बेहतर विकल्प एवं जरूरी मुद्दों का अभाव ही विपक्ष की अक्षमता

Lack of better options and important issues is the incompetence of the opposition.

ललित गर्ग

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि यहां कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती और कोई भी विपक्ष हमेशा के लिए विपक्ष नहीं रहता। सत्ता के लंबे कार्यकाल के बाद स्वाभाविक रूप से सरकार के प्रति उकताहट पैदा होती है। लेकिन उकताहट और सत्ता परिवर्तन के बीच एक बड़ा अंतर है। मतदाता किसी सरकार से नाराज हो सकता है, उसके कामकाज पर सवाल उठा सकता है, फिर भी केवल नाराजगी के आधार पर किसी ऐसे विकल्प को स्वीकार नहीं करता, जिसके पास देश के भविष्य की स्पष्ट रूपरेखा न हो, जो सत्ता का लालची एवं बेहतर विकल्प से वंचित हो। आज भारतीय राजनीति में विपक्ष के सामने मूल प्रश्न यही है-क्या वह केवल सरकार से असंतुष्ट है या जनता के सामने कोई विश्वसनीय विकल्प भी रख रहा है? राहुल गांधी लंबे समय से यह सवाल उठा रहे हैं कि मोदी सरकार के प्रति अपेक्षित एंटी-इंकंबेंसी दिखाई क्यों नहीं देती। उनका आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ के कारण जनता की वास्तविक इच्छा सामने नहीं आ पा रही। इन आरोपों के समर्थन में उनके द्वारा प्रस्तुत दावों को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है, उन्हें अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य मानना अभी उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की पारदर्शिता पर उठने वाले प्रत्येक प्रश्न का निष्पक्ष और तथ्यात्मक उत्तर मिलना लोकतंत्र के हित में है।

इसी संदर्भ में एसआईआर यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का विवाद महत्वपूर्ण हो गया है। निर्वाचन आयोग स्वयं एसआईआर-2026 से संबंधित मतदाता सेवाएं और मतदाता सूची उपलब्ध करा रहा है तथा वह अपने को स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण बताता है। दूसरी ओर विपक्ष ने इस प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस विवाद को अब सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती मिली है। इस पूरे मामले का अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक नारों से नहीं, संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया से निकलेगा। यहीं विपक्ष की राजनीति की असली परीक्षा शुरू होती है। चुनाव आयोग के विरुद्ध आंदोलन करना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। मतदाता सूची में यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत ढंग से हटाया गया है तो उसका विरोध होना चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने नियमों का उल्लंघन किया है तो उसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल आयोग के विरोध से नहीं होगी। लोकतंत्र की रक्षा तब होगी जब विपक्ष जनता को यह भी बताए कि सत्ता मिलने पर वह शिक्षा, रोजगार, कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, शहरी जीवन, कानून-व्यवस्था और प्रशासन में क्या बदलेगा।

यही वह बिंदु है जहां ‘वोट चोरी’ का राजनीतिक विमर्श जनता के रोजमर्रा के सवालों से टकराता है। एक सामान्य परिवार को बच्चों की महंगी शिक्षा की चिंता है। रोजगार की बदलती प्रकृति, एआई और नई तकनीक के कारण पारंपरिक कौशल तेजी से अप्रासंगिक हो रहे हैं। डिग्री लेने के बाद भी रोजगार की गारंटी नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल की घटनाएं युवाओं के विश्वास को चोट पहुंचाती हैं। ऐसे में युवा यह जानना चाहता है कि अगली सरकार परीक्षा व्यवस्था को कैसे विश्वसनीय बनाएगी, स्कूलों की गुणवत्ता कैसे सुधारेगी और बदलती तकनीकी अर्थव्यवस्था के लिए करोड़ों युवाओं को तैयार कैसे करेगी। किसान की समस्या भी केवल एमएसपी या आंदोलन तक सीमित नहीं है। फसल आने पर कीमत गिर जाती है और कुछ महीने बाद वही प्याज, टमाटर या दूसरी सब्जियां महंगी हो जाती हैं। इसका समाधान केवल विरोध में नहीं, बल्कि गांव-कस्बे तक भंडारण, कोल्ड-चेन, प्रसंस्करण, कृषि बाजार और मूल्यवर्धन की मजबूत व्यवस्था में है। विपक्ष यदि कृषि सुधारों का विरोध करता है तो उसे यह भी बताना होगा कि वह वैकल्पिक कृषि ढांचा किस तरह खड़ा करेगा।

रोजगार का प्रश्न इससे भी बड़ा है। भारत की युवा आबादी को उद्योग, विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, अनुसंधान और नई तकनीक से जोड़ना होगा। निवेश के लिए स्थिर कानून-व्यवस्था, पारदर्शी प्रशासन और भरोसेमंद कारोबारी वातावरण जरूरी है। केवल बड़े उद्योगपतियों पर राजनीतिक प्रहार या संपत्ति की गणना जैसे नारों से रोजगार पैदा नहीं होते। विपक्ष यदि संपत्ति के पुनर्वितरण या सामाजिक न्याय की बात करता है तो उसे साथ ही यह भी बताना होगा कि संपत्ति और अवसर कैसे पैदा किए जाएंगे। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसी राजनीति सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को सामने लाती है, लेकिन आज की चुनौती प्रतिनिधित्व के साथ-साथ क्षमता निर्माण की भी है। पिछड़े, दलित, आदिवासी और कमजोर वर्गों के बच्चों को अच्छी शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और अवसर मिलें-यह सामाजिक न्याय का अधिक स्थायी आधार है। केवल आंकड़े गिनना पर्याप्त नहीं, उन आंकड़ों के पीछे खड़े मनुष्य का जीवन बदलना जरूरी है। इस पूरे परिदृश्य में ममता बनर्जी की भूमिका विशेष चर्चा का विषय बनी है। राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में उनकी भूमिका को लेकर नया विमर्श अवश्य उभरा है। हाल की इंडिया गठबंधन की बैठक में उन्होंने विपक्ष का दायरा बढ़ाने और व्यापक एकता की आवश्यकता पर जोर दिया। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा संकट केवल भाजपा से मुकाबला नहीं, बल्कि उसके भीतर का परस्पर अविश्वास है। सीटों का बंटवारा, क्षेत्रीय वर्चस्व, नेतृत्व का प्रश्न और राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने वाली पार्टियों का राष्ट्रीय स्तर पर साथ आना आसान नहीं है। आज की स्थिति में आप का चुनाव आयोग तक प्रस्तावित मार्च से अलग रहकर अपना रास्ता अपनाना भी इस अंतर्विरोध को दिखाता है।

कांग्रेस, तृणमूल, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दल, राजद, आप और दूसरे क्षेत्रीय दल जब अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राजनीति करते हैं, तब राष्ट्रीय मंच पर उनका साझा न्यूनतम कार्यक्रम क्या है? जनता इसी का उत्तर चाहती है। चुनाव आयोग के मुद्दे पर भी यही कसौटी लागू होती है। इंडिया गठबंधन ने 6 अक्टूबर को निर्वाचन आयोग तक मार्च सहित विरोध कार्यक्रम घोषित किए हैं और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई है। यह आंदोलन संवैधानिक प्रश्नों को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला सकता है। लेकिन यदि विपक्ष का पूरा राजनीतिक अभियान केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे तक सीमित रह गया, तो इससे चुनावी संस्थाओं पर व्यापक विश्वास का प्रश्न हल नहीं होगा। उसे यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर निर्वाचन आयोग की नियुक्ति, मतदाता सूची, ईवीएम-वीवीपैट, चुनावी चंदे और चुनावी पारदर्शिता को लेकर वह कौन से संस्थागत सुधार करेगा।

बड़ा प्रश्न है कि सत्ता की पात्रता को विकसित करने के लिये विपक्ष क्यों नहीं जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर सकारात्मक राजनीति को बल देती। वास्तव में विपक्ष के सामने सबसे बड़ा संकट मुद्दों की कमी नहीं, मुद्दों को समाधान में बदलने की क्षमता का है। बेरोजगारी है, शिक्षा का संकट है, कृषि की समस्या है, स्वास्थ्य का खर्च है, महंगाई की चिंता है, शहरी प्रदूषण है, एआई से बदलती नौकरियां हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की प्रतिस्पर्धा का प्रश्न है। जनता इन सबको प्रतिदिन महसूस करती है। लेकिन राजनीतिक विमर्श बार-बार मोदी बनाम कौन, राहुल बनाम मोदी, ईवीएम बनाम बैलेट और आयोग बनाम विपक्ष की बहस में सिमट जाता है। भारतीय मतदाता सरकार से मोहभंग होने पर भी यह देखता है कि उसके सामने विकल्प क्या है। वह जमीन छोड़कर अंधे कुएं में छलांग नहीं लगाता। उसे ऐसा विपक्ष चाहिए जो सरकार की कमियां गिनाने के साथ अपनी क्षमताएं भी बताए, जो केवल सत्ता की आलोचना नहीं, शासन का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करे, जो चुनाव आयोग से सवाल पूछे तो अपनी चुनावी पारदर्शिता की कसौटी भी सामने रखे, जो सामाजिक न्याय की बात करे तो शिक्षा और अवसर का रास्ता भी बताए, जो उद्योगपतियों से सवाल करे तो निवेश और रोजगार की अपनी नीति भी स्पष्ट करे।

लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जितनी जरूरी है, विपक्ष की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। सत्ता से मोहभंग लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन उस मोहभंग को राजनीतिक परिवर्तन में बदलने के लिए विश्वसनीय विकल्प चाहिए। आज इंडिया गठबंधन के सामने चुनौती भाजपा और नरेंद्र मोदी से लड़ने से बड़ी है-उसे जनता के मन में यह विश्वास पैदा करना है कि उसके पास भारत के अगले दशक की कोई स्पष्ट, ठोस और क्रियान्वित करने योग्य कहानी भी है। विपक्ष यदि यह विश्वास पैदा कर पाया तो चुनाव आयोग का मुद्दा भी लोकतांत्रिक सुधार की सार्थक बहस बनेगा, ममता बनर्जी की भूमिका भी सार्थक होगी और राहुल गांधी के सवाल भी व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनेंगे।