मतदाता सूची से जंतर-मंतर तक: लोकतंत्र के भरोसे की अग्निपरीक्षा

From voter list to Jantar Mantar: the litmus test of the trust of democracy

एसआईआर विवाद और जंतर-मंतर पर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग ने चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल एक इस्तीफे की मांग नहीं, चुनावी व्यवस्था पर जनता के भरोसे का सवाल है। एसआईआर, मतदाता सूची और फॉर्म-6 से जुड़े सवालों ने निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता और जवाबदेही को कटघरे में खड़ा किया है। इन आरोपों का उत्तर सुरक्षा प्रतिबंधों से नहीं, दस्तावेजी तथ्यों, स्पष्ट प्रक्रियाओं और जवाबदेही से मिलना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव परिणाम जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही जरूरी है, प्रत्येक मतदाता को प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय महसूस हो।

योगेश कुमार गोयल

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 2, 3 और 4 अक्तूबर को दिल्ली में हुए प्रदर्शनों, बड़ी संख्या में लोगों की हिरासत, भारी सुरक्षा व्यवस्था और केंद्रीय दिल्ली के कई मार्गों तथा मैट्रो स्टेशनों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने चुनावी संस्थाओं को लेकर चल रही बहस को और तीखा कर दिया है। दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और सुरक्षा कारणों से 11 मैट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास अस्थायी रूप से बंद किए गए थे। जंतर-मंतर लोकतंत्र की उस सार्वजनिक जगह का नाम है, जहां सत्ता से असहमति दर्ज कराने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से नागरिक या संगठन आते हैं। इसलिए वहां उठी आवाज को केवल भीड़, राजनीतिक प्रदर्शन या कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना लोकतांत्रिक विमर्श को छोटा करना होगा।

मतदाता-सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं और इससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता-सूचियों को शुद्ध और अद्यतन करना है तथा गलत तरीके से छूट गए पात्र मतदाताओं को फिर शामिल करने के लिए विशेष अभियान भी शुरू किया गया है। आयोग ने अब 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसे पात्र मतदाताओं की पहचान और पुनः नामांकन के लिए विशेष अभियान की घोषणा की है। यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक आरोपों और संस्थागत तथ्यों को गहराई से देखना आवश्यक है। जब मतदाता-सूची जैसी लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था पर व्यापक संदेह पैदा हों तो निर्वाचन आयोग पर केवल यह कहकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता कि वह संवैधानिक संस्था है, इसलिए उस पर विश्वास किया जाए। संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा अधिकार से नहीं, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से मजबूत होती है।

वर्तमान विवाद का सबसे ठोस और जांच योग्य पहलू फॉर्म-6 से जुड़ा है। फॉर्म-6 मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का निर्धारित आवेदन है। विवाद तब उठा, जब एसआईआर से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा ऑनलाइन फॉर्म-6 में जोड़े जाने पर आयोग के भीतर ही दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां सामने आई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए, जिसके बाद आयोग ने 30 सितंबर को उन राज्यों में, जहां एसआईआर पूरा हो चुका है, ऑनलाइन फॉर्म-6 से यह अतिरिक्त घोषणा हटा दी। यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि घोषणा-पत्र हटाया गया या नहीं बल्कि यह है कि उसे जोड़ा किस अधिकार के तहत गया, किस स्तर पर स्वीकृति मिली, उसका तकनीकी क्रियान्वयन किस आदेश पर हुआ और बाद में उसे हटाने का निर्णय किस प्रक्रिया से लिया गया? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सार्वजनिक होने चाहिएं।

इस प्रकरण को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाने की जरूरत है। यदि कोई अतिरिक्त घोषणा वैधानिक रूप से आवश्यक नहीं थी तो उसके कारण किसी पात्र नागरिक को आवेदन प्रक्रिया में कठिनाई हुई या उसका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सका तो इसकी पहचान और सुधार जरूरी है। निर्वाचन आयोग ने अब पात्र लेकिन छूटे मतदाताओं को फिर जोड़ने के लिए विशेष अभियान की बात कही है लेकिन प्रश्न यही है कि इस प्रक्रिया के परिणाम सार्वजनिक रूप से कितने और किस तरह बताए जाएंगे। मतदाता सूची केवल सरकारी रिकॉर्ड नहीं होती, वही लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का आधार बनती है। इसलिए ‘कितने नाम हटे’ से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि कितने पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गलत तरीके से हटे, कितने वापस जोड़े गए, कितने मामलों में आपत्ति स्वीकार हुई और कितनों को अपने मताधिकार की पुनर्स्थापना के लिए अलग से संघर्ष करना पड़ा? इन आंकड़ों का राज्यवार, निर्वाचन क्षेत्रवार और कारणवार सार्वजनिक होना चाहिए। यही पारदर्शिता आरोपों और वास्तविकता के बीच अंतर स्पष्ट कर सकती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग का राजनीतिक भविष्य क्या होगा, यह कहना अभी संभव नहीं। निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है तथा उसके प्रमुख को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग है। यहां बड़ा सवाल केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का नहीं, चुनाव आयोग पर भरोसे का है। यदि नागरिकों का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगे कि मतदाता सूची में उसका नाम सुरक्षित नहीं है, चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है या निर्वाचन आयोग उसके सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं दे रहा तो लोकतंत्र के लिए यह किसी भी राजनीतिक दल की जीत-हार से कहीं अधिक गंभीर स्थिति है। चुनाव का वास्तविक आधार वह विश्वास है, जिसके कारण हारने वाला पक्ष परिणाम स्वीकार करता है और जीतने वाला पक्ष अपनी वैधता पर आश्वस्त रहता है। इसीलिए सरकार और निर्वाचन आयोग दोनों के लिए एक ही रास्ता है, सवालों का तथ्यात्मक उत्तर। सरकार को आयोग की हर आलोचना का राजनीतिक बचाव करने के बजाय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संवैधानिक संस्था पर उठे सवालों की संस्थागत जांच और सार्वजनिक स्पष्टीकरण हो। निर्वाचन आयोग को भी आलोचना को अपने विरुद्ध राजनीतिक अभियान मानकर खारिज करने के बजाय अपने निर्णयों, सॉफ्टवेयर बदलावों, आदेशों और प्रक्रियाओं का दस्तावेजी विवरण सामने रखना चाहिए।

यदि आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है तो उसके प्रशासनिक निर्णयों की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए। सरकार का काम आयोग के हर निर्णय का बचाव करना नहीं, ऐसी संस्थागत व्यवस्था सुनिश्चित करना है, जिसमें आयोग बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करे और जनता को उसके निर्णयों का विश्वसनीय स्पष्टीकरण मिल सके। जंतर-मंतर पर लोगों को रोकने के लिए की गई भारी सुरक्षा व्यवस्था ने एक दूसरी बहस भी पैदा की है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और किसी भी प्रदर्शन की सीमाएं कानून से तय होती हैं लेकिन शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि प्रतिबंध सुरक्षा की वास्तविक जरूरत के अनुपात में हों और उनका उद्देश्य नागरिकों की लोकतांत्रिक आवाज को दबाना प्रतीत न हो।

अब समय है कि इस पूरे विवाद को ‘सत्ता बनाम विपक्ष’ की संकीर्ण चौखट से बाहर निकाला जाए। चुनाव आयोग किसी सरकार का नहीं, मतदाता का आयोग है। मतदाता सूची किसी दल की संपत्ति नहीं, नागरिक के मताधिकार का आधार है और चुनाव का परिणाम किसी राजनीतिक दल की निजी उपलब्धि नहीं, संवैधानिक प्रक्रिया से मिली सार्वजनिक वैधता है। इसलिए फॉर्म-6 के विवाद से लेकर एसआईआर के आंकड़ों तक, हर प्रश्न का दस्तावेजी उत्तर सामने आना ही चाहिए। जिन मतदाताओं के नाम प्रक्रिया में छूटे हैं, उनकी पहचान और पुनर्स्थापना की समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। सॉफ्टवेयर में हुए बदलावों की जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों का तथ्यात्मक स्पष्टीकरण होना चाहिए। जहां मामला न्यायालय में है, वहां अंतिम निर्णय तक संस्थागत पारदर्शिता बनी रहनी चाहिए।

लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा आलोचना से नहीं, अविश्वास से होता है। आलोचना का उत्तर तर्क से दिया जा सकता है लेकिन अविश्वास को केवल पारदर्शिता ही दूर कर सकती है। जंतर-मंतर और मुम्बई से उठ रही आवाज का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं, चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कायम रहना भी उतना ही जरूरी है। यदि इस विश्वास में दरार पड़ रही है तो उसका इलाज प्रदर्शनकारियों को रोकना नहीं, उन सवालों का सार्वजनिक और संवैधानिक समाधान करना है, जिनके कारण वे सड़क पर उतरने को मजबूर हो रहे हैं। लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि सरकार कितनी बड़ी भीड़ को रोक सकती है बल्कि यह है कि वह कितने कठिन सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से बहाल नहीं होगी बल्कि ऐसी पारदर्शी व्यवस्था से सुनिश्चित होगी, जिस पर हारने वाला भी भरोसा कर सके और जीतने वाला भी।