ड्रग्स के वैश्विक सिंडिकेट की अब खैर नहीं !

The global drug syndicate's days are numbered!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर आज नशाखोरी केवल किसी एक देश,राज्य या समाज की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा,सार्वजनिक स्वास्थ्य, युवा शक्ति, सामाजिक स्थिरता और अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी बहुआयामी चुनौती बन चुकी है।मादक पदार्थों का अवैध व्यापार सीमाओं,समुद्री मार्गों और आधुनिक संचार साधनों को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध जगत से जुड़ रहा है। इसका प्रभाव केवल नशे का सेवन करने वाले व्यक्ति तकसीमित नहीं रहता,बल्कि परिवार,शिक्षा,रोजगार,कानून-व्यवस्था और सामाजिक विकास की पूरी संरचना को प्रभावित करता है।भारत ने इस चुनौती के विरुद्ध जन- जागरूकता से लेकर कठोर प्रवर्तन तक अनेक स्तरों पर प्रयास प्रारंभ किए हैं।इसी व्यापक रणनीति के बीच नई दिल्ली में 22 और 23 सितंबर 2026 को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मादक पदार्थ विरोधी कार्यबल प्रमुखों का तीसरा राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू है।केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा उद्घाटित इस सम्मेलन में 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के कार्यबल प्रमुखों के साथ संबंधित सरकारी विभागों तथा अन्य हितधारकों के प्रतिनिधि शामिल होकर चर्चा कर रहे हैं।

साथियों, इस सम्मेलन की मूल भावना “संयुक्त संकल्प, साझा जिम्मेदारी” रखी गई है,जो अपने आप में इस समस्या की प्रकृति को स्पष्ट करती है।मादक पदार्थों का जाल किसी एक विभाग की कार्रवाई से समाप्त नहीं किया जा सकता।इसके लिए पुलिस, खुफिया तंत्र, सीमा सुरक्षा,वित्तीय जांच,स्वास्थ्य व्यवस्था,शिक्षा तंत्र, न्यायिक प्रक्रिया और स्थानीय प्रशासन के बीच लगातार समन्वय आवश्यक है। सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार सम्मेलन में मादक पदार्थ नियंत्रण के लिए 2026- 2029 के दृष्टि दस्तावेज में निर्धारित लक्ष्यों की प्रगति कीसमीक्षा की जा रही है। साथ ही मादक पदार्थों की आपूर्ति घटाने, मांग कम करने तथा इनके कारण होने वाली क्षति को कम करने की रणनीतियों पर भी विचार किया जा रहा है।
साथियों,नशे के विरुद्ध लड़ाई का पहला महत्वपूर्ण पक्ष जन-जागरूकता है।किसी भी समाज में यदि युवा पीढ़ी को नशे के दुष्परिणामों के प्रति समय रहते जागरूक किया जाए,परिवारों को संवेदनशील बनाया जाए और विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाए तो नशे की मांग को कम करने में सहायता मिल सकती है। भारत में नशामुक्त भारत अभियान जैसे प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन केवल जागरूकता से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। यदि एक ओर समाज को नशे से दूर रहने का संदेश दिया जाए और दूसरी ओर अवैध तस्करी का नेटवर्क लगातार नई राहें खोजता रहे, तो समस्या का मूल स्रोत बना रहेगा।इसलिए मांग को कम करने के साथ आपूर्ति के स्रोत, तस्करी के मार्ग, वित्तीय नेटवर्क और संगठित आपराधिक संरचनाओं पर भी समान रूप से कार्रवाई आवश्यक है।

साथियों, यही कारण है कि नई दिल्ली सम्मेलन का ध्यान केवल पारंपरिक तस्करी तक सीमित नहीं है। सम्मेलन के तकनीकी सत्रों में मादक पदार्थ तस्करी के संगठित गिरोहों को समाप्त करने, कृत्रिम रूप से तैयार किए जाने वाले नशीले पदार्थों और गुप्त प्रयोगशालाओं से निपटने, अवैध खेती रोकने तथा अंधकारमय अंतरजाल और आभासी मुद्राओं के माध्यम से होने वाली तस्करी की जांच जैसे विषय शामिल हैं। यह बदलाव बताता है कि मादक पदार्थों का अपराध जगत भी तकनीकी साधनों का उपयोग कर रहा है और कानून-प्रवर्तन संस्थाओं को उसी गति से अपनी क्षमता विकसित करनी होगी।विशेष रूप से कृत्रिम नशीले पदार्थों का बढ़ता खतरा प्रशासन के लिए नई चुनौती प्रस्तुत करता है। पारंपरिक मादक पदार्थों की तुलना में कृत्रिम पदार्थों का निर्माण छोटे और छिपे हुए स्थानों पर भी किया जा सकता है। इनके निर्माण में प्रयुक्त रासायनिक पूर्ववर्ती पदार्थों की निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि इन पदार्थों की वैध औद्योगिक आपूर्ति और अवैध उपयोग के बीच प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित किया जाए,तो अवैध उत्पादन की श्रृंखला को प्रारंभिक स्तर पर ही बाधित किया जा सकता है। इसी दृष्टि से सम्मेलन में पूर्ववर्ती पदार्थों तथा कृत्रिम नशीले पदार्थों के नियंत्रण को अलग रणनीतिक स्तंभ के रूप में सटीकता से रखा गया है।

साथियों,दूसरी बड़ी चुनौती अवैध खेती और ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित होने वाले तस्करी तंत्र की है। केवल फसल नष्ट कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता क्योंकि यदि किसान या स्थानीय समुदाय के सामने वैध और टिकाऊ आजीविका का विकल्प उपलब्ध न हो तो अवैध खेती किसी अन्य क्षेत्र में स्थानांतरित होने का जोखिम रहता है। इसलिए अवैध खेती रोकने के साथ वैकल्पिक फसलों, स्थानीय रोजगार और आर्थिक अवसरों को बढ़ावा देने की रणनीति भी आवश्यक है।इस सम्मेलन के तकनीकी विचार-विमर्श में अवैध खेती और वैकल्पिक फसलों को शामिल किया जाना इसी व्यापक दृष्टिकोण की ओर सटीकता से संकेत करता है।

साथियों,नशे के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को कमजोर करने के लिए आर्थिक प्रहार भी महत्वपूर्ण है। तस्करी से अर्जित धन जब संपत्ति, व्यवसाय, हवाला व्यवस्था या अन्य वित्तीय माध्यमों में प्रवेश करता है, तब यह अपराध की अगली पीढ़ी को आर्थिक शक्ति प्रदान करता है।इसलिए केवल तस्करों की गिरफ्तारी के बजाय अवैध आय के स्रोत, धन के प्रवाह और अपराध से अर्जित संपत्तियों की पहचान तथा कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई पर भी ध्यान देना आवश्यक है।यहां प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या मिलीभगत के आरोप सामने आने पर कानून के अनुसार निष्पक्ष जांच और दोष सिद्ध होने पर उचित कार्रवाई व्यवस्था में विश्वास मजबूत कर सकती है।इसी संदर्भ में प्रशासनिक “शून्य सहनशीलता” का अर्थ केवल कठोर दंड नहीं, बल्कि कानून का समान, पारदर्शी और जवाबदेह अनुपालन होना चाहिए। मादक पदार्थों के विरुद्ध अभियान की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के भीतर सूचना किस गति से साझा होती है, सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी कितनी प्रभावी है, जांच कितनी वैज्ञानिक है और विभिन्न एजेंसियां एक-दूसरे के साथ किस स्तर पर समन्वय करती हैं। भारत में सभी राज्यों द्वारा मादक पदार्थ विरोधी कार्यबल गठित किए जाने की जानकारी पहले से सार्वजनिक है, जिससे राज्य स्तर पर समन्वित कार्रवाई के लिए संस्थागत आधार सटीकता से तैयार हुआ है।

साथियों तकनीक इस लड़ाई का अगला निर्णायक क्षेत्र बनती जा रही है। सीमा क्षेत्रों में मानवरहित विमान, निगरानी प्रणालियां,आंकड़ा विश्लेषण, संचार निगरानी, वित्तीय लेन-देन की जांच और डिजिटल साक्ष्य का वैज्ञानिक विश्लेषण तस्करी के बदलते तरीकों को समझने में सहायता कर सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ प्रशिक्षित मानव संसाधन, स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया और विभिन्न एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था भी हो। इसलिए क्षमता निर्माण और समन्वय को मादक पदार्थ नियंत्रण के रणनीतिक स्तंभों में शामिल करना महत्वपूर्ण है।

साथियों,इस पूरी रणनीति का तीसरा पक्ष उपचार और पुनर्वास है। नशे की गिरफ्त में आए व्यक्ति को केवल अपराधी के रूप में देखने के बजाय, जहां कानून और परिस्थितियां इसकी अनुमति दें,उपचार, परामर्श और पुनर्वास की व्यवस्था को भी मजबूत करना आवश्यक है। परिवारों को सहायता,युवाओं के लिए परामर्श, मानसिक -सामाजिक सहयोग, पुनर्वास के बाद रोजगार तथा समाज में पुनः सम्मानजनक वापसी जैसे उपाय मांग को दीर्घकाल में कम करने में योगदान दे सकते हैं। इसी कारण सम्मेलन में मांग में कमी और क्षति में कमी के साथ पुनर्वास से जुड़े विषयों को भी चर्चा का सटीकता से हिस्सा बनाया गया है।

साथियों,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मादक पदार्थों की तस्करी किसी एक सीमा पर समाप्त नहीं होती। एक देश में तैयार पदार्थ दूसरे देश के मार्ग से तीसरे देश के बाजार तक पहुंच सकता है। इसी प्रकार धन का प्रवाह अनेक देशों की वित्तीय प्रणालियों से होकर गुजर सकता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, सूचना साझाकरण, संयुक्त जांच और सीमा-पार अपराध नेटवर्क के विरुद्ध समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता बढ़ जाती है। भारत की रणनीति को घरेलू कानून-व्यवस्था के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आयाम से भी जोड़ना आवश्यक होगा।नई दिल्ली में आयोजित यह सम्मेलन इसी व्यापक चुनौती के बीच नीति, प्रवर्तन और समन्वय के अगले चरण की दिशा निर्धारित करने का अवसर प्रदान कर रहा है। सम्मेलन में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मादक पदार्थ विरोधी कार्यबल को सम्मानित किया जाना तथा केंद्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो की नई वेबसाइट का शुभारंभ किया जाना संस्थागत क्षमता और सार्वजनिक पहुंच बढ़ाने की दिशा में उठाए गए कदम हैं। लखनऊ और देहरादून में केंद्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो के नए क्षेत्रीय परिसरों की आधारशिला भी इसी अवसर पर सटीकता से रखी जा रही है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नशामुक्त समाज का निर्माण केवल गिरफ्तारी, जब्ती और दंड का विषय नहीं है। यह एक ऐसा राष्ट्रीय और वैश्विक प्रयास है जिसमें परिवार की जागरूकता, विद्यालय की भूमिका समाज की संवेदनशीलता,प्रशासन की जवाबदेही, पुलिस की दक्षता,सीमा सुरक्षा की मजबूती, वित्तीय निगरानी, आधुनिक तकनीक, उपचार और पुनर्वास-सभी को एक साथ काम करना होगा।भारत के 2026-2029 के मादक पदार्थ नियंत्रण दृष्टि दस्तावेज में प्रवर्तन एवं खुफिया कार्रवाई,पूर्ववर्ती और कृत्रिम नशीले पदार्थों का नियंत्रण, मांग एवं क्षति में कमी तथा क्षमता निर्माण एवं समन्वय जैसे चार रणनीतिक स्तंभ निर्धारित किए गए हैं। इन चारों स्तंभों का प्रभावी क्रियान्वयन ही यह निर्धारित करेगा कि नशे के विरुद्ध अभियान केवल सरकारी बैठकों और जागरूकता अभियानों तक सीमित रहता है या वास्तव में तस्करी के आर्थिक, तकनीकी और संगठित अपराध तंत्र को कमजोर करने में स्थायी परिणाम देता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल नशामुक्त भारत का संकल्प लेने की नहीं,बल्कि उस संकल्प को प्रत्येक स्तर पर जवाबदेह कार्रवाई, वैज्ञानिक जांच, सामाजिक सहयोग और निरंतर निगरानी में बदलने की है।यही समन्वित दृष्टिकोण भारत की युवा शक्ति को सुरक्षित रखने और दीर्घकालीन सामाजिक- आर्थिक विकास के लिए मजबूत आधार तैयार कर सकता है।