मतदाता सूची पुनरीक्षण पर दिल्ली में सियासी टकराव, लोकतांत्रिक पारदर्शिता की परीक्षा

Political conflict in Delhi over voter list revision, test of democratic transparency

एन जी भट्ट

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर शनिवार, 10 अक्टूबर को दिल्ली में राजनीतिक टकराव अपने चरम पर पहुँच गया। निर्वाचन आयोग के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सी जे पी), आम आदमी पार्टी (आप), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (ए आई एस ए) और इंडिया (इंडिया) गठबंधन के प्रमुख नेताओं द्वारा जंतर-मंतर पर बुलाए गए इस बड़े विरोध प्रदर्शन के कारण पूरी राजधानी पुलिस छावनी में तब्दील हो गई। प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था किए और हजारों प्रदर्शनकारियों को प्रमुख नेताओं को हिरासत में लिया। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारी मुख्य रूप से भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। इस घटनाक्रम ने एन डी ए और भाजपा नेतृत्व और विरोधी पक्ष के बीच जुबानी जंग को तेज कर दिया। साथ ही मतदाता सूची की शुद्धता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

सुरक्षा कारणों से दिल्ली पुलिस ने राजधानी नई दिल्ली में लगभग 30 प्रमुख स्थानों पर ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया। दिल्ली के 45 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वारों को रात 10 बजे तक के लिए बंद कर दिया गया। नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों से आने-जाने वाली 75 लंबी दूरी की एक्सप्रेस/मेल ट्रेनें और 179 लोकल ट्रेनें रद्द कर दी गईं, जिससे हजारों यात्री प्रभावित हुए हैं। कई इलाकों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं भी निलंबित कर दी गई। राजधानी नई दिल्ली की सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस के साथ केंद्रीय अर्धसैनिक बलों सहित उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के 30,000 से अधिक जवानों को तैनात किया गया तथा जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर सात लेयर की बैरिकेडिंग की गई।

विशेष गहन पुनरीक्षण का घोषित उद्देश्य मतदाता सूचियों को अद्यतन करना, दोहरी प्रविष्टियों और अपात्र मतदाताओं के नामों की पहचान करना तथा पात्र नागरिकों का नाम सूची में सुनिश्चित करना है। निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया को चुनावों की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक मानता है। हालांकि, विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने का खतरा है और दस्तावेज जुटाने की कठिनाइयां आम नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित कर सकती हैं।विपक्ष की प्रमुख आपत्ति यह है कि मतदाता सूची में त्रुटियों को सुधारने के नाम पर किसी पात्र नागरिक का नाम नहीं हटना चाहिए। दूसरी ओर, आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए विवाद का वास्तविक समाधान आरोप-प्रत्यारोप के बजाय पारदर्शी प्रक्रिया और प्रमाणिक आंकड़ों से ही संभव है।

शनिवार को प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी। पुलिस का तर्क था कि आवेदन निर्धारित दस दिन की पूर्व सूचना अवधि के अनुरूप नहीं था और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी थीं। इसके बाद प्रदर्शन स्थल की ओर बढ़ रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया। विभिन्न समाचार रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या तीन हजार से अधिक बताई गई है। इस कार्रवाई पर विपक्षी नेताओं ने विरोध जताया, जबकि भाजपा ने प्रदर्शन और विपक्ष के आरोपों की आलोचना की। निर्वाचन आयोग के अनुसार, पुनरीक्षण प्रक्रिया में घर-घर सत्यापन, प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन, दावे-आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर और निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपील जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन सुरक्षा उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है, ताकि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से नहीं कटे। नागरिकों को भी समय रहते अपना नाम जांचना और आवश्यक होने पर दावा या आपत्ति दर्ज करानी चाहिए।

लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता, विपक्ष की निगरानी की भूमिका, पुलिस की कानून-व्यवस्था संबंधी जिम्मेदारी और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध तथा मतदान के अधिकार—सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। आयोग को पुनरीक्षण के मानदंड, हटाए गए नामों और शिकायतों के निस्तारण से जुड़े आंकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक करने चाहिए, जबकि विपक्ष को भी अपने आरोप प्रमाणों के साथ उठाकर सुधार के व्यावहारिक सुझाव देने चाहिए। पुलिस को सुरक्षा संबंधी वास्तविक चिंताओं के अनुरूप, आवश्यक और अनुपातिक कदम उठाते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन की गुंजाइश बनाए रखनी चाहिए; हिरासत की स्थिति में कारण, अवधि और कानूनी प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार अंततः मतदाता सूची का पुनरीक्षण किसी राजनीतिक दल के लाभ या नुकसान का मामला नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद होना चाहिए। निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखते हुए स्वतंत्र निगरानी, पारदर्शी दावे-आपत्ति प्रक्रिया और समयबद्ध अपील की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि पात्र नागरिकों के नाम बिना पर्याप्त कारण न हटें और अपात्र प्रविष्टियां भी निष्पक्ष जांच के बाद सुधारी जाएं। विपक्ष, पुलिस और नागरिक समाज को भी संवैधानिक सीमाओं में रहकर अपनी भूमिकाएं निभानी होंगी तभी नागरिक अधिकारों की रक्षा, कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा एक साथ कायम रह सकेगा।