दशलक्षण पर्व — धर्म के दस पड़ाव, खुद से मिलने की एक यात्रा

Dashalakshan Parva — Ten milestones of Dharma, a journey to meet oneself

कृति आरके जैन

आज मनुष्य घर, वस्तुओं और परिवेश को साफ रखने में जितना सजग है, उतना ही अपने भीतर की अशांति से अनजान है। दिगंबर जैन समाज का दशलक्षण पर्व इसी भीतर की सफाई का अवसर है। 16 से 25 सितंबर तक चलने वाला यह पर्व क्रोध, अहंकार, छल, लोभ और आसक्ति जैसी प्रवृत्तियों को पहचानने और संयमित करने की प्रेरणा देता है। भौतिक सुविधाएं बढ़ने के बावजूद यदि मन अशांत और रिश्ते कमजोर हैं, तो कमी बाहर नहीं, भीतर है। दशलक्षण पर्व इसी सत्य की ओर लौटने और अपने विचार, व्यवहार व जीवन को परखने का अवसर देता है।

दशलक्षण की शक्ति उसके दस नामों में नहीं, उन जीवन-सूत्रों में है जो मनुष्य की कमजोरियों को चुनौती देते हैं। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य—ये किसी आदर्शलोक की बातें नहीं, जीवन की जरूरत हैं। क्रोध के समय क्षमा, अहंकार के बीच मार्दव, छल के बीच आर्जव और झूठ के शोर में सत्य की जरूरत है। शौच मन और शरीर की निर्मलता, संयम और तप इच्छाओं पर अंकुश, त्याग और आकिंचन्य संग्रह-वृत्ति से मुक्ति तथा ब्रह्मचर्य आत्मनियंत्रण का बोध कराते हैं। इसलिए इन दस धर्मों का क्रम केवल धार्मिक विधान नहीं, बल्कि मनुष्य के चरित्र को भीतर से अनुशासित करने की सुविचारित प्रक्रिया है।

मनुष्य दूसरों की गलतियां गिनने में जितना तत्पर रहता है, उतना अपने भीतर झांकने में नहीं। दशलक्षण पर्व इसी आदत को बदलने का अवसर देता है। दिगंबर दर्शन में कर्म-सिद्धांत इसकी दार्शनिक आधारभूमि है—हर विचार और कर्म आत्मा पर सूक्ष्म कर्म-आवरण डालता है, जो दुख और पुनर्जन्म के बंधन का कारण बनता है। इसलिए पर्व में आत्मनिरीक्षण महत्वपूर्ण है। व्यक्ति अपने व्यवहार का लेखा-जोखा करता है, भूल स्वीकारता है और सुधार का संकल्प लेता है। इसका सामाजिक प्रभाव भी स्पष्ट है—जिम्मेदारी स्वीकारने से दोषारोपण और संघर्ष घटते हैं। इस दृष्टि से कर्म-सिद्धांत केवल पाप-पुण्य का विचार नहीं, बल्कि जिम्मेदार जीवन जीने का प्रशिक्षण है।

जब बाजार हर इच्छा तुरंत पूरी करने का वादा कर रहा हो, तब उपवास प्रश्न उठाता है—क्या हर इच्छा पूरी होना जरूरी है? दशलक्षण में तप और उपवास इसी प्रश्न का उत्तर खोजते हैं। दिगंबर अनुयायी अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार पूर्ण या आंशिक व्रत अपनाते हैं। उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, इंद्रियों पर नियंत्रण पाना है। इच्छा रोकना मन को यह बोध कराता है कि वह इच्छाओं का गुलाम नहीं। ध्यान, स्वाध्याय और तत्त्वार्थ सूत्र जैसे ग्रंथों के अध्ययन से ज्ञान गहराता है। अधिक भोजन, उपभोग और संग्रह के बढ़ते दबाव के बीच तप सिखाता है कि सुख वस्तुओं की अधिकता में नहीं, आवश्यकता की सीमा पहचानने में है।

क्षमा मनुष्य द्वारा अपने लिए किया गया सबसे बड़ा उपकार है, क्योंकि वैर दूसरे से अधिक उसी मन को जलाता है जिसमें वह पलता है। दशलक्षण की क्षमापना इसी गांठ को खोलने का अवसर है। “उत्तम क्षमा” केवल औपचारिक उच्चारण नहीं, अपने किए-अनकिए अपराधों को स्वीकारने और संबंधों से कटुता हटाने का भाव है। क्षमा का पहला कदम अपनी भूल मानने का साहस है; यही उसे मनोवैज्ञानिक मुक्ति बनाता है। आज सोशल मीडिया के विवाद, कटु टिप्पणियां और मतभेद जल्दी वैमनस्य में बदलते हैं। ऐसे समय में क्षमा संबंधों को जोड़ने वाली शक्ति है—जहां अहंकार पीछे हटता है, वहीं संवाद की जगह बनती है।

धर्म तब जीवंत होता है, जब वह व्यक्तिगत साधना से निकलकर समाज की सामूहिक चेतना बने। दशलक्षण के दौरान जिनालय दर्शन, सामूहिक पूजा, प्रवचन और साधु-साध्वियों का मार्गदर्शन इसी चेतना को मजबूत करते हैं। ये आयोजन केवल धार्मिक गतिविधियां नहीं, नैतिक मूल्यों को जीवन में उतारने के साझा मंच हैं। सामूहिक सहभागिता व्यक्ति को अकेलेपन से बचाती और मूल्यों पर टिके रहने का संबल देती है। यही चेतना अहिंसा में व्यापक होती है। जैन दृष्टि में अहिंसा केवल मनुष्य के प्रति सद्भाव नहीं, समस्त जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता है। इसलिए पर्यावरण-संरक्षण, वृक्षारोपण और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी इसके स्वाभाविक विस्तार हैं। जलवायु संकट के दौर में अहिंसक और संतुलित जीवन-दृष्टि का महत्व और बढ़ जाता है।

जीवन में संग्रह बढ़ता जाता है और जिसे हम अपना मानकर जोड़ते रहते हैं, वही धीरे-धीरे हमारे लिए भार बन सकता है। दशलक्षण का त्याग और आकिंचन्य इसी भार से मुक्त होने का मार्ग दिखाते हैं। दान और परोपकार इस भावना को सामाजिक स्वरूप देते हैं। निस्वार्थ दान जरूरतमंद की सहायता के साथ दाता में उदारता और संग्रह से विरक्ति का भाव जगाता है। सामाजिक असमानता के बीच संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण संतोष और सहयोग बढ़ा सकता है। दिगंबर परंपरा का सादगीपूर्ण दान इसी विचार पर आधारित है कि वस्तुओं का संचय सुख की गारंटी नहीं। वास्तविक सुख तब मिलता है, जब अपने पास की वस्तुओं में किसी और का हिस्सा समझने का भाव जागे। त्याग अभाव नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण जीवन का नाम है।

दशलक्षण केवल दस दिनों का धार्मिक अनुशासन नहीं, जीवन की दिशा बदलने का अवसर है। 16 से 25 सितंबर तक चलने वाला यह पर्व मनुष्य को भीतर झांकने और क्रोध, अहंकार, छल, असंयम, लालच व आसक्ति जैसी प्रवृत्तियों को पहचानने का अवसर देता है। क्षमा क्रोध को शांत करती है, मार्दव और आर्जव व्यक्तित्व को सरल बनाते हैं, सत्य और शौच उसे निर्मल करते हैं, संयम और तप इच्छाओं को सीमा देते हैं तथा त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य आसक्ति से मुक्ति की राह दिखाते हैं। इसका प्रभाव व्यक्ति से परिवार और समाज तक पहुंचता है। इसलिए दशलक्षण की सार्थकता पूजा के बाद नहीं, तब है जब दस दिनों के बाद भी क्षमा स्वभाव में, संयम व्यवहार में, त्याग जीवनशैली में और करुणा दृष्टि में बनी रहे।