शिक्षा और समाज सुधार के शिल्पकार: ईश्वरचंद्र विद्यासागर और उनका प्रासंगिक चिंतन

Architects of Education and Social Reform: Ishwar Chandra Vidyasagar and His Relevant Thought

दिलीप कुमार पाठक

किसी समाज के पढ़े-लिखने का असली पैमाना क्या है? क्या केवल साक्षरता के आंकड़े बढ़ जाना या बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर लेना ही विकास है? आज 26 सितंबर को जब हम ईश्वरचंद्र विद्यासागर को याद कर रहे हैं, तो हमें उनके जीवन के इसी बुनियादी सवाल से शुरुआत करनी होगी। विद्यासागर के लिए ज्ञान केवल पन्नों पर लिखी बातें या कमरों में बैठकर की जाने वाली चर्चा नहीं था। वे मानते थे कि शिक्षा का असली काम समाज के सबसे कमजोर और आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को व्यावहारिक रूप से बदलना है। जब तक कोई सीख जमीन पर उतरकर किसी इंसान का जीवन बेहतर नहीं बनाती, तब तक वह केवल बौद्धिक विलासिता है।

विद्यासागर के समय का सामाजिक ढांचा बहुत संकीर्ण और जातिगत भेदभाव से भरा हुआ था। पढ़ाई-लिखाई जैसी बुनियादी जरूरत पर कुछ गिने-चुने रसूखदार लोगों का कब्जा था, जिससे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा तरक्की की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ था। संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में उनके प्रशासनिक और शैक्षणिक फैसले आज के नीति-निर्माताओं के लिए भी एक बड़ी सीख बन सकते हैं। उन्होंने कॉलेज के बरसों पुराने नियमों को बदलते हुए उसके दरवाजे उन गरीब और वंचित जातियों के लिए भी खोल दिए, जिन्हें उस दौर की व्यवस्था पढ़ने के लायक नहीं मानती थी। उनका यह कदम किसी तात्कालिक भावुकता का नतीजा नहीं था, बल्कि इसके पीछे यह साफ और व्यावहारिक सोच थी कि समाज की बराबरी और देश का वास्तविक बौद्धिक विकास ज्ञान को हर घर तक पहुंचाए बिना मुमकिन ही नहीं है। इसके साथ ही, उन्होंने रटने वाली पुरानी प्रणाली की जगह तार्किक और आसानी से समझ आने वाली शिक्षा की बात की। बच्चों के लिए लिखी गई उनकी किताब ‘बर्णपरिचय’ सिर्फ अक्षरों का ज्ञान नहीं थी, बल्कि आम लोगों को बहुत आसानी से साक्षर बनाने का एक ऐतिहासिक प्रयास था।लड़कियों की पढ़ाई और उनके हक को लेकर विद्यासागर की सोच अपने समय से बहुत आगे थी। 19वीं सदी के बीच में जब महिलाओं की शिक्षा को सामाजिक और धार्मिक रूप से गलत मानकर अंधविश्वासों से जोड़ा जाता था, तब उन्होंने रूढ़िवादिता के इस ढर्रे को तार्किक रूप से तोड़ा। उन्होंने न केवल महिला शिक्षा की अहमियत को समाज के सामने रखा, बल्कि जमीन पर आगे बढ़कर अपने खुद के पैसों और देखरेख में दर्जनों नए स्कूलों की स्थापना की। वे इस कड़वे सच से अच्छी तरह वाकिफ थे कि किसी भी समाज या देश की प्रगति तब तक अधूरी है, जब तक उसकी आधी आबादी को बराबरी के अधिकार और वैचारिक आजादी न मिले।

इसी प्रकार, विधवा विवाह के पक्ष में उनका ऐतिहासिक संघर्ष केवल एक कानून पास करवाने तक सीमित नहीं था। यह उस अमानवीय कुप्रथा पर एक तीखा प्रहार था जो किसी मासूम बच्ची या महिला के पति की मौत के बाद उसकी जिंदगी को जीते जी नरक बना देती थी। जब इस कानून का पूरे समाज ने खुलकर विरोध किया, तब उन्होंने समाज के सामने कथनी और करनी की एकता की एक बड़ी मिसाल पेश की। उन्होंने अपने इकलौते बेटे का विवाह एक विधवा महिला से करवाकर यह साबित किया कि एक सुधारक को सबसे पहले खुद के जीवन से ही बदलाव की शुरुआत करनी चाहिए। उनकी सादगी और ऊंचे नैतिक उसूलों का एक किस्सा उनकी वैचारिक मजबूती को बहुत अच्छे से दिखाता है। एक बार राह चलते उन्होंने कड़ाके की ठंड में एक बेसहारा व्यक्ति को देखा, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के अपने कंधे की कीमती ऊनी शॉल उसे सौंप दी। जब उनके साथियों ने इस पर चिंता जताई, तो उनका जवाब बहुत सीधा था कि एक इंसान द्वारा अकेले भारी कष्ट भोगने से कहीं बेहतर है कि दो लोग मिलकर थोड़ी-थोड़ी असुविधा बांट लें। यही संवेदनशीलता उनके चिंतन की आत्मा थी।

जब भी उनके नौकरी के दौरान उनके आत्मसम्मान या उसूलों के सामने झुकने की स्थिति आई, उन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत फायदे या लालच के अपने ऊंचे पदों से तुरंत इस्तीफा दे दिया।आज जब हम डिजिटल और तकनीकी युग में विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तो विद्यासागर के विचार हमें अपनी प्रगति का असली पैमाना देखने पर मजबूर करते हैं।

आधुनिकता केवल कपड़ों, गैजेट्स या संसाधनों के विकास से नहीं आती, बल्कि वह हमारी सोच के बदलने और सामाजिक न्याय से तय होती है। आज का यह विमर्श केवल एक औपचारिकता बनकर न रह जाए, बल्कि यह हमारे बौद्धिक जगत के लिए आत्ममंथन का क्षण होना चाहिए। विद्यासागर के विचारों की सच्ची सार्थकता तभी होगी जब हमारा समाज उनकी सादगी, निर्भीकता और व्यावहारिक बदलावों को नीतिगत और व्यक्तिगत स्तर पर अपनाने का हौसला जुटा पाएगा।