रुम्मान खान
मुंबई अंडरवर्ल्ड का कभी बेहद चर्चित नाम रहे अबू सलेम की जेल से समयपूर्व रिहाई की उम्मीद को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बड़ा झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दावा किया था कि पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किए जाने के बाद 25 वर्ष की अवधि पूरी हो चुकी है और अब उसे जेल से रिहा किया जाना चाहिए। अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के अप्रैल 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि अबू सलेम की प्रत्यर्पण से जुड़ी 25 वर्ष की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।
अबू सलेम के लिए यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी पूरी कानूनी रणनीति इसी 25 वर्ष की अवधि के आसपास घूमती रही है। उसका तर्क था कि जेल में बिताई गई अवधि, अंडरट्रायल के तौर पर बिताया गया समय और उसे मिले रिमिशन को जोड़कर देखा जाए तो उसकी सजा की निर्धारित अवधि पूरी हो चुकी है। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
दरअसल, अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत लाने की कहानी भी अपने आप में बेहद दिलचस्प है। भारत को उसके प्रत्यर्पण के लिए पुर्तगाल के सामने यह आश्वासन देना पड़ा था कि उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा और उसकी कैद 25 वर्ष से अधिक नहीं होगी। उस समय यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और कानूनी चुनौती थी। एक तरफ भारत को 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट जैसे गंभीर अपराध के आरोपी को देश में वापस लाना था, तो दूसरी तरफ पुर्तगाल की अदालतों के सामने प्रत्यर्पण की शर्तों को लेकर जवाब देना था।
भारत आखिरकार अबू सलेम को वापस लाने में सफल रहा। लेकिन जिस 25 वर्ष की सीमा ने प्रत्यर्पण का रास्ता खोला था, वही सीमा बाद में अबू सलेम की कानूनी लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार बन गई।
यहीं पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख महत्वपूर्ण हो जाता है।
अदालत ने मूल भावना को बरकरार रखा है कि भारत पुर्तगाल से किए गए अपने वादे से पीछे नहीं हट सकता, लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि उस 25 वर्ष की अवधि को सामान्य जेल रिमिशन के जरिए और कम कर दिया जाए। यानी 25 वर्ष की अधिकतम सीमा को अबू सलेम अपनी सुविधा के हिसाब से घटाकर तत्काल रिहाई का आधार नहीं बना सकता।
कानून की यही बारीकी इस पूरे मामले को खास बनाती है।
अबू सलेम को 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा मिली। उसके खिलाफ अन्य गंभीर आपराधिक मामलों में भी मुकदमे चले और सजा हुई। एक समय मुंबई के अपराध जगत में उसका नाम दहशत, वसूली, हत्या और अंडरवर्ल्ड नेटवर्क से जोड़ा जाता था। वह देश से बाहर चला गया था और लंबे समय तक भारतीय जांच एजेंसियों की पहुंच से दूर रहा। लेकिन अंततः उसे भारत लाया गया और अदालतों के सामने जवाब देना पड़ा।
अब इस पूरे घटनाक्रम को पीछे मुड़कर देखें तो एक बड़ा संदेश दिखाई देता है।
अपराध कितना भी संगठित क्यों न हो, उसकी पहुंच कितनी भी दूर तक क्यों न हो, कानून की प्रक्रिया से हमेशा के लिए बच निकलना आसान नहीं है। अबू सलेम की कहानी उन लोगों के लिए भी एक उदाहरण है जो यह मानते हैं कि देश छोड़ देने से भारतीय कानून की पहुंच खत्म हो जाती है।
इस मामले में एक और दिलचस्प पहलू है। अबू सलेम की रिहाई की मांग किसी सामान्य कैदी की रिहाई की मांग नहीं है। उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण की पूरी व्यवस्था जुड़ी हुई है। भारत ने जिस देश से उसे वापस लाया, वहां एक संप्रभु आश्वासन दिया गया था। अगर भारत बाद में उस आश्वासन को नजरअंदाज करता तो भविष्य में दूसरे देशों से अपराधियों के प्रत्यर्पण को लेकर भारत की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ सकते थे।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल अबू सलेम के मामले तक सीमित नहीं है। इसका असर भविष्य के उन तमाम मामलों पर भी पड़ेगा, जहां किसी आरोपी या दोषी को दूसरे देश से भारत लाने के लिए भारत सरकार को विशेष कानूनी या कूटनीतिक आश्वासन देना पड़ता है।
अबू सलेम ने जिस 25 वर्ष की अवधि को अपनी आजादी का रास्ता समझा था, अदालत ने उसी अवधि की कानूनी प्रकृति को स्पष्ट कर दिया है। 25 वर्ष पूरे होने से पहले उसे केवल इस आधार पर रिहाई नहीं मिल सकती कि जेल में उसे कुछ रिमिशन मिला है।
इसका मतलब यह है कि अबू सलेम की नजरें नवंबर 2030 पर टिक गई हैं।
हालांकि 2030 का अर्थ भी यह नहीं है कि वह तारीख आते ही हर परिस्थिति में उसी क्षण जेल के दरवाजे खुल जाएंगे। उस समय प्रत्यर्पण की शर्तों, सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों और सरकार की संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार आगे की कार्रवाई का सवाल सामने आएगा। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि फिलहाल 25 वर्ष की अवधि को छोटा करके अबू सलेम को समयपूर्व रिहाई दिलाने की कोशिश सुप्रीम कोर्ट में सफल नहीं हुई।
संपादकीय नजरिए से देखें तो इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अदालतें अपराधी की पहचान देखकर नहीं, कानून देखकर फैसला करती हैं। अबू सलेम कभी अंडरवर्ल्ड का बड़ा नाम रहा होगा, लेकिन अदालत में उसकी पहचान सिर्फ एक दोषसिद्ध व्यक्ति की है, जिसके अधिकार और सीमाएं कानून तय करता है।
यह भी याद रखना होगा कि 1993 के मुंबई धमाकों ने देश को झकझोर दिया था। उस दौर में आतंक, अंडरवर्ल्ड और अपराध के गठजोड़ ने मुंबई ही नहीं, पूरे देश की सुरक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की थी। ऐसे मामले में दोषसिद्ध व्यक्ति की सजा और रिहाई का सवाल केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि पीड़ितों और न्याय की सामाजिक भावना से भी जुड़ जाता है।
अबू सलेम ने अदालतों में अपने लिए कानून के भीतर राहत तलाशने की कोशिश की और यह उसका अधिकार भी है। लेकिन अदालत ने यह तय कर दिया है कि राहत की तलाश और प्रत्यर्पण की शर्तों की अपनी कानूनी सीमा होती है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यही है कि कभी जिस व्यक्ति को पकड़ना भारत के लिए बड़ी चुनौती था, आज वही व्यक्ति अपनी आजादी के लिए भारतीय न्याय व्यवस्था के हर कानूनी दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
अंडरवर्ल्ड की ताकत, विदेश में छिपने की कोशिश, प्रत्यर्पण की लंबी लड़ाई, अदालतों में वर्षों तक चली सुनवाई और अब समयपूर्व रिहाई की कोशिश—अबू सलेम की कहानी अपराध जगत से निकलकर भारतीय न्याय व्यवस्था की एक लंबी कानूनी कहानी बन चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है।
फिलहाल अबू सलेम को जेल में ही रहना होगा। 25 वर्ष की वह अवधि, जिसे वह पहले ही पूरा हुआ मान रहा था, अदालत की गणना में अभी पूरी नहीं हुई है। नवंबर 2030 अब उसके लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
और शायद इस पूरे मामले की सबसे बड़ी सीख यही है—अपराधी कानून से बचने के लिए दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए, लेकिन जब कानून उसे वापस ले आता है तो आखिरी फैसला ताकत का नहीं, अदालत का होता है।





