अशोक भाटिया
भारत में त्योहारी सीज़न हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उल्लास का प्रतीक है। शरद ऋतु की शुरुआत के साथ ही जब देश दुर्गा पूजा, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों की तैयारियों में जुट जाता है, तब बाज़ारों में रौनक और उपभोक्ता माँग चरम पर होती है। लेकिन इस वर्ष का त्योहारी सीज़न आम आदमी के लिए खुशियों के साथ-साथ गहरा आर्थिक तनाव लेकर आया है। मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों की थाली से राहत गायब हो चुकी है। खाद्य पदार्थों की आसमान छूती कीमतों ने रसोई का बजट इस कदर बिगाड़ दिया है कि पकवानों की मिठास फीकी पड़ने लगी है। सब्जियाँ, दालें और खाद्य तेल जैसी बुनियादी चीज़ों के दाम जिस गति से बढ़े हैं, उसने आम आदमी की क्रय शक्ति की कमर तोड़ दी है। इस संकट के बीच केंद्रीय बैंक की हालिया कार्रवाई ने साफ़ कर दिया है कि महंगाई का यह झटका कोई अस्थायी समस्या नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के भीतर गहरे संरचनात्मक असंतुलन का नतीजा है।
महंगाई की इसी मार और देश की आर्थिक स्थिति की समीक्षा करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने एक सख्त निर्णय लेते हुए रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया। फरवरी 2023 के बाद केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई यह पहली बढ़ोतरी है, जिसने बाज़ारों और उपभोक्ताओं दोनों को चौंका दिया है। रिज़र्व बैंक ने न केवल दरों में बढ़ोतरी की, बल्कि अपने नीतिगत रुख को भी ‘तटस्थ’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में किसी कटौती की संभावना खत्म हो गई है और आने वाले समय में केंद्रीय बैंक तरलता को और कड़ा कर सकता है। बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान को बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है। यद्यपि देश की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को 7.1 प्रतिशत तक संशोधित किया गया है, लेकिन विकास की यह चमक महंगाई के अंधेरे के सामने फीकी पड़ रही है।
आरबीआई की इस कार्रवाई ने आम उपभोक्ता पर दोहरी मार की स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ जनता पहले से ही बाज़ार में महँगी वस्तुओं से त्रस्त है, वहीं दूसरी तरफ रेपो रेट में वृद्धि के कारण होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें तत्काल बढ़ जाएंगी। त्योहारी सीज़न में ईएमआई के इस बढ़ते बोझ ने लोगों के उत्साह पर पानी फेर दिया है। उच्च ब्याज दरों और महँगी उपभोक्ता वस्तुओं के मेल से बाज़ार में कुल घरेलू खपत में भारी गिरावट आने की आशंका है। मध्यम वर्ग अपनी गैर-जरूरी खर्चों जैसे कि पर्यटन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रेस्तरां पर कटौती करने को मजबूर हो रहा है ताकि अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। केंद्रीय बैंक का मानना है कि ब्याज दरों को बढ़ाकर वह बाज़ार में मांग को नियंत्रित कर सकेगा, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह महंगाई केवल माँग जनित नहीं है, बल्कि आपूर्ति में व्यवधानों का नतीजा है, जिसे केवल मौद्रिक उपायों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
एक सामान्य भारतीय परिवार के मासिक बजट का सबसे बड़ा हिस्सा भोजन और घरेलू राशन पर खर्च होता है। पिछले कुछ महीनों में टमाटर, प्याज और आलू जैसी बुनियादी सब्जियों की कीमतें अनियंत्रित रूप से बढ़ी हैं। इसके साथ ही अरहर और उड़द जैसी दालों की कीमतें आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। प्रोटीन के सबसे सुलभ स्रोत का इस तरह महँगा होना पोषण सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगाता है। त्योहारी सीजन में तेल और घी की खपत बढ़ जाती है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन में उतार-चढ़ाव के कारण खाद्य तेलों की खुदरा कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। परिवहन ईंधन की उच्च लागत के कारण खेतों से मंडियों तक सब्जियों और अनाज को पहुँचाने का भाड़ा बढ़ गया है और इस लॉजिस्टिक्स लागत का अंतिम बोझ आम उपभोक्ता की जेब पर ही ट्रांसफर होता है। इस प्रकार, भोजन की थाली से दाल-रोटी की मात्रा कम होती जा रही है और त्योहारों का पारंपरिक उल्लास केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह गया है।
रिज़र्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और व्यापारिक मार्गों में गतिरोध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे ‘आयातित महंगाई’ बढ़ी है। इसके अलावा अनियमित मानसून, बेमौसम भारी बारिश और सूखे की स्थिति ने देश के कृषि चक्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। खरीफ फसलों के उत्पादन में आई कमी और रबी फसलों की बुवाई को लेकर अनिश्चितताओं ने खाद्य वस्तुओं की कीमतों को कम नहीं होने दिया है। साथ ही मंडियों में बिचौलियों की सक्रियता और त्योहारों के दौरान कृत्रिम कमी पैदा करके मुनाफाखोरी करने वाले तत्वों के कारण भी कीमतें आसमान छूती हैं। जब तक स्थानीय स्तर पर आपूर्ति नेटवर्क को पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक सरकारी प्रयासों का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुँच पाता।
इस पूरी नीति में सबसे बड़ा आर्थिक विरोधाभास देखने को मिलता है। एक तरफ बैंक गर्व से देश की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत करने की घोषणा कर रहा है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थापित करता है। लेकिन दूसरी तरफ इसी विकास के समांतर देश की बहुसंख्यक आबादी अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। यह स्थिति असमान विकास की ओर इशारा करती है, जहाँ कॉर्पोरेट जगत और उच्च आय वर्ग लगातार तरक्की कर रहे हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, छोटे व्यापारी, किसान और वेतनभोगी मध्यम वर्ग लगातार आर्थिक तंगहाली के गर्त में जा रहे हैं। जब आम आदमी की थाली खाली हो रही हो, तो 7 प्रतिशत से अधिक की जीडीपी वृद्धि दर उसके लिए केवल एक बेमानी संख्या बनकर रह जाती है। वास्तविक आर्थिक प्रगति वह है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार लाए।
केवल मौद्रिक नीति से आपूर्ति-पक्ष की महंगाई का स्थायी इलाज संभव नहीं है। सरकार और नीति निर्माताओं को तुरंत बहुआयामी कदम उठाने होंगे। त्योहारी सीज़न के दौरान दालों, तेलों और आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाज़ारी को रोकने के लिए राज्य सरकारों को मूल्य नियंत्रण प्रणालियों को सक्रिय करना चाहिए। इसके साथ ही भारतीय खाद्य निगम और अन्य सरकारी एजेंसियों के पास मौजूद अनाज और दालों के बफर स्टॉक को तुरंत खुले बाज़ार में सही कीमतों पर जारी किया जाना चाहिए। माल ढुलाई को सस्ता करने के लिए ईंधन पर करों की तार्किक समीक्षा की जानी चाहिए, जिससे आवश्यक वस्तुओं के परिवहन की लागत कम हो सके और अंततः खुदरा कीमतें नीचे आएं।
त्योहार केवल उपभोग और व्यापार के अवसर नहीं होते; वे राष्ट्र की सामूहिक चेतना, उमंग और मानसिक स्वास्थ्य का आधार होते हैं। यदि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग त्योहारों के दिनों में भी केवल अपनी थाली और राशन के बजट को लेकर चिंतित रहेगा, तो यह एक स्वस्थ समाज के लक्षण नहीं हैं। रिज़र्व बैंक की हालिया कार्रवाई ने यह स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियाँ गंभीर हैं और आने वाला समय और अधिक कठिन हो सकता है। ऐसे में सरकार को केवल समष्टिगत आर्थिक आंकड़ों और जीडीपी के जश्न से बाहर निकलकर आम आदमी की रसोई की वास्तविकताओं पर ध्यान देना होगा। जब तक सरकार राजकोषीय उपायों के माध्यम से आम आदमी को सीधे राहत नहीं देगी, तब तक त्योहारी सीज़न की यह कड़वाहट कम नहीं होगी। समय की मांग है कि हम विकास की ऐसी नीतियां अपनाएं जो कॉर्पोरेट विकास के साथ-साथ आम नागरिक की थाली में सम्मान, पोषण और राहत की वापसी सुनिश्चित कर सकें।




