महेन्द्र तिवारी
जापान के आइची और नागोया में आयोजित 2026 के एशियाई खेल भारत के लिए अनेक उपलब्धियों और यादगार क्षणों से भरे रहे। भारतीय खिलाड़ियों ने प्रतियोगिता के अंतिम चरण में जिस तरह शानदार प्रदर्शन करते हुए पदकों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी की, उसने पूरे देश को उत्साह और गर्व से भर दिया। भारत ने इन खेलों का समापन 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदकों के साथ किया और पदक तालिका में चौथा स्थान प्राप्त किया।
85 पदकों का आंकड़ा अपने आप में महत्वपूर्ण है। हालांकि भारत 2023 के हांगझोउ एशियाई खेलों में प्राप्त 106 पदकों के रिकॉर्ड को दोहरा नहीं सका, लेकिन 2026 में मिले 21 स्वर्ण पदक भारतीय खेल इतिहास में उल्लेखनीय उपलब्धि हैं। प्रतियोगिता के अंतिम दिन भारत ने जिस प्रकार लगातार स्वर्ण पदक जीते, उससे ऐसा लगा कि भारतीय दल ने अंतिम क्षण तक अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन करने का संकल्प ले रखा था। अंतिम दिन ही क्रिकेट, हॉकी, कुश्ती, तीरंदाजी और गोल्फ में भारत ने स्वर्ण पदक हासिल किए।
भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम का पाकिस्तान के विरुद्ध स्वर्ण पदक मुकाबला इन खेलों का सबसे चर्चित मुकाबला रहा। निस्शिन में खेले गए इस मुकाबले में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 6 विकेट पर 211 रन बनाए। अभिषेक शर्मा ने 61 रन की शानदार पारी खेली, जबकि तिलक वर्मा ने केवल 22 गेंदों पर नाबाद 51 रन बनाकर भारतीय पारी को मजबूत आधार दिया। जवाब में पाकिस्तान की टीम 6 विकेट पर 192 रन ही बना सकी। उसके बल्लेबाज हसन नवाज ने 96 रन की जुझारू पारी खेली, लेकिन वह अपनी टीम को जीत तक नहीं पहुंचा सके। भारत ने 19 रन से मुकाबला जीतकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
इस जीत का महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि भारतीय महिला क्रिकेट टीम पहले ही स्वर्ण पदक जीत चुकी थी। इस प्रकार भारत ने एशियाई खेलों में क्रिकेट के दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक जीतकर शानदार दोहरी सफलता हासिल की। पुरुष टीम की पाकिस्तान पर जीत ने इस उपलब्धि को और विशेष बना दिया। भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मुकाबले हमेशा से खेल प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहे हैं। ऐसे में एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक के लिए हुआ यह मुकाबला लंबे समय तक याद किया जाएगा।
भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने भी देश को गौरवान्वित किया। फाइनल में भारत ने मलेशिया को 5-1 से हराकर लगातार दूसरी बार एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता। कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने दो गोल किए, जबकि जुगराज सिंह, हार्दिक सिंह और शिलानंद लाकड़ा ने एक-एक गोल करके भारत की जीत को मजबूत किया। मलेशिया ने शुरुआती बराबरी के बाद भारतीय दबाव का सामना करने की कोशिश की, लेकिन भारतीय टीम ने धीरे-धीरे मुकाबले पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर लिया।
हॉकी में मिली यह सफलता केवल स्वर्ण पदक तक सीमित नहीं रही। इस जीत के साथ भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक खेलों में सीधे प्रवेश भी सुनिश्चित कर लिया। एशियाई खेलों की पुरुष हॉकी प्रतियोगिता के विजेता को ओलंपिक में सीधे प्रवेश मिलता है। इस प्रकार भारतीय टीम को अब ओलंपिक प्रवेश के लिए अलग से योग्यता प्रतियोगिता में संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।
भारतीय हॉकी के लिए यह उपलब्धि विशेष महत्व रखती है। एक समय विश्व हॉकी में भारत का दबदबा था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में उसे अनेक उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ा। अब लगातार दो एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतना यह बताता है कि भारतीय पुरुष हॉकी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत स्थिति फिर से बनाई है। 2028 के ओलंपिक के लिए सीधे प्रवेश से खिलाड़ियों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय भी मिलेगा। अब भारतीय टीम के सामने चुनौती इस सफलता को ओलंपिक पदक में बदलने की होगी।
इन खेलों में तीरंदाजी ने भी भारत को महत्वपूर्ण सफलता दिलाई। 17 वर्षीय कुमकुम अनिल महोद ने महिला व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में स्वर्ण जीतकर इतिहास रच दिया। वह इस स्पर्धा में एशियाई खेलों का व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उनकी सफलता ने भारतीय तीरंदाजी में नई संभावनाओं को सामने रखा। महिला रिकर्व टीम की सफलता भी उल्लेखनीय रही और उसने दक्षिण कोरिया के लंबे समय से चले आ रहे प्रभुत्व को समाप्त किया।
निशानेबाजी में भी भारत ने शानदार प्रदर्शन किया। नीरू धांडा ने महिला ट्रैप व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर 48 वर्ष का इंतजार समाप्त किया। मिश्रित ट्रैप स्पर्धा में नीरू धांडा और कयनान चेनाई की जोड़ी ने भी स्वर्ण पदक हासिल किया और नया एशियाई कीर्तिमान बनाया। निशानेबाजी से भारत को कुल 15 पदक मिले। इससे स्पष्ट है कि भारतीय निशानेबाज अब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार मजबूत दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं।
गोल्फ में प्रणवी उर्स ने भारतीय खेल इतिहास में नया अध्याय जोड़ा। उन्होंने महिला व्यक्तिगत गोल्फ स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इस प्रतियोगिता में भारत की पहली महिला व्यक्तिगत गोल्फ स्वर्ण विजेता बनने का गौरव हासिल किया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोल्फ को भारत में अभी क्रिकेट, हॉकी या कुश्ती जितना व्यापक जनसमर्थन नहीं मिला है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली ऐसी सफलता इस खेल के प्रति युवाओं की रुचि बढ़ा सकती है।
कुश्ती में अमन सहरावत ने पुरुषों की 57 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। उन्होंने उत्तर कोरिया के विश्व चैंपियन चोंग सोंग हान को 11-7 से हराया। कुश्ती के अलावा मुक्केबाजी में भी भारत को महत्वपूर्ण सफलताएँ मिलीं। लवलीना बोरगोहेन ने स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय महिला मुक्केबाजी के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। वह एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला मुक्केबाज बनीं।
एथलेटिक्स भारत के पदक अभियान का सबसे बड़ा आधार बना। इस खेल में भारत ने कुल 24 पदक हासिल किए। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय खेल व्यवस्था में एथलेटिक्स का आधार लगातार मजबूत हो रहा है। एथलेटिक्स में बड़ी संख्या में पदक मिलना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें विभिन्न प्रकार की दौड़, कूद और फेंक स्पर्धाएँ शामिल होती हैं। एक ही खेल से इतने अधिक पदक मिलना भारत की व्यापक खेल क्षमता का संकेत है।
फिर भी इस प्रदर्शन का विश्लेषण केवल पदकों की संख्या देखकर नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने 85 पदक जीते, लेकिन 2023 में 106 पदक जीतने के बाद यह संख्या कम है। इसलिए भारतीय खेल व्यवस्था के लिए यह आत्ममंथन का भी अवसर है। किन खेलों में उम्मीद के अनुरूप परिणाम नहीं मिले, किन खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण की आवश्यकता है और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के दबाव से निपटने की तैयारी में कहाँ कमी रही, इन सभी प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना होगा। कुछ खेलों में भारत की अपेक्षाएँ अधिक थीं, लेकिन परिणाम उतने प्रभावशाली नहीं रहे।
इसके बावजूद 2026 के एशियाई खेलों की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि भारत की सफलता कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित नहीं रही। क्रिकेट और हॉकी के साथ तीरंदाजी, निशानेबाजी, कुश्ती, मुक्केबाजी, गोल्फ और एथलेटिक्स में भी भारतीय खिलाड़ियों ने पदक हासिल किए। इसका अर्थ है कि देश में विभिन्न खेलों के लिए आधार तैयार हो रहा है। युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मंच मिल रहा है और कई नए चेहरे भविष्य की बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए अपनी पहचान बना रहे हैं।
खेल किसी भी देश के लिए केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं होते। वे अनुशासन, धैर्य, परिश्रम और सामूहिक भावना को मजबूत करते हैं। एक खिलाड़ी वर्षों तक अभ्यास करता है, असफलताओं से गुजरता है और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए किसी पदक के पीछे केवल उस दिन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, प्रशिक्षकों का मार्गदर्शन, परिवार का सहयोग और संस्थागत व्यवस्था की भूमिका होती है।
2026 के एशियाई खेलों ने भारत को यह विश्वास भी दिया है कि खेलों में बड़ी उपलब्धियाँ केवल पारंपरिक खेलों से नहीं, बल्कि अनेक क्षेत्रों से हासिल की जा सकती हैं। कुमकुम महोद और प्रणवी उर्स जैसी खिलाड़ियों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि नए खेलों और नई पीढ़ी को अवसर देने से अप्रत्याशित उपलब्धियाँ सामने आ सकती हैं। ऐसे खिलाड़ियों को लंबे समय तक उचित प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तैयारी और प्रतियोगिताओं का अनुभव मिलना जरूरी है।
अब भारतीय खेल जगत की निगाहें 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक पर होंगी। पुरुष हॉकी टीम ने वहां अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया है। अन्य खेलों के खिलाड़ियों के लिए भी एशियाई खेलों का अनुभव आगे की तैयारी का आधार बनेगा। यदि भारतीय खेल व्यवस्था इन उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पोषण, मानसिक तैयारी और अंतरराष्ट्रीय अनुभव पर अधिक ध्यान देती है, तो ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन की संभावनाएँ मजबूत हो सकती हैं।
अंततः 2026 के एशियाई खेल भारत के लिए केवल 85 पदकों की कहानी नहीं हैं। यह 21 स्वर्ण पदकों की कहानी है, उन खिलाड़ियों की कहानी है जिन्होंने दबाव के बीच संयम रखा, उन युवाओं की कहानी है जिन्होंने पहली बार इतिहास बनाया और उन अनुभवी खिलाड़ियों की कहानी है जिन्होंने देश को गौरव दिलाया। क्रिकेट में पाकिस्तान पर 19 रन की जीत, हॉकी में मलेशिया पर 5-1 की विजय, तीरंदाजी में ऐतिहासिक स्वर्ण, गोल्फ में पहली महिला व्यक्तिगत स्वर्ण उपलब्धि और निशानेबाजी तथा एथलेटिक्स में शानदार प्रदर्शन ने भारत के अभियान को विशेष बना दिया। 85 पदकों के साथ चौथा स्थान हासिल करने वाला भारत अब इन सफलताओं को आगे बढ़ाकर 2028 के ओलंपिक में और बड़ी उपलब्धियों की उम्मीद कर सकता है।





