पार है। दुनिया महंगाई की चक्की में पिस रही है। ऐसे में ब्रिक्स की मेज पर ‘सहयोग’, ‘बहुपक्षवाद’ और ‘ग्लोबल साउथ’ जैसे शब्द ही गूंजते रहे, तो पेट्रोल सस्ता नहीं होगा। जनता को नारे नहीं, नतीजे चाहिए।

ब्रिक्स अब पांच देशों का पुराना क्लब नहीं रहा। ग्यारह सदस्य और पार्टनर देश जुड़ चुके हैं। दायरा बढ़ा है तो चुनौतियां भी बढ़ी हैं। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन बड़े सवाल हैं, क्योंकि युद्ध की मार सीमा से निकलकर खेत, कारखाने, रसोई और बाजार तक पहुंचती है। इतने देशों में सहमति आसान नहीं। ईरान और यूएई के मतभेद इसका उदाहरण हैं। साझा बयान बन सकता है, साझा रास्ता कठिन है। भारत चाहता है कि ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी गुट नहीं, पूरक शक्ति बने। अमेरिका से रिश्ते भी रखने हैं और रूस-चीन से संवाद भी। भारत की कूटनीति इसी रस्सी पर है—दुनिया तालियां भी बजा रही है और हर कदम का हिसाब भी रख रही है।

इस सम्मेलन की कीमत दिल्ली का आम नागरिक चुका रहा है। सड़कें बंद हैं, ट्रैफिक थमा है, मेट्रो में भीड़ है और करीब पंद्रह हजार पुलिसकर्मी तैनात हैं। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन मेहमानों के स्वागत में मेजबान की राह बंद हो तो सवाल उठता है। महंगाई और बारिश के बीच आम परिवार पहले ही परेशान हैं। पोषण माह में बच्चों के स्वास्थ्य की बात हो रही है, पर महंगाई में पौष्टिक भोजन जुटाना भी मुश्किल है। ब्रिक्स की सफलता तभी होगी, जब इसकी गूंज टीवी से निकलकर गांव की चौपाल, किसान के खेत, मजदूर की थाली और मध्यमवर्ग की रसोई तक पहुंचे। वरना मंच चमकेगा, जनता की जिंदगी नहीं।

पुतिन के साथ रक्षा सहयोग भारत-रूस रिश्तों की ताकत है। ब्रह्मोस, सुखोई और एस-400 सिर्फ हथियार नहीं, सामरिक रिश्तों की पहचान हैं। भारत आत्मनिर्भर बनना चाहता है, लेकिन इसका मतलब सिर्फ देश में उत्पादन नहीं, संकट में किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न रहना भी है। रूस से सहयोग बढ़ाते हुए देखना होगा कि निर्भरता घट रही है या रूप बदल रही है। शी जिनपिंग से बातचीत और संवेदनशील है। सीमा विवाद और व्यापार घाटे पर मुस्कान नहीं, स्पष्टता चाहिए। गलवान के बाद हाथ मिलाना अच्छी तस्वीर है, लेकिन रिश्ते तभी सुधरेंगे जब सीमा पर भरोसा और व्यापार में संतुलन दिखे।

मौसम ने भी याद दिला दिया है कि दुनिया की समस्याएं सिर्फ राजधानियों में नहीं सुलझतीं। देश के कई हिस्सों में भारी बारिश का अलर्ट है और चक्रवातों का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन ब्रिक्स के एजेंडे में सिर्फ औपचारिकता नहीं, ठोस कार्रवाई बनना चाहिए। प्रकृति भाषण नहीं सुनती। बाढ़ आती है तो गरीब का घर उजड़ता है, किसान की फसल डूबती है और राहत की सबसे ज्यादा जरूरत उसी को होती है। खाद्य सुरक्षा की बात हो तो किसान तक मदद पहुंचे, ऊर्जा सुरक्षा की चर्चा हो तो तेल संकट में विकासशील देशों को राहत मिले और आपदा प्रबंधन की सहमति चेतावनी को समय पर राहत में बदले। वरना फाइलें मोटी होती रहेंगी, संकट नहीं घटेगा।

यहीं भारत की असली परीक्षा है। रूस से मित्रता, चीन की चुनौती और अमेरिका से रणनीतिक रिश्ते—तीनों साधने हैं। साथ ही ब्रिक्स को किसी एक खेमे का औजार बनने से रोकना है। भारत रूस-चीन के बीच संवाद का पुल बने, ऊर्जा और खाद्य संकट पर व्यावहारिक सहयोग जुटाए और अपने हित स्पष्ट रखते हुए सभी से रिश्ते साधे, तभी ब्रिक्स की नई दिशा उसकी कूटनीतिक उपलब्धि होगी। लेकिन पुल की विडंबना है—सब उस पर से गुजरते हैं, वह दो किनारों के बीच खड़ा रहता है। भारत को सिर्फ पुल नहीं, अपनी जमीन भी मजबूत करनी है। यही बैठक की सबसे कठिन कसौटी है।

फैसला मंच की चमक नहीं, उसका असर करेगा। पुतिन आए, शी आए, मोदी ने स्वागत किया, कैमरे चमके—इतना इतिहास नहीं बनाता। इतिहास वे फैसले याद रखता है, जो जिंदगी बदलते हैं। ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज बनना है तो व्यापार आसान, ऊर्जा संकट का हल, खाद्य सुरक्षा को किसान-उपभोक्ता से जोड़ना, सप्लाई चेन मजबूत करना और भारत-चीन सीमा विवाद व व्यापार घाटे पर ठोस कदम जरूरी हैं। दिल्ली सज चुकी है, दुनिया की नजर मंच पर है। अब देखना है—मंच से उतरते समय हाथ में बयान होंगे या बदलाव? अगर हालात वही रहे और शब्द बदल गए, तो यह भी उन सम्मेलनों में जुड़ जाएगा, जहां नारे बहुत लगे, मगर पेट की आग नहीं बुझी। उम्मीद है, इस बार इतिहास तस्वीर नहीं, परिणाम याद रखे।