डॉ वंदना शर्मा
किसी शहर के एक कोने में एक मध्यमवर्गीय, पर दिल से बहुत अमीर परिवार रहता था। वो घर था दुलार चंद और उनकी धर्मपत्नी ललिता देवी का। घर बड़ा था, आँगन में तुलसी थी, बाहर खेती की अच्छी-खासी जमीन थी। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी।
बस एक ही कमी थी, जो ललित देवी के दिल को अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। ईश्वर ने उन्हें एक-एक करके नौ बेटियों का सुख दिया था। नौ बेटियाँ, नौ लक्ष्मी। पर समाज की सोच और अपने कुल के लिए एक बेटे की चाह में उनका मन तड़पता था। बड़ी-बूढ़ियों ने जितने उपाय बताए, सब करके देख लिए। सारे व्रत, सारे उपवास, पीर-फकीरों की बताई हर मन्नत… पर आँगन में एक बेटे की किलकारी नहीं गूंजी थी।
इसी परिवार में थीं मैना देवी, दुलार चंद की माँ और ललिता की सास। उम्र हो चली थी, पर हौसला और भक्ति आज भी जवान थी। उन्होंने अपनी बहू का दुख देखा, तो उन्होंने कहा कि वो तीर्थयात्रा पर जाकर अपने पोते के लिए मन्नत मांगेंगी।
उस दिन बैलगाड़ी उन्हें स्टेशन तक छोड़ने जा रही थी। पूरा परिवार उन्हें विदा करने आया। लेकिन स्टेशन पर पहुँचते ही अनहोनी हो गई। अचानक पैर फिसला और मैना देवी वहीं गिर पड़ीं। उनकी धड़कन रुक गई। वहाँ अफरा-तफरी मच गई। दुलार चंद भागे-भागे आए, बैलगाड़ी से उन्हें घर लाया गया और अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी।
जैसे ही चार कंधों ने अर्थी को उठाना चाहा, एक चमत्कार हुआ। मैना देवी अचानक उठ बैठीं। उन्हें देखकर पहले तो सब डर गए, कुछ लोग तो पीछे हट गए।
फिर मैना देवी मुस्कुराईं और स्वयं उठकर दुलार चंद के पास गईं। उसके कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, “डरने की कोई बात नहीं है बेटा। मैं सच में मर गई थी। मुझे ले जाने के लिए दो यमदूत आए थे। वो मुझे ईश्वर के पास ले गए।”
सब लोग सांस रोककर सुन रहे थे। मैना देवी ने आगे कहा, “जब मैं प्रभु के सामने पहुँची तो प्रभु ने यमदूतों से कहा – अरे, तुम गलत आदमी को ले आए हो! ये बुढ़िया तो अभी अपने पोते की शादी देखकर मरेगी। ये सुनकर मैं फूट-फूट कर रोने लगी। मैंने कहा – प्रभु, मेरा तो कोई पोता ही नहीं है।”
मैना देवी की आँखें चमक रही थीं, “तब प्रभु ने हँसकर कहा – रो मत मैना। मैं सब जानता हूँ। तुम्हारे खेत में जहाँ आम का पेड़ है, वहाँ एक काला पत्थर है। तुम वहाँ एक छोटा सा मंदिर बनवाओ और विधि-विधान से पूजा करो। मैं वचन देता हूँ, एक वर्ष के अंदर तुम्हें एक सुंदर पोते की प्राप्ति होगी। इतना कहकर उन्होंने मुझे वापस भेज दिया।”
दुलार चंद को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। पुत्र की इच्छा तो उसके मन में भी बहुत थी। उसने अपनी माँ की बात को ईश्वर का आदेश मान लिया। अगले ही दिन उसने खेत में, आम के पेड़ के नीचे जहाँ काला पत्थर था, वहाँ एक सुंदर सा छोटा मंदिर बनवा दिया। पंडित जी को बुलाकर विधि-विधान से पूजा-पाठ किया गया। ललिता देवी ने सच्चे मन से हर रोज वहाँ दिया जलाया।
और सच में, मैना देवी की बात सच हो गई। ठीक एक साल के भीतर ललित देवी की दसवीं संतान के रूप में एक सुंदर पुत्र ने जन्म लिया। पूरे घर में जैसे दीवाली आ गई। उसका नाम रखा गया रवि । मोहल्ले में लड्डू बांटे गए, सबको दावत दी गई। पूरे एक महीने तक घर में ढोलक और बधाइयाँ गूंजती रहीं।
जब रवि पाँच साल का हुआ, तो एक दिन अपनी दादी मैना देवी के साथ उसी खेत वाले मंदिर में जा रहा था। मैना देवी वहाँ पूजा करते-करते ध्यान में लीन हो गईं और वहीं सो गईं। जब उन्हें जगाया गया तो उनकी आँखों में एक अलग ही तेज था।
उन्होंने कहा, “मुझे अभी नींद में फिर प्रभु दिखाई दिए। उन्होंने कहा – मैना देवी, तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारे भाग्य में एक और पोता है। तुम आने वाली पूर्णिमा को इसी मंदिर में बड़ा भंडारा करवाना और अपने ससुर जी के नाम से एक विद्यालय खुलवा दो। एक साल में तुम्हें दूसरे पोते की प्राप्ति होगी।”
दुलार चंद ने इस बार भी अपनी माँ की बात को पत्थर की लकीर मान लिया। पूर्णिमा पर पूरे शहर के लिए भंडारा करवाया गया और अपने पिता के नाम से एक छोटा सा विद्यालय भी खुलवा दिया।
ईश्वर की कृपा से इस बार भी चमत्कार हुआ। ललिता देवी को ग्यारहवीं संतान के रूप में फिर से पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। अब तो पूरे मोहल्ले में चर्चा ही चर्चा थी। लोग कहते, “देखो, दुलार चंद के घर तो पूरी क्रिकेट टीम ही जन्मी है। ग्यारह बच्चे! और देखो ललिता देवी को, ग्यारह बच्चों की माँ होने के बाद भी कितनी स्वस्थ और खुश हैं। नौ बहनों के बाद दो भाई, ये तो सब ऊपर वाले की लीला है।”
समय ने पंख लगा लिए और खुशी-खुशी उड़ने लगा। देखते ही देखते नौ बेटियों के हाथ पीले कर दिए गए। शादी आस-पास के शहरों में ही हुई ताकि बेटियाँ आती-जाती रहें। दोनों बेटे भी अब जवान हो गए थे।
अब एक नई चिंता सामने थी। उत्तरी भारत में रिवाज है कि राखी और भाई-दूज पर बहनें जब मायके आती हैं तो भाइयों को उनके परिवार सहित कपड़े, पैसे और उपहार देने होते हैं। अब नौ बहनों के लिए इतना लेन-देन करना कोई आसान काम नहीं था।
यहाँ भी दुलार चंद ने बड़ी समझदारी दिखाई। उन्होंने कहा – देखो, हमारा परिवार बड़ा है तो दिल भी बड़ा होना चाहिए। उन्होंने पाँच बड़ी बहनों की जिम्मेदारी बड़े बेटे रवि को दी, क्योंकि वह खेती संभालता था और जमीन भी उसी के नाम थी। बाकी की चार बहनों की जिम्मेदारी छोटे बेटे भुवन को दी। इस तरह दोनों भाइयों में प्यार भी बना रहा और बहनों का मान भी।
मैना देवी अपने भरे-पूरे परिवार को हँसता-खेलता देखकर फूली नहीं समाती थीं। उनकी आँखों में एक सुकून था। आखिरकार उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना पूरा हुआ। उनके बड़े पोते रवि का विवाह बड़ी धूमधाम से किया गया। घर फिर से रोशनी और मेहमानों से भर गया।
रवि की शादी को अभी एक महीना ही हुआ था। एक दिन मैना देवी रोज की तरह मंदिर में भजन-कीर्तन के लिए गई थीं। वहाँ ढोलक-मंजीरे बज रहे थे और वे आँख बंद करके भजन गा रही थीं – “भजो रे मन गोविंदा…”
भजन गाते-गाते ही उनके प्राण-पखेरू उड़ गए। चेहरे पर वही शांति थी, वही मुस्कान। सबने दुलार चंद को खबर दी। पूरा परिवार मंदिर की ओर भागा। पर इस बार किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैना देवी सच में चली गई हैं। क्योंकि वह तो दो बार मरकर भी वापस आ चुकी थीं।
बीस घंटे तक सबने इंतजार किया। मंदिर में ही उनके शरीर को रखा गया, शायद फिर से उठ बैठें। पर इस बार कोई हलचल नहीं हुई। प्रभु ने इस बार उन्हें सच में अपने पास बुला लिया था। उनका काम पूरा हो चुका था। उन्होंने अपनी दोनों आँखों से अपने पोते की शादी देख ली थी।
बड़े दुखी दिल और नम आँखों से पूरे मोहल्ले ने उनका अंतिम संस्कार किया। अंतिम यात्रा में पूरा शहर उमड़ पड़ा। हर कोई उनकी भक्ति और उनके चमत्कार की ही चर्चा कर रहा था।
आज समय बहुत आगे निकल गया है। रवि ने अपनी दादी मैना देवी के नाम से एक सुंदर प्रारंभिक विद्यालय खुलवाया है और वह खेती का काम देखता है। छोटा बेटा भुवन दोनों विद्यालयों की जिम्मेदारी बहुत अच्छे से संभालता है। ईश्वर की कृपा से रवि के दो पुत्र हैं और भुवन के एक पुत्र और एक पुत्री है।
खेत में आम के पेड़ के नीचे वाला वो छोटा सा मंदिर आज भी वैसा ही खड़ा है। वहाँ आज भी दिया जलता है। और उस शहर में आज भी मैना देवी को एक चमत्कारी, भक्तिमय और सम्मानित माता के रूप में याद किया जाता है।
कहते हैं, जहाँ सच्ची भक्ति होती है, वहाँ ईश्वर खुद रास्ता बना देते हैं।





