पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और जीवित माता-पिता की सेवा

True reverence for ancestors and service to living parents

अजय कुमार बियानी

पितृपक्ष आते ही घरों में पूर्वजों के स्मरण की परंपरा शुरू हो जाती है। उनके नाम पर तर्पण किया जाता है, ब्राह्मण भोज कराया जाता है, दान दिया जाता है और श्रद्धापूर्वक पितरों को याद किया जाता है। भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का यह भाव सदियों पुराना है। यह परंपरा हमें अपनी जड़ों, अपने परिवार और उन लोगों को याद करने का अवसर देती है, जिनके कारण हमारा अस्तित्व संभव हुआ।
पितृपक्ष केवल धार्मिक कर्मकांड का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर भी है। यह हमें याद दिलाता है कि आज हम जहां खड़े हैं, वहां तक पहुंचने में हमारे माता-पिता और पूर्वजों का कितना बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने अपने सुखों का त्याग किया, हमारी आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी और परिवार के निर्माण व संरक्षण में अपना जीवन समर्पित कर दिया।

लेकिन इसी परंपरा के बीच एक प्रश्न मन को भीतर तक झकझोरता है—जिन माता-पिता को हमने जीवन रहते अपने हाथों से भोजन नहीं कराया, उनके साथ बैठने के लिए समय नहीं निकाला, उनकी आवश्यकताओं को समझने का प्रयास नहीं किया और उनके अकेलेपन को महसूस नहीं किया, उनके निधन के बाद उनके नाम पर बड़े-बड़े भोज कराने का वास्तविक अर्थ कितना गहरा है?

यह प्रश्न पितृपक्ष की परंपरा पर सवाल उठाने के लिए नहीं, बल्कि उसके मूल भाव को समझने के लिए है।

जिस मां ने बचपन में अपनी पसंद का निवाला भी हमारी थाली में रख दिया, क्या उसे बुढ़ापे में अपनी थाली के लिए संतान का इंतजार करना चाहिए? जिस पिता ने अपनी जरूरतें रोककर बच्चों की इच्छाएं पूरी कीं, क्या वृद्धावस्था में वही पिता अपने ही घर में बोझ समझे जाने चाहिए?
जिस मां ने रातों को जागकर हमारी चिंता की, क्या उसके बुढ़ापे में हमारे पास उसके पास बैठने का समय नहीं होना चाहिए? जिस पिता ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई, घर और भविष्य पर लगा दिया, क्या उनके वृद्ध हाथों को सहारे के लिए किसी दूसरे की ओर देखना चाहिए?

यह प्रश्न किसी एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का है।

हमारे आसपास ऐसे अनेक बुजुर्ग दिखाई देते हैं, जो उम्र के उस पड़ाव पर भी काम करने को विवश हैं, जब उन्हें परिवार के साथ सम्मान और सुकून से जीवन बिताना चाहिए। कोई सड़क किनारे सामान बेच रहा है, कोई दुकान के बाहर बैठा है, कोई मजदूरी कर रहा है और कोई दूसरों के सामने सहायता के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है। कुछ बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में जीवन की अंतिम पारी गुजार रहे हैं।
आखिर ये बुजुर्ग कौन हैं?

क्या ये किसी दूसरे समाज से आए हैं?

इनमें भी किसी की मां होगी, किसी का पिता होगा। किसी ने अपने बच्चों को गोद में खिलाया होगा, किसी ने स्कूल की फीस के लिए अपनी जरूरतें रोकी होंगी और किसी ने अपनी छोटी-सी इच्छा इसलिए त्याग दी होगी कि बच्चे की इच्छा पूरी हो सके।

फिर प्रश्न उठता है—यदि हम पितरों से प्रेम और श्रद्धा की बात करते हैं, तो जीवित बुजुर्गों के प्रति हमारी संवेदना इतनी कमजोर क्यों पड़ गई?
समय बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार बढ़ रहे हैं। बच्चे पढ़ाई और रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में चले जाते हैं। व्यस्त जीवन और बदलती पारिवारिक परिस्थितियों के कारण माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी भी बढ़ सकती है। हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं और हर दूरी को संवेदनहीनता नहीं कहा जा सकता। लेकिन जहां माता-पिता हमारे साथ हैं, वहां उनके लिए समय निकालना हमारी जिम्मेदारी अवश्य है।

पितृपक्ष हमें इसी जिम्मेदारी की याद दिला सकता है।

दान-पुण्य की अपनी धार्मिक और सामाजिक महत्ता है। लेकिन पितरों के नाम पर किया गया दान यदि किसी अकेली मां की दवा खरीद दे, किसी वृद्ध पिता के लिए गर्म कपड़े उपलब्ध करा दे या किसी बेसहारा बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान ला दे, तो उसका सामाजिक अर्थ और भी व्यापक हो सकता है।

आवश्यकता इस बात की है कि श्रद्धा केवल आयोजन तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे।

हम अक्सर कहते हैं कि माता-पिता भगवान का रूप हैं। भगवान की पूजा के लिए हम मंदिर जाते हैं, समय निकालते हैं, फूल और प्रसाद चढ़ाते हैं। लेकिन कई बार अपने माता-पिता के पास बैठने के लिए हमारे पास दस मिनट भी नहीं होते। उनकी बात सुनने का समय नहीं मिलता। उनकी छोटी-सी आवश्यकता भी हमें बार-बार याद दिलाने पर पूरी होती है। लेकिन उनके निधन के बाद उनके नाम पर बड़े आयोजन करने के लिए समय और संसाधन जुट जाते हैं।

यह विरोधाभास हमें गंभीरता से सोचने को विवश करता है।

पितरों को हमारे दिखावे की आवश्यकता नहीं है। उन्हें हमारी सच्ची श्रद्धा चाहिए। और श्रद्धा का सबसे सुंदर रूप सेवा है।

जीते जी मां-बाप की थाली में प्रेम से परोसी गई एक रोटी, उनके नाम पर बनाए गए अनेक पकवानों से अधिक मूल्यवान हो सकती है। उनके अकेलेपन में दिया गया एक घंटा, उनके निधन के बाद किए गए बड़े आयोजन से अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। उनके कांपते हाथ को थाम लेना, उनकी बात धैर्यपूर्वक सुन लेना और उनकी आवश्यकताओं के बारे में पूछ लेना—ये छोटे कार्य लग सकते हैं, लेकिन बुजुर्गों के लिए इनका महत्व बहुत बड़ा होता है।

इस पितृपक्ष जब हम अपने पूर्वजों के लिए भोजन बनाएं, दान करें और उनका स्मरण करें, तब एक बार अपने घर के उस बुजुर्ग की ओर भी अवश्य देखें, जो चुपचाप हमारी ओर देख रहा है।

पूछें—“बाबा, खाना खा लिया?”

पूछें—“मां, आपको किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं?”

कभी उनके पास बैठकर उनके पुराने दिनों की बातें सुनें। हो सकता है, वही किस्सा उन्होंने पहले भी कई बार सुनाया हो, लेकिन इस बार उन्हें बीच में रोकने के बजाय पूरा सुन लें। उनके लिए वह किस्सा पुराना हो सकता है, लेकिन उसे सुनने वाला अपना कोई हो, यह एहसास उनके लिए नया हो सकता है।

पूर्वजों का सम्मान केवल उनके नाम पर किए गए कर्मकांड से नहीं, बल्कि उनके दिए संस्कारों को जीवन में उतारने से होता है। उन्होंने हमें संभाला, खिलाया, हमारी आवश्यकताएं पूरी कीं और अपना जीवन हमारे भविष्य के लिए समर्पित कर दिया। उनके प्रति सबसे बड़ी कृतज्ञता यही होगी कि बुढ़ापे में हम उनका हाथ थामें और उन्हें यह एहसास कराएं कि वे परिवार के लिए बोझ नहीं, बल्कि उसकी जड़ हैं।

पितृपक्ष हमें मृत पूर्वजों को याद करने के साथ-साथ जीवित बुजुर्गों को पहचानने का अवसर भी देता है। हमारे आसपास कोई अकेला बुजुर्ग है, पड़ोस में कोई वृद्ध दंपती है या परिवार में कोई ऐसा सदस्य है जिसे केवल थोड़े समय और अपनत्व की आवश्यकता है, तो उसके लिए कुछ करना भी पितृस्मरण की भावना को आगे बढ़ाना है।

कर्मकांड अपनी जगह हैं, पर कर्म का महत्व उससे कहीं बड़ा है। भोजन बनाना अच्छी बात है, लेकिन भूखे को भोजन कराना उससे बड़ी बात है। दान करना अच्छी बात है, लेकिन जरूरतमंद की आवश्यकता समझना उससे बड़ी बात है। पितरों का स्मरण अच्छी बात है, लेकिन उनके दिए संस्कारों के अनुसार जीवन जीना सबसे बड़ी बात है।

मृत्यु के बाद की श्रद्धा हमारी परंपरा हो सकती है, लेकिन जीवन रहते की गई सेवा हमारी जिम्मेदारी है।

सबसे बड़ा पितृऋण शायद यही है—जिन माता-पिता ने हमें जीते जी भरपेट खिलाया, उन्हें हम जीते जी सम्मान और स्नेह के साथ भोजन करा सकें; जिन्होंने हमें संभाला, बुढ़ापे में हम उन्हें संभाल सकें और जिनके आशीर्वाद से हमारा घर बना, उस घर में उनके लिए सम्मान की जगह हमेशा बनी रहे।

पितरों के नाम पर किया गया एक दिन का आयोजन हमें अपनी जड़ों से जोड़ सकता है, लेकिन माता-पिता और बुजुर्गों की दैनिक सेवा उन जड़ों को मजबूत बनाती है।

क्योंकि सच्ची श्रद्धांजलि तस्वीर पर माला चढ़ाने से पहले उस जीवन को सम्मान देना है, जिसने हमें जीवन दिया।

पितरों को प्रसन्न करने का सबसे सुंदर मार्ग शायद यही है—उनके दिए संस्कारों को जीवित रखना और जीवित माता-पिता को सम्मान, समय और प्रेम देना।

यही पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। यही संस्कारों की वास्तविक विरासत है।