संकटकाल में संबल बनती भारतीय मूल्यों और अध्यात्म की शक्ति

The Power of Indian Values ​​and Spirituality as a Source of Strength During Times of Crisis

अजय कुमार बियानी

आज संपूर्ण विश्व जिस प्रकार के मानसिक तनाव, सामाजिक बिखराव और अभूतपूर्व वैश्विक चुनौतियों से जूझ रहा है, उसमें भारतीय जीवन दर्शन और अध्यात्म की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। मानव इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी भौतिकता की अंधी दौड़ ने इंसान को भीतर से खोखला किया है, तब-तब भारत के सनातन मूल्यों ने संपूर्ण मानवता को एक नई राह दिखाई है। वर्तमान दौर में जहाँ एक ओर तकनीकी और आर्थिक प्रगति की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं और आंतरिक शांति का अभाव साफ देखा जा सकता है। ऐसे संक्रमण काल में भारतीय अध्यात्म केवल एक पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक अनुकरणीय कला और कठिन परिस्थितियों से लड़ने का सबसे बड़ा मानसिक संबल बनकर उभरा है।

भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता रही है कि इसने व्यक्ति को संकट के समय धैर्य और संयम बनाए रखने की सीख दी है। हमारे शास्त्रों और दर्शन में निहित ज्ञान हमें यह सिखाता है कि अनुकूल समय में विनम्र रहना और प्रतिकूल समय में अडिग रहना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। जब जीवन में अनिश्चितता का अंधकार छा जाता है और भविष्य धुंधला दिखाई देने लगता है, तब हमारी आध्यात्मिक चेतना ही हमारे भीतर आशा की नई किरण जगाती है। हनुमान जी के स्मरण मात्र से बड़े से बड़े संकटों के टल जाने का जो दृढ़ विश्वास भारतीय जनमानस के रग-रग में बसा है, वह केवल एक धार्मिक आस्था नहीं है। वह दरअसल उस अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मबल का प्रतीक है जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को हार न मानने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि आज का प्रबुद्ध समाज और युवा पीढ़ी भी इस आंतरिक शक्ति की महत्ता को गहराई से स्वीकार कर रही है।

संकटकाल में साहस और सूझबूझ का एक अनुपम उदाहरण हाल ही में देखने को मिला, जब फ्लाईदुबई विमान के मुख्य भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार ने मध्य आकाश में ३०००० फीट की ऊंचाई पर अपने सह-पायलट द्वारा किए गए जानलेवा हमले के बावजूद अदम्य साहस का परिचय दिया। गंभीर रूप से घायल और लहूलुहान होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी सूझबूझ से न केवल कॉकपिट का दरवाजा खोला, बल्कि चालक दल व यात्रियों की मदद से हमलावर पर काबू पाकर विमान में सवार सभी १७४ यात्रियों की सुरक्षित जान बचाई। अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की रक्षा करने का यह जज्बा और विकट परिस्थितियों में भी अपना मानसिक संतुलन न खोने का यह गुण सीधे तौर पर हमारी उसी आध्यात्मिक सोच को दर्शाता है जो हमें ‘जीओ और जीने दो’ तथा दूसरों के कल्याण की प्रेरणा देती है।

इस आध्यात्मिक जागरण का प्रभाव आज हमारे सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारतीय मूल्यों का मूल आधार ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ की भावना है, जो व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर परमार्थ की ओर ले जाती है। संकट के समय जब समाज का हर वर्ग एक-दूसरे की सहायता के लिए आगे आता है, तो वह इसी सांस्कृतिक चेतना का प्रकटीकरण होता है। आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ एकाकीपन और अवसाद जैसी समस्याएँ पैर पसार रही हैं, वहाँ भारतीय संयुक्त परिवार प्रणाली, आपसी सौहार्द और अध्यात्म आधारित जीवन शैली एक सुरक्षा कवच का कार्य कर रही है। यह शक्ति हमें सिखाती है कि बाहरी सुख-सुविधाएँ कितनी भी अधिक क्यों न हों, वास्तविक सुख और शांति आंतरिक संतोष से ही प्राप्त की जा सकती है।

दूरगामी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह वैचारिक और आध्यात्मिक पुनरुत्थान भारत को वैश्विक पटल पर एक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। दुनिया के तमाम समृद्ध देश आज आर्थिक और सैन्य रूप से शक्तिशाली होने के बावजूद आंतरिक शांति के लिए छटपटा रहे हैं। ऐसे में भारत का यह सनातन चिंतन संपूर्ण विश्व के लिए एक वरदान सिद्ध हो सकता है। यह चेतना समाज के हर नागरिक को राष्ट्र निर्माण के प्रति उसके कर्तव्यों का बोध कराती है और उसे एक संवेदनशील तथा जागरूक इंसान बनाती है। वैचारिक मतबेधों और रोजमर्रा के संघर्षों से ऊपर उठकर जब पूरा समाज अपने इन मूल जीवन मूल्यों को आत्मसात करता है, तो एक ऐसे सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की नींव पड़ती है जिसे दुनिया की कोई भी चुनौती डिगा नहीं सकती। यह आध्यात्मिक संबल ही आने वाले समय में एक गौरवशाली और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का मुख्य आधार बनेगा।