डॉ. प्रितम भि. गेडाम
आज के आधुनिक युग में मनुष्य ने भौतिक सुख के चक्कर में अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ समझौता कर लिया हैं। जिधर देखो उधर अनैतिकता, स्वार्थ, धोखाधड़ी का साम्राज्य फैला हुआ हैं। कोई हमसे ऊंची आवाज में भी बात करें तो हम पलटकर उल्टा जवाब देते या वादविवाद करते है, परंतु कोई मिलावटखोरी, प्रदूषण, अस्वच्छता के द्वारा हमें महंगे लाइलाज जानलेवा बीमारियां भी दे दे तो हम उफ़ तक नहीं करते, क्योंकि हमनें अपनी मानसिकता को उस प्रकार से ढाल दिया हैं। हम केवल प्रत्यक्ष रूप से होनेवाली समस्या के लिए थोड़े-बहुत जागरूक होते है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जानेवाली हमारी जान की हमें कभी परवा ही नहीं होती। बढ़ती मानवीय लालसा ने पुरे पृथ्वी पर दूषित वातावरण का चक्रव्यूह रचा है, जिसने समस्त जीवसृष्टि को घातक बीमारियों से जकड़ा हैं। असमय होनेवाली मौतों में बेतहाशा वृद्धि ने भयावह रूप दर्शाया है, परंतु मनुष्य है कि समझना ही नहीं चाहता। ऐसे लोगों की गलती की सजा अन्य मासूमों को भी अपनी जान गवांकर चुकानी पड़ती हैं।
दूषित वातावरण के कारण आज तेजी से जानलेवा बीमारियां बढ़ी हैं। कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक बीमारियों के नाम अब हमें रोजाना ही सुनने मिलते हैं। एकदम स्वस्थ मनुष्य जो, नशा नहीं करता है, हमेशा पोषक आहार लेता है, बेहतर निरोगी जीवनशैली का अनुसरण करता है, ऐसे मनुष्य भी घातक बीमारियों से जान गवां रहे है, क्योंकि निकृष्ट दर्जे की खाद्य पदार्थों की भरमार, मिलावटखोरी और दूषित वातावरण में सांस लेने को मजबूर हैं। हमारी चटोरी जुबान के स्वाद के लालच में पशुओं के लायक भी न हों ऐसे खाद्य पदार्थ हम बड़े चटकारे लेकर खाते है और समस्त शरीर को कूड़ेदान बनाते हैं। खराब कोलेस्ट्रॉल तो अब हमारे शरीर का हिस्सा बन गया हैं। हमारे देश में तो मीठा, मैदा, मसाला, तेल, नमकीन बगैर दिनचर्या ही पूरी नहीं होती, जबकि यह बेहद घातक हैं। बढ़ता मोटापा, आलस्य, लंबे समय तक बैठकवाला कार्य अधिक मुश्किलें बढ़ाता हैं। बीमारी के कारण बढ़ता आर्थिक तनाव और मानसिक अस्वस्थता भी हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं। उन्नत देशों ने जिस खाद्य पदार्थों या उत्पादों पर बैन लगाया है, वह भी हमारे देश में धड़ल्ले से बिकते हैं। जानलेवा रसायनों का खाद्य पदार्थों में प्रयोग और नकली खाद्यपदार्थ बाजारों को गुलजार बना रहे हैं।
लालची व्यापारी या दूकानदार अपने एक रुपये के फायदे के लिए भी मासूमों के जान से खिलवाड़ करने से नहीं डरते। तुकाराम मुंडे महाराष्ट्र राज्य के खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने मिलावटखोरी, नकली खाद्य पदार्थ, निकृष्ट खाद्य पदार्थों पर पाबंदी हेतु कड़े नियम लगाएं हैं। जिसके कारण करोड़ों रुपयों के जानलेवा खाद्य पदार्थों के बाजार पर ग्रहण लगा है, जरा सोचिए, इस ग्रहण से पहले धड़ल्ले से चलनेवाले कारोबार द्वारा इस जानलेवा खाद्य पदार्थों जैसे – रसायन से तैयार नकली दूध, उससे तैयार पनीर, मिठाइयां, विविध व्यंजन ने न जाने अब तक कितने मासूमों को घातक बीमारियों से ग्रस्त करके समय से पहले ही मार दिया। स्वस्थ रहने के लिए हर क्षेत्र में ऐसे मेहनती और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की सख्त जरूरत हैं।
आज के वातावरण में हृदय संबंधी रोगों से होनेवाली मौतों की संख्या चरम पर हैं। दो दशक पहले तक ऐसे विकार अमीर और बुजुर्गों के हिस्से मानते थे। लेकिन आज छोटे बच्चे भी हृदय विकार से जान गवां रहे हैं। विश्व हृदय फेडरेशन अनुसार, हर साल वायु प्रदूषण के कारण 70 लाख लोगों की मौत होती है। वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतों में से 50 फीसदी मौतें दिल की बीमारी और स्ट्रोक के कारण होती हैं। खाना पकाने के लिए आग जलाने से निकलने वाले धुएं के संपर्क में आने से हर साल 38 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती हैं। हर साल उच्च कोलेस्ट्रॉल के कारण 44 लाख लोगों की असमय मौत होती हैं। लैंसेट में छपी एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि, अनुमानित 10 करोड़ लोग ऐसी दिल की बीमारियों के साथ जी रहे हैं जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसमें जान गवानेवाले अधिकतर गरीब होते हैं। साल 2023 में दुनिया भर में 23 लाख बच्चे जन्मजात हृदय रोग के साथ पैदा हुए। अमेरिका में, जटिल जन्मजात हृदय रोग के लिए जीवन भर का औसत खर्च प्रति मरीज 2.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर है, जबकि जीवन भर का कुल आर्थिक असर 3.35 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से भी ज़्यादा हैं। ग्लोबल अलायंस फॉर क्रॉनिक डिजीज के अनुसार, साल 2021 में दिल और रक्त वाहिकाओं की बीमारियों की वजह से 2.05 करोड़ लोगों की मौत हुई, जो दुनिया भर में हुई कुल मौतों का 32 फीसदी है। हृदय रोग से होने वाली 85 फीसदी मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक के कारण होती है, इसमें से 75 फीसदी से ज़्यादा मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं।
देश में हर साल दिल और हृदय-वाहिका संबंधी बीमारियों से लगभग 28 – 31 लाख लोगों की असमय मौत होती हैं। साल 2024 में हृदय रोग से होने वाली कुल मौतों की संख्या 3,165,172 थी। भारत में दिल की बीमारी के लगभग 70 फीसदी मरीज़ों के पास स्वास्थ्य बिमा नहीं है और वे आर्थिक सुरक्षा से वंचित हैं। इस बीमारी की वजह से लगभग 32 फीसदी मरीज़ों और 36 फीसदी परिवारों की महीने की आय में बेहद कमी आती हैं। 17.7 फीसदी परिवारों को मेडिकल खर्चों को पूरा करने के लिए अनिश्चित समय के लिए लोन लेना पड़ता है या संपत्ति बेचनी पड़ती हैं। आजकल छोटे-छोटे स्कूली बच्चे खेलते-खेलते गश आकर गिर पड़ते है और चिकित्सक बताते है कि, हृदयघात से जान गई। बड़ा अजीब लगता है कि, इतने छोटे बच्चे भी हृदय रोग से जान गवांते है, क्योंकि हमारे आसपास वातावरण ही इतना दूषित हो गया हैं।
हृदय को कमजोर बनानेवाली चीजों से सर्वदा दूर रहें। किसी भी प्रकार का नशा जानलेवा साबित होता है, उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह को नियंत्रित रखें। पोषक आहार लें। वजन नियंत्रित रखें। मानसिक तनाव को नजरअंदाज न करें, खुशनुमा वातावरण बनाये रखें। 8 घंटों की पूरी नींद, रोजाना व्यायाम, हेल्दी हॉबी को प्राथमिकता दें। झूठे दिखावे से बचें। जिन्हे भावनाओं की कदर न हो, उनसे दूर रहें, लोगों से उम्मीदें न पालें, मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखें। आधुनिक जीवनशैली का त्याग करें। मीठा, मसाला, मैदा, तेल, नमकीन, पैक्ड खाद्य पदार्थ, कोल्डड्रिंक, अधिकतम प्रक्रिया किये गए खाद्यपदार्थ शरीर को खराब करते हैं। खाद्यपदार्थों का चयन स्वाद अनुसार नहीं, बल्कि पोषण देखकर करें। प्लास्टिक से बनी थैली, बर्तन, बोतल, का प्रयोग तुरंत बंद करें। खाद्यपदार्थों के लिए प्लास्टिक वस्तुओं का प्रयोग जहर के समान हैं। हमेशा स्वच्छता का ध्यान रखें। आधुनिक संसाधनों पर निर्भरता कम करें। आलस्य त्यागें। लगातार बैठकवाले कार्य टालें, अगर संभव न हो तो थोड़ा ब्रेक भी लें। सामाजिक परोपकारिता का ध्यान रखें, सभी नागरिक समान है, इसलिए पर्यावरण को नुकसान पहुचानेवालों का कड़ा विरोध करें। निरोगी रहने के लिए पहले शुद्ध ऑक्सीज़न, पोषक आहार और साफ जल चाहिए, यह कभी न भूलें। जब भी कोई प्रदूषण, मिलावटखोरी, अस्वच्छता, पेड़ कटाई, अतिक्रमण, शोर, भ्रष्टाचार करता है, तो एक बात ध्यान रखें कि वह आपकी ही जान अप्रत्यक्ष रूप में ले रहा हैं। कीड़े-मकोड़ो की तरह अपनी जिंदगी बर्बाद न करें। जिंदगी फिर नहीं मिलती, स्वास्थ्य ही धन हैं।





