एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं
वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और यमन के हूती संघर्ष ने अब केवल दो पक्षों की सैन्य लड़ाई का रूप नहीं रखा है, बल्कि इसका असर तेल, समुद्री व्यापार, वैश्विक महंगाई और भारत की ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंच गया है।सऊदी अरब दुनियाँ के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में है और ऐसे समय में जब पहले से ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान ने ऊर्जा बाजार को दबाव में रखा हुआ है,हूतियों की लाल सागर के तट और बाब-अल- मंदेब के आसपास बढ़त ने दूसरा बड़ा जोखिम खड़ा कर दिया है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब का तेल उत्पादन फरवरी के लगभग 10.9मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर अगस्त में 6.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया था,यानी करीब 4.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन की गिरावट और तीन दशक से अधिक समय का न्यूनतम स्तर।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यही कारण है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि सऊदी बनाम हूती में कौन सैन्य रूप से मजबूत है,बल्कि यह है कि यदि तेल उत्पादन, निर्यात और समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहे तो विश्व अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी ऊर्जा चुनौती का सामना करेगी। इस पूरे संकट में 15 सितंबर 2026 को मक्का के निकट ड्रोन इंटरसेप्शन ने राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया। सऊदी नेतृत्व के अनुसार उसकी वायु रक्षा ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को उस समय नष्ट किया जब वह पवित्र शहर के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाया था। सऊदी पक्ष ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए मक्का और दोनों पवित्र मस्जिदों की सुरक्षा को रेड लाइन बताया। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है।।हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से साफ इनकार किया और कहा कि उनके हमलों का लक्ष्य सऊदी तेल प्रतिष्ठान और सैन्य ठिकाने हैं। इसलिए मक्का को जानबूझकर निशाना बनाया गया था या नहीं, यह दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी दावों के बीच विवादित है। भारत ने भी बाद में सऊदी क्षेत्र और मक्का के निकट कथित हमले की निंदा की।
साथियों,अब सवाल है कि सऊदी अरब जैसी विशाल सैन्य क्षमता वाला देश हूतियों से परेशान क्यों है? इसका उत्तर पारंपरिक सेना की संख्या में नहीं,बल्कि युद्ध की प्रकृति में छिपा है।सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान,मिसाइल डिफेंस और विशाल रक्षा बजट है, लेकिन हूती कम लागत वाले ड्रोन,मिसाइल, मोबाइल लॉन्चर,असममित युद्ध रणनीति और कठिन यमनी भूगोल का इस्तेमाल करते हैं।यानें एक महंगे इंटरसेप्टर से एक अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन या मिसाइल को रोकना आर्थिक रूप से भी भारी पड़ सकता है। इसके अलावा हूती विरोधी यमनी गुटों में विभाजन और हाल के वर्षों में क्षेत्रीय समर्थन के कमजोर पड़ने ने जमीन पर उनकी चुनौती बढ़ाई है। मीडिया के अनुसार वर्षों की अमेरिकी, सऊदी और अन्य सहयोगी सैन्य कार्रवाई के बावजूद हूतियों ने अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमता तथा संगठनात्मक ताकत बनाए रखी है।इसीलिए सऊदी बनाम हूती, कौन कितना ताकतवर? का सीधा उत्तर देना भ्रामक होगा। पारंपरिक वायुसेना,रक्षा प्रणालियों और आर्थिक संसाधनों में सऊदी अरब और हूती बराबर नहीं हैं; लेकिन हूतियों की ताकत उनकी कम लागत वाली असममित युद्ध क्षमता,मिसाइल-द्रोण भंडार, स्थानीय नेटवर्क, कठिन भूगोल और समुद्री चेकपॉइंट तक पहुंच में है। हाल के दिनों में हूतियों ने लाल सागर के यमनी तट पर तेजी से बढ़त बनाई और बाब-अल-मंदेब के आसपास रणनीतिक स्थिति मजबूत की है। इसी कारण एक अपेक्षाकृत छोटा गैर-राज्य सैन्य संगठन दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर रहा है।
साथियों, सबसे बड़ा आर्थिक खतरा तेल है।सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 4 मिलियन बैरल, यानी वैश्विक आपूर्ति के करीब 4 प्रतिशत, को लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाने की क्षमता रखती है। सितंबर में इस पाइपलाइन के बंद होने से यानबू में उपलब्ध निर्यात योग्य स्टॉक केवल करीब पांच से सात दिनों के लिए होने की रिपोर्ट आई थी। रिटर्स ने यह भी बताया कि यदि पाइपलाइन शीघ्र चालू नहीं हुई तो वैश्विक बाजार से लगभग 4 प्रतिशत तेल आपूर्ति अस्थायी रूप से हट सकती है। हालांकि बाद में सऊदी अरब ने कुछ तेल को अपने पूर्वी तट के रास्ते भेजकर आपूर्ति संकट का दबाव कम किया, जिसके कारण तेल की कीमतों में कुछ नरमी आई। इसलिए दुनिया में तुरंत तेल खत्म हो जाएगा कहना सही नहीं होगा,लेकिन लंबे व्यवधान की स्थिति में तेल बाजार में भारी सप्लाई शॉक पैदा होने का जोखिम वास्तविक है।
साथियों, 20 सितंबर को रविवार होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में नया सामान्य कारोबारी सेटलमेंट नहीं हुआ। उपलब्ध अंतिम शुक्रवार के आंकड़े के अनुसार ब्रेन्ट क्रूड करीब $104.87 प्रति बैरल और डब्लूटीआई करीब $100.30 प्रति बैरल पर बंद हुआ। सप्ताह के दौरान ब्रेन्ट $108- सऊदी बनाम हूती :छोटी ताकत ने कैसे हिला दी दुनियाँ की तेल व्यवस्था? -मिसाइलों से तेल तक मचा महासंकट ट्रंप,चीन और भारत के सामने चुनौतीपूर्ण अग्निपरीक्षा ? -समग्र व्यापक विश्लेषण 109 के आसपास भी पहुंचा था। इसलिए फिलहाल कीमत $100 के ऊपर बनी हुई है और आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सऊदी पाइपलाइन कितनी तेजी से बहाल होती है, लाल सागर में हमले कितने बढ़ते हैं और होर्मुज की स्थिति क्या रहती है।इसका भारत पर सीधा असर पड़ सकता है क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। महंगा ब्रेन्ट मतलब भारतीय रिफाइनरों के लिए महंगा कच्चा माल;लंबे समय तक कीमतें ऊंची रहने पर रुपये पर दबाव, आयात बिल में वृद्धि, चालू खाते पर असर, परिवहन लागत और अंततः पेट्रोल- डीजल से लेकर माल ढुलाई तथा कई वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि इसका असर तुरंत पेट्रोल पंप पर समान अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है, क्योंकि घरेलू ईंधन कीमतों में कर, विपणन मार्जिन, विनिमय दर और सरकारी नीतियां भी महत्वपूर्ण होती हैं। 20 सितंबर को भारत में खुदरा पेट्रोल-डीजल दरें अधिकांश प्रमुख शहरों में स्थिर थीं, जबकि ब्रेन्ट $104 के नीचे सटीकता से कारोबार कर रहा था।
साथियों,अब आता है अमेरिका का सवाल,सऊदी का दोस्त होने के बावजूद सीधे युद्ध में क्यों नहीं उतर रहा? रिपोर्टों के अनुसार सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ प्रत्यक्ष अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन वॉशिंगटन ने सीधे हमले की अनुमति नहीं दी और इसके बजाय सऊदी को खुफिया जानकारी तथा टार्गेटिंग असिस्टेंस देने पर सहमति जताई। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अमेरिका पहले से ईरान के साथ बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में उलझा है; हूतियों के खिलाफ नया प्रत्यक्ष मोर्चा खोलना संघर्ष को और फैलाने का जोखिम बढ़ा सकता है।यानें अमेरिका ने सऊदी सुरक्षा संबंध समाप्त नहीं किए हैं, बल्कि प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप और सहयोग के दूसरे स्तर के बीच अंतर रखा है।दिलचस्प बात यह है कि इसी बीच अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए 48 एफ़ -35 लड़ाकू विमानों और 49 इंजनों समेत लगभग $24.3 अरब की संभावित बिक्री को मंजूरी दी है। लेकिन यह अंतिम डिलीवरी नहीं है,प्रस्ताव को अमेरिकी कांग्रेस की प्रक्रिया से गुजरना होगा और विमानों की वास्तविक आपूर्ति में वर्षों लग सकते हैं। इसलिए इसे वर्तमान हूती हमलों का तत्काल सैन्य समाधान समझना सही नहीं होगा; यह दीर्घकालीन सऊदी-अमेरिकी रक्षा संबंध और सऊदी सैन्य आधुनिकीकरण से जुड़ा कदम है।
साथियों, जब अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से दूरी रख रहा है तो सऊदी को चीन की जरूरत क्यों पड़ी? रिटर्स के अनुसार सऊदी अपील के बाद चीन ने निजी तौर पर ईरान से हूतियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्हें नियंत्रित करने में मदद करने को कहा। यह जानकारी तीन ईरानी सूत्रों के हवाले से सामने आई। चीन की चिंता केवल सऊदी नहीं है,उसका बड़ा आर्थिक हित लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और मध्य-पूर्व की ऊर्जा आपूर्ति में है। चीन सार्वजनिक रूप से संयम और सुरक्षित नौवहन की अपील कर चुका है तथा 2023 में चीन ने ही सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध सुधारने में मध्यस्थ भूमिका निभाई थी। इसलिए बीजिंग की भूमिका इस संकट में सैन्य नहीं बल्कि राजनयिक और आर्थिक लेवरेज की है।इसी संदर्भ में पाकिस्तान और तुर्की का सवाल भी महत्वपूर्ण है। सितंबर में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की से जुड़ा एक त्रिपक्षीय मक्का जॉइंट डिफेन्स एग्रीमेंट सामने आया,जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी के लिए गंभीर सुरक्षा मामला माना गया। तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि अंकारा सऊदी की तकनीकी सैन्य जरूरतों में मदद के लिए तैयार है, जबकि पाकिस्तान ने अपनी प्रतिबद्धता जताई लेकिन तत्काल प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई नहीं की। इसलिए यह कहना कि पाकिस्तान या तुर्की मदद नहीं कर रह, पूरी तरह सटीक नहीं होगा; फिलहाल उपलब्ध जानकारी प्रत्यक्ष युद्ध में प्रवेश के बजाय रक्षा-सहयोग और संभावित सहायता की ओर संकेत करती है।
साथियों अंत में बाब-अल- मंदेब को समझना इस पूरे संकट की चाबी है।यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला लगभग 20 मील चौड़ा रणनीतिक समुद्री मार्ग है। इसके उत्तर में स्वेज नहर है, जिससे एशिया और यूरोप के बीच व्यापार जुड़ता है। सीएफ़आऱ के अनुसार लाल सागर क्षेत्र से वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 15-17 प्रतिशत गुजरता है और स्वेज नहर अकेले विश्व व्यापार के करीब 10-12 प्रतिशत का मार्ग है।यदि हूती गतिविधियां लंबे समय तक इस रास्ते को असुरक्षित करती हैं तो जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते मोड़ना पड़ सकता है,जिससे यात्रा समय, ईंधन और बीमा लागत बढ़ती है तथा वैश्विक वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ता है।
अतः अगर हम अप्रोच पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 20 सितंबर 2026 की स्थिति को केवल सऊदी बनाम हूती युद्ध कहना अधूरा होगा।यह अब तेल उत्पादन, पाइपलाइन, लाल सागर, बाब-अल- मंदेब, होर्मुज, अमेरिका की सैन्य नीति, चीन की कूटनीति,ईरान के प्रभाव, पाकिस्तान- तुर्की की सुरक्षा भूमिका और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बहुस्तरीय संकट है।भारत ने इस पर स्पष्ट रूप से कहा है कि सऊदी क्षेत्र में नागरिक और आर्थिक ठिकानों पर हमले तथा बाब-अल-मंदेब में नौवहन की स्वतंत्रता को खतरा अस्वीकार्य है और जल्द शांति व स्थिरता बहाल होनी चाहिए।अब असली परीक्षा यह होगी कि सऊदी की तेल आपूर्ति कितनी जल्दी सामान्य होती है, हूती लाल सागर में अपनी बढ़त को कितना आगे ले जाते हैं, ईरान चीन की अपील पर कितना प्रभाव डालता है और अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्यहस्तक्षेप से दूरी कितने समय तक बनाए रखता है।फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम यही है कि यदि लाल सागर और होर्मुज दोनों लंबे समय तक बाधित रहे, तो तेल की समस्या केवल कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक व्यापार, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा की व्यापक चुनौती बन सकती है।





