सुनील कुमार महला
शारदीय नवरात्र 2026 इस वर्ष 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर 2026 तक मनाए जाएंगे। पाठकों को बताता चलूं कि प्रतिपदा यानी पहला नवरात्र 11 अक्टूबर, रविवार, अष्टमी 18 अक्टूबर, रविवार, महानवमी 19 अक्टूबर, सोमवार तथा विजयादशमी (दशहरा) 20 अक्टूबर, मंगलवार को होगी। शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व शक्ति, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रमुख पर्व माना जाता है।
साल में चार बार आते हैं नवरात्र:-
यहां यह भी बताता चलूं कि साल में चार बार नवरात्र आते हैं-दो मुख्य और दो गुप्त। सबसे पहले चैत्र नवरात्र आते हैं, जो मार्च या अप्रैल में पड़ते हैं। इसी समय हिंदू नववर्ष का भी शुभारंभ माना जाता है। इसके बाद शारदीय नवरात्र आते हैं, जो सितंबर या अक्टूबर में पड़ते हैं। इन्हें सबसे प्रमुख नवरात्र माना जाता है और इनके समापन के बाद दशहरा मनाया जाता है। इनके अलावा दो गुप्त नवरात्र होते हैं—एक माघ मास में जनवरी-फरवरी के आसपास और दूसरा आषाढ़ मास में जून-जुलाई के आसपास। गुप्त नवरात्र विशेष पूजा, मंत्र-जाप और साधना करने वालों के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
आत्मशुद्धि से सामाजिक बदलाव तक:-
शारदीय नवरात्र केवल देवी-पूजा और उपवास का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, नारी सम्मान, संयम और सामाजिक जागरण का अवसर भी है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, धैर्य और सदाचार भी है। नवरात्र मनुष्य को अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार जैसी आंतरिक बुराइयों पर विजय का संदेश देता है। नौ दिनों के व्रत, साधना और संयम से मानसिक शुद्धि तथा आत्म-नियंत्रण का विकास होता है और मानव चेतना आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ती है। सरल शब्दों में कहें तो नवरात्र अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। उपवास और साधना का उद्देश्य केवल खान-पान पर नियंत्रण रखना नहीं, बल्कि मन और विचारों पर नियंत्रण स्थापित करना भी है। क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष जैसी कमजोरियों को त्यागकर धैर्य, प्रेम और विवेक को विकसित करना ही नवरात्र की वास्तविक साधना है। देवी के नौ स्वरूप जीवन के अलग-अलग गुणों और शक्तियों के प्रतीक माने जाते हैं।
नारी सम्मान और सामाजिक समरसता का संदेश:-
सामाजिक स्तर पर नवरात्र नारी शक्ति, नारी सम्मान और महिला सशक्तीकरण का महत्वपूर्ण प्रतीक है। सामूहिक पूजा, गरबा और पंडालों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्ग बिना किसी भेदभाव के एक साथ आते हैं। इससे भाईचारे और सामाजिक समरसता को मजबूती मिलती है। कन्या पूजन और दान-पुण्य की परंपराएं समाज के कमजोर वर्गों के प्रति करुणा और सेवा भाव जगाती हैं। वहीं देवी के नौ स्वरूप हमें प्रकृति के संरक्षण का संदेश भी देते हैं। बहरहाल यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि नवरात्र का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश नारी सम्मान और नारी शक्ति से जुड़ा है। जिस समाज में स्त्री को शक्ति का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है, वहां उसके सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और समान अधिकार को भी व्यवहार में स्थान मिलना चाहिए। कन्या पूजन की सार्थकता तभी है, जब बेटियों को जन्म से लेकर शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने तक समान अवसर प्राप्त हों। देवी की पूजा के साथ बेटियों का सम्मान ही नवरात्र की सच्ची भावना है।पाठक जानते हैं कि आज हमारा समाज हिंसा, नशे, तनाव, भेदभाव, पर्यावरण संकट और सामाजिक असंवेदनशीलता जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में नवरात्र हमें केवल पूजा-पाठ तक सीमित रहने के बजाय अपने भीतर और अपने आसपास सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देता है। इस अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम किसी कमजोर का सहारा बनेंगे, महिलाओं और बच्चों का सम्मान करेंगे, प्रकृति की रक्षा करेंगे तथा समाज में प्रेम, भाईचारा और सद्भाव को बढ़ावा देंगे।
अंत में यही कहूंगा कि नवरात्र का संदेश केवल नौ दिनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। माँ दुर्गा की आराधना तभी सार्थक है, जब उनके साहस को अपने कर्मों में, करुणा को अपने व्यवहार में और शक्ति को समाज के कल्याण में उतारा जाए। यही नवरात्र की वास्तविक आध्यात्मिक साधना और सामाजिक सार्थकता है।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार।





