हरतालिका तीज : शिव पार्वती के पावन मिलन की अनश्वर परंपरा

Hartalika Teej: The eternal tradition of the sacred union of Shiva and Parvati

महेन्द्र तिवारी

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाने वाला हरतालिका तीज भारतीय संस्कृति के सबसे पवित्र और भावनात्मक पर्वों में से एक है। यह केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, धैर्य, आत्मबल और अटूट संकल्प का ऐसा उत्सव है जिसने सदियों से भारतीय समाज में दांपत्य जीवन के आदर्शों को जीवित रखा है। वर्ष 2026 में पंचांग के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। उदया तिथि के आधार पर इसी दिन निर्जला व्रत, शिव पार्वती पूजन और रात्रि जागरण का विशेष विधान माना गया है।

हरतालिका शब्द अपने भीतर एक सुंदर कथा समेटे हुए है। इसका अर्थ है सखी द्वारा हरण किया जाना। पौराणिक मान्यता के अनुसार हिमालय की पुत्री पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। दूसरी ओर उनके पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने का निश्चय कर लिया। पार्वती की इच्छा जानकर उनकी प्रिय सखी उन्हें वन में ले गई ताकि वे किसी प्रकार का दबाव स्वीकार न करें और अपने संकल्प की रक्षा कर सकें। उसी वन में माता पार्वती ने कठोर तपस्या और निर्जला उपवास किया। उनकी अनन्य भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी घटना की स्मृति में हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है।

इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बाहरी वैभव से अधिक आंतरिक निष्ठा का उत्सव है। माता पार्वती का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि धैर्य, संयम और आत्मसमर्पण से प्राप्त होता है। उनका तप केवल पति प्राप्ति का साधन नहीं था, बल्कि अपने जीवन के सत्य को पहचानने और उसके प्रति अडिग रहने का उदाहरण था। यही कारण है कि हरतालिका तीज भारतीय नारी के आत्मसम्मान और दृढ़ निश्चय का भी प्रतीक माना जाता है।

भारत के अनेक राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह पर्व अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। कहीं महिलाएं समूह बनाकर पारंपरिक गीत गाती हैं, कहीं मंदिरों में शिव पार्वती की झांकी सजती है, तो कहीं घरों में मिट्टी अथवा बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा की जाती है। विभिन्न क्षेत्रों की लोक परंपराएं अलग हो सकती हैं, किंतु भावना एक ही रहती है कि जीवन में प्रेम और विश्वास बना रहे तथा परिवार सुखी और समृद्ध रहे।

हरतालिका तीज का निर्जला व्रत अत्यंत कठिन माना गया है। अनेक महिलाएं सूर्योदय से लेकर अगले दिन तक जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करतीं। इस कठोर अनुशासन के पीछे केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि आत्मसंयम की साधना भी छिपी हुई है। उपवास मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाता है। जब शरीर की आवश्यकताओं पर संयम रखा जाता है, तब मन अधिक एकाग्र होकर आराधना में लग पाता है। भारतीय ऋषि परंपरा में उपवास को आत्मशुद्धि का माध्यम माना गया है और हरतालिका तीज उसी विचार को जनजीवन में प्रतिष्ठित करती है।

पूजा की तैयारी भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रातः स्नान के बाद महिलाएं स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और सोलह श्रृंगार से स्वयं को अलंकृत करती हैं। हरे, लाल और पीले रंग के वस्त्र विशेष शुभ माने जाते हैं। पूजा स्थल पर कलश स्थापित किया जाता है। मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता गौरी और श्री गणेश की प्रतिमा अथवा शिवलिंग बनाया जाता है। बेलपत्र, पुष्प, दूर्वा, अक्षत, रोली, हल्दी, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के पश्चात हरतालिका व्रत कथा का श्रवण और शिव पार्वती की आरती की जाती है।

इस पर्व में श्रृंगार का भी गहरा सांस्कृतिक महत्व है। मेहंदी, चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर और चुनरी केवल सौंदर्य की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि भारतीय वैवाहिक जीवन के मंगल प्रतीक माने जाते हैं। मेहंदी का गहरा रंग प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। आज भी तीज से एक दिन पहले गांवों और शहरों में महिलाएं मिलकर मेहंदी रचाती हैं, लोकगीत गाती हैं और उत्सव का वातावरण बनाती हैं। आधुनिक समय में भी यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का सुंदर माध्यम बनी हुई है।

हरतालिका तीज केवल विवाहित महिलाओं का पर्व नहीं है। अनेक अविवाहित कन्याएं भी माता पार्वती का व्रत रखती हैं और योग्य जीवनसाथी की कामना करती हैं। यहां योग्य जीवनसाथी का अर्थ केवल सुंदर या संपन्न व्यक्ति नहीं, बल्कि ऐसा साथी है जो सम्मान, विश्वास और समानता पर आधारित संबंध निभा सके। इस दृष्टि से यह पर्व विवाह संस्था के नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करता है। माता पार्वती और भगवान शिव का दांपत्य भारतीय परंपरा में परस्पर सम्मान, सहयोग और आध्यात्मिक समानता का आदर्श माना गया है।

लोकगीतों के बिना हरतालिका तीज की कल्पना अधूरी है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में महिलाएं पूरी रात जागरण करती हैं और शिव विवाह, पार्वती की तपस्या तथा सखी संवाद पर आधारित गीत गाती हैं। इन गीतों में केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि लोकजीवन की सहज संवेदनाएं भी झलकती हैं। कहीं बेटी अपने मायके की याद करती है, कहीं सखी वर्षा ऋतु का वर्णन करती है, तो कहीं भोलेनाथ से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगा जाता है। यही लोकसंगीत पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी मौखिक सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखे हुए है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो हरतालिका तीज महिलाओं के सामूहिक संवाद का भी अवसर है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच यह पर्व उन्हें एक दूसरे से मिलने, अनुभव साझा करने और भावनात्मक सहयोग देने का अवसर प्रदान करता है। गांवों में सामूहिक पूजा और नगरों में महिला मंडलों द्वारा आयोजित कार्यक्रम सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, वे समाज को जोड़ने वाले सांस्कृतिक सूत्र भी होते हैं। हरतालिका तीज इस सत्य का सजीव उदाहरण है।

पर्यावरण के संदर्भ में भी इस पर्व का एक सकारात्मक संदेश है। परंपरागत रूप से पूजा में मिट्टी, पत्तों, पुष्पों और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता रहा है। मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजन करना हमें प्रकृति के प्रति विनम्रता का भाव सिखाता है। आज जब पर्यावरण संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय है, तब आवश्यक है कि तीज के उत्सव में प्लास्टिक और कृत्रिम सजावट के स्थान पर प्राकृतिक एवं पर्यावरण अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जाए। यही भारतीय संस्कृति की मूल भावना भी है, जिसमें प्रकृति और परमात्मा को अलग नहीं माना गया।

आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने त्योहारों के स्वरूप में परिवर्तन अवश्य किया है, किंतु हरतालिका तीज की आत्मा आज भी अक्षुण्ण है। महानगरों में रहने वाली महिलाएं कार्यालय की जिम्मेदारियों के साथ व्रत निभाती हैं। अनेक परिवार दूर रहकर भी डिजिटल माध्यम से कथा सुनते हैं, मंदिरों के दर्शन करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं भेजते हैं। साधन बदल गए हैं, पर श्रद्धा और आस्था का भाव वही बना हुआ है। यह परिवर्तन भारतीय संस्कृति की जीवंतता को दर्शाता है, जो समय के साथ स्वयं को ढालते हुए भी अपने मूल्यों को सुरक्षित रखती है।

हरतालिका तीज का संदेश पुरुषों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना महिलाओं के लिए। भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध समानता, सम्मान और संवाद पर आधारित है। शिव अर्धनारीश्वर रूप में यह बताते हैं कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इस पर्व को केवल महिलाओं के व्रत के रूप में नहीं, बल्कि पारिवारिक जीवन में परस्पर विश्वास और संवेदनशीलता के उत्सव के रूप में देखना चाहिए। जब दांपत्य संबंध अधिकार के बजाय सहयोग पर आधारित होते हैं, तभी परिवार सुख और शांति का केंद्र बनता है।

अंततः हरतालिका तीज भारतीय जीवन दर्शन का ऐसा पर्व है जो तप को प्रेम से, श्रद्धा को संस्कृति से और परिवार को आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ता है। माता पार्वती की अटूट तपस्या हमें अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण का संदेश देती है, जबकि भगवान शिव का स्वीकार हमें सिखाता है कि सच्चे संबंध विश्वास और आत्मीयता पर टिके होते हैं। यही कारण है कि हर वर्ष भाद्रपद की तृतीया आते ही लाखों दीपों की ज्योति, मेहंदी की सुगंध, लोकगीतों की मधुर ध्वनि और शिव पार्वती की आराधना के बीच हरतालिका तीज केवल एक पर्व नहीं रहती, बल्कि भारतीय संस्कृति की अमर चेतना का उत्सव बन जाती है।