सभी तो प्रधानमंत्री के सहपाठी नही हो सकते

Not everyone can be the Prime Minister's classmate

अशोक मधुप

पीएम नरेंद्र मोदी से एक मुलाकात के बाद उनके स्कूल फ्रेंड असगर अली वोरा की वर्षों पुरानी समस्या खत्म हो गई। मीरा भायंदर की जमीन पर अपने हक के लिए वह कई साल से अफसरों और विभागों के चक्कर काट रहे थे। असगर अली वोरा ने एक सप्ताह पहले पीएम मोदी से मुलाकात की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि भायंदर में उनकी जमीन पर बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता की कंस्ट्रक्शन कंपनी ने कब्जा कर लिया है। मुलाकात के सात दिनों के भीतर उनकी प्रॉब्लम खत्म हो गई। मंगलवार को बीजेपी विधायक ने बताया कि वह विवादित जमीन का कब्जा छोड़ रहे हैं और उस प्लॉट के लिए मिली कंस्ट्रक्शन की मंजूरी भी सरेंडर कर रहे हैं। नरेंद्र मेहता ने असगर अली वोरा के खिलाफ़ पहले की गई अपनी शिकायत वापस ले ली । 81 साल के असगर अली वोरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के मित्र हैं। उन्होंने वोरा ने गुजरात के वडनगर के बी एन स्कूल में मोदी के साथ पढ़ाई की थी। उन्होंने आठ सितंबर को प्रधानमंत्री से मुलाकात की और अपनी जमीन पर कब्जे के बारे में बताया था। उन्होंने इस विवाद में पीएम मोदी से दख्ल देने की अपील की। वोरा ने बताया कि उन्होंने 1989 में भायंदर ईस्ट के नवघर में लगभग 2810 स्क्वायर मीटर जमीन खरीदी थी। 2011 में इस प्लॉट पर स्वयं बिल्डर्स और मेहता की सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन्स ने कब्जा कर लिया। वोरा ने कहा कि वह लगभग 15 सालों से अलग-अलग सरकारी अधिकारियों के पास यह मामला उठा रहे थे, किसी ने नहीं सुनी।

वोरा और प्रधानमंत्री मोदी के बचपन के स्कूलमेट हैं। वे प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंच गए। प्रधानमंत्री के साथ उनका फोटो और खबर आने के बाद भाजपा विधायक समझ गए और पीछे हट गए। देश के प्रत्येक आदमी की पहुंच तो प्रधानमत्री तक नही। प्रत्येक व्यक्ति तो प्रधानमंत्री का मित्र और सहपाठी नही। वह अपनी समस्या को लेकर कहां जाए।

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के चौसाना गांव के रहने वाले और पूर्व शिक्षक मास्टर विजय सिंह गांव की लगभग चार हजार बीघा सार्वजनिक कृषि भूमि को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराने और उसे भूमिहीनों या सार्वजनिक उपयोग में लाने की मांग को लेकर तीस से ज्यादा साल से आंदोलनरत है। जांच में उनकी शिकायत मिलने पर भी अभी तक भूमि से कब्जे नही हटे। मास्टर विजय सिंह ने 26 फरवरी 1996 को मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी कार्यालय के सामने यह धरना शुरू किया था। इसके बाद यह धरना मुजफ्फरनगर के शिव चौक व कलेक्ट्रेट परिसर में निरंतर जारी है। इस लड़ाई के लिए उन्होंने अपनी सरकारी शिक्षक की नौकरी तक छोड़ दी और गांधीवादी रास्ते पर चलते हुए पिछले तीन दशकों से लगातार धरना दे रहे हैं। उनके इस अड़ियल और लंबे संघर्ष को ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’, ‘इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’, ‘एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ और विश्व स्तर की कई अन्य रिकॉर्ड संस्थाओं द्वारा मान्यता दी गई है। प्रशासनिक जांचों में उनके आरोप सही पाए जाने और कई सरकारें व मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद ज़मीन पर ठोस कार्रवाई और न्याय मिलने का इंतज़ार आज भी बना हुआ है, और उनका यह अनवरत सत्याग्रह जारी है। यही नही नदियों के कछार की जमीन तो भूमाफियाओं के कब्जे में रहती है। गरीब किसान अधिकारियों के दरबार में शिकायत करता थक जाता है, किंतु कहीं कोई सुनवाई नही होती। फिल्म पानसिंह तोमर भी ऐसी ही एक घटना पर बनी है। फौजी को कब्जा हुई जमीन पर सब जगह शिकायत करने पर भी न्याय नही मिलता। मजबूरी में एक दिन यह बंदूक उठाकर चंबल के कछार में उतर जाता है। ऐसे ही एक उत्पीड़न के शिकार बीएसएफ के एक हवलदार लगभग बीस साल पहले मुझे मिले। उत्तेजित थे । बोले− जी करता है कि बंदूक लेकर एक दिन सारे दुश्मनों को मार दूं। उन्हें समझाया । उनकी शिकायत छापी । अधिकरियों से कहा। किंतु थाने वाले उसका मजाक उड़ाते । कहते कैसा फौजी है। अपनी जमीन पर ही कब्जा नही ले पा रहा। चलता रहा। कब्जा फिर भी नही मिला। अब नौकरी छोड़ कार्ट – कचहरी के चक्कर काट रहे हैं । बिजनौर जिले की ग्राम शाहलीपुर जमान की दीपू शर्मा तो रोज अपनी जमीन पर माफियाओं के कब्जे की वीडियों फेसबुक पोस्ट कर अधिकारियों से अपील करती रहती है, किंतु कोई सुनवाई नही हो रही।

महाराष्ट्र के नासिक जिले स्थित निफाड़ कस्बे से एक हैरान करने वाला मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा हैं। क्षेत्र में बढ़ रहे आवारा कुत्तों के आतंक और काटने की घटनाओं से स्थानीय नागरिक काफी समय से परेशान थे। बार-बार शिकायत देने के बाद भी जब प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो शिवसेना (यूबीटी) की युवा सेना के कार्यकर्ताओं ने विरोध जताने का यह अजीबोगरीब रास्ता चुना। कार्यकर्ता बोरियों में चार से पांच आवारा कुत्तों के पिल्लों को भरकर सीधे निफाड़ नगर पंचायत के मुख्याधिकारी के दफ्तर में ले गए और उनकी टेबल पर छोड़ दिया। टेबल पर कुत्तों के घूमने और अधिकारियों के सामने हुए इस ड्रामे के दौरान प्रशासन पर तंज कसते हुए अधिकारी को नोटों का हार पहनाने की भी कोशिश की गई।

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर ) और विभिन्न न्यायिक अध्ययनों के अनुसार, भारत की अदालतों में लंबित कुल दीवानी (सिविल ) मुकदमों में से लगभग 60 से 66 प्रतिशत मामले केवल जमीन और संपत्ति विवादों से जुड़े हैं। देश की निचली और उच्च अदालतों में जमीन व संपत्ति से जुड़े पांच करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें एक बड़ा हिस्सा अवैध कब्जे, जाली दस्तावेजों और भू-माफिया द्वारा हड़पी गई जमीनों का है।

ये आंकड़े बताते है कि सभी पीडित तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहपाठी नही हो सकते। अंग्रेजों के समय की बनी व्यवस्था में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को जनता पर नियंत्रण के लिए बनाया था। उनका तानाशाही व्यवहार आज भी नही बदला। अधिकारियों को हम जन सेवक नही बना पाए। इसलिए परेशान जनता कोर्ट और कचहरी के चक्कर लगा रही है।