देश खाद्यान्न उत्पादन में नए रिकॉर्ड बना रहा है इसके बावजूद दाल, दूध, फल और सब्जियां हर परिवार की पहुंच में नहीं हैं। चुनौती अब केवल पेट भरने की नहीं, बल्कि हर थाली को पौष्टिक बनाने की है।
राजेश जैन
किसी देश की खाद्य सुरक्षा का आकलन उसके खेतों में पैदा होने वाले अनाज और सरकारी गोदामों में जमा भंडार से किया जा सकता है, लेकिन उसकी असली सफलता वहां के लोगों की थाली में दिखाई देती है। यदि किसी परिवार को पेट भरने के लिए पर्याप्त भोजन मिल रहा है, लेकिन दाल, दूध, फल और सब्जियां उसकी पहुंच से बाहर हैं, तो खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य अधूरा है।
हमारा देश आज इसी चुनौती का सामना कर रहा है। हम खाद्यान्न उत्पादन में नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए करोड़ों लोगों तक अनाज पहुंचा रहे हैं, फिर भी भोजन की उपलब्धता और पोषण के बीच का अंतर बना हुआ है। यह अंतर केवल खेती या खाद्य आपूर्ति का सवाल नहीं, बल्कि आमदनी, महंगाई और सामाजिक असमानता से भी जुड़ा है। हर साल 16 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व खाद्य दिवस इस चुनौती पर विचार करने का अवसर देता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना की वर्षगांठ से जुड़े इस दिवस का संदेश स्पष्ट है-भूख मिटाने के लिए पर्याप्त भोजन पैदा करना जरूरी है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं। भोजन हर व्यक्ति की पहुंच में हो और शरीर की जरूरतों को पूरा करने वाला भी हो।
उत्पादन का रिकॉर्ड, पहुंच की चुनौती
भारत की खाद्य यात्रा उपलब्धियों से भरी है। हरित क्रांति, सिंचाई सुविधाओं, उन्नत बीजों, कृषि अनुसंधान और सरकारी खरीद व्यवस्था ने देश को खाद्यान्न की कमी से उबरने में मदद की। आज भारत बड़ी मात्रा में अनाज पैदा करने में सक्षम है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, कृषि वर्ष 2024-25 में देश का खाद्यान्न उत्पादन बढ़कर 35.773 करोड़ टन पहुंच गया। पिछले वर्ष के 33.23 करोड़ टन के मुकाबले यह लगभग 7.7 प्रतिशत अधिक था। यह किसानों की मेहनत और कृषि व्यवस्था की क्षमता का प्रमाण है।
लेकिन खेत में अनाज पैदा होना और हर परिवार का पौष्टिक भोजन हासिल कर पाना दो अलग-अलग बातें हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाला गेहूं और चावल गरीब परिवारों के भोजन का आधार मजबूत करते हैं, पर उनसे संतुलित आहार की पूरी जरूरत पूरी नहीं होती।
इसका बड़ा कारण परिवारों की सीमित आय है। किराया, बिजली, शिक्षा और इलाज जैसे खर्चों के बाद भोजन के लिए बची रकम अक्सर इतनी नहीं होती कि परिवार नियमित रूप से दाल, दूध, फल और दूसरी पौष्टिक चीजें खरीद सके। ऐसी स्थिति में सस्ता और पेट भरने वाला भोजन प्राथमिकता बन जाता है, जबकि पोषण पीछे छूट जाता है।
इसलिए खाद्य सुरक्षा की अगली कसौटी केवल उत्पादन की मात्रा नहीं, बल्कि यह होनी चाहिए कि आम परिवार पौष्टिक भोजन कितनी आसानी से खरीद सकता है।
पेट भरा, लेकिन शरीर को पोषण नहीं
कुपोषण का अर्थ हमेशा भूखे पेट रहना नहीं होता। कोई व्यक्ति नियमित भोजन करने के बावजूद जरूरी पोषक तत्वों की कमी का शिकार हो सकता है। अनाज शरीर को ऊर्जा देता है, लेकिन संतुलित आहार के लिए प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, विटामिन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व भी जरूरी हैं।
इनकी कमी का असर बच्चों के शारीरिक विकास, महिलाओं के स्वास्थ्य और वयस्कों की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। बच्चों में कम वजन और उम्र के अनुपात में कम लंबाई तथा महिलाओं में एनीमिया जैसे संकेतक बताते हैं कि भोजन की मात्रा बढ़ाने के साथ उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना भी जरूरी है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जैसे स्रोत इन चुनौतियों की स्थिति समझने में मदद करते हैं। इनके निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि पोषण संबंधी समस्याओं का समाधान केवल अधिक अनाज उपलब्ध कराने से नहीं होगा। परिवारों को विविध और संतुलित आहार मिलना भी जरूरी है। ऐसे में हमें खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा के बीच का अंतर समझना जरूरी है। खाद्य सुरक्षा भोजन की उपलब्धता और उस तक पहुंच सुनिश्चित करती है, जबकि पोषण सुरक्षा यह देखती है कि भोजन शरीर की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त और विविध है या नहीं।
कृषि नीति में किसान और उपभोक्ता हितों का संतुलन जरूरी
पोषण की चर्चा किसान की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज करके नहीं की जा सकती। बीज, खाद, सिंचाई, डीजल और मजदूरी की बढ़ती लागत खेती की लाभप्रदता पर दबाव डालती है। दूसरी ओर, उपभोक्ता चाहता है कि जरूरी खाद्य पदार्थ उचित कीमत पर उपलब्ध हों।
किसान को लाभकारी मूल्य और उपभोक्ता को किफायती भोजन उपलब्ध कराना कृषि नीति की महत्वपूर्ण चुनौती है। इसका समाधान केवल उत्पादन बढ़ाने या कीमतों को नियंत्रित करने में नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत बनाने में है।
बेहतर भंडारण, परिवहन, स्थानीय प्रसंस्करण और बाजार तक किसानों की पहुंच से फसल के बाद होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ाने और उपभोक्ताओं तक खाद्य पदार्थ उचित कीमत पर पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और गंभीर बना रहा है। अनियमित मानसून, अत्यधिक गर्मी, सूखा और बेमौसम बारिश कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में जल संरक्षण, मिट्टी की सेहत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल खेती विशेष महत्व रखती है। बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज पोषण की दृष्टि से उपयोगी हैं और कई क्षेत्रों में कम पानी के साथ खेती के विकल्प भी उपलब्ध कराते हैं।
इसलिए कृषि नीति का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जो पर्यावरण के अनुकूल हो, किसान को सम्मानजनक आय दे और उपभोक्ता के लिए पौष्टिक भोजन सुलभ बनाए।
योजनाओं की सफलता थाली में दिखे
सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनवाड़ी सेवाएं और स्कूलों में पीएम पोषण योजना भारत की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं। इन योजनाओं ने जरूरतमंद परिवारों, बच्चों और महिलाओं तक सहायता पहुंचाने में भूमिका निभाई है। अब जरूरत इनके प्रभाव का आकलन व्यापक बनाने की है।
योजनाओं की सफलता केवल वितरित अनाज या लाभार्थियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि राशन समय पर मिल रहा है या नहीं, स्कूलों में भोजन की गुणवत्ता कैसी है और बच्चों तथा महिलाओं की पोषण संबंधी जरूरतें कितनी पूरी हो रही हैं।
मौजूदा राशन व्यवस्था को कमजोर किए बिना उसे पोषण कार्यक्रमों से बेहतर ढंग से जोड़ा जा सकता है। स्थानीय जरूरतों और उपलब्धता के अनुसार दालों, मोटे अनाज और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करने के विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, नियमित निगरानी और शिकायतों के त्वरित समाधान की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
वैश्विक तस्वीर भी चिंता बढ़ाती है। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा एवं पोषण संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया के लगभग 64.5 करोड़ लोग भूख से प्रभावित थे, जबकि करीब 269 करोड़ लोग स्वस्थ आहार की न्यूनतम लागत वहन नहीं कर सकते थे। ये आंकड़े बताते हैं कि भूख का संकट केवल खाद्य उत्पादन की कमी से नहीं, बल्कि भोजन की कीमत और लोगों की आर्थिक क्षमता से भी जुड़ा है।
भरे गोदाम नहीं, स्वस्थ नागरिक हों लक्ष्य
भारत ने खाद्यान्न उत्पादन और जरूरतमंदों तक अनाज पहुंचाने में बड़ी प्रगति की है। अब चुनौती इस उपलब्धि को लोगों की सेहत में बदलने की है। इसके लिए कमजोर आय वाले परिवारों की क्रय शक्ति बढ़ाने, खाद्य महंगाई का असर कम करने, किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने और पोषण योजनाओं की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना होगा। साथ ही, खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोककर उनकी सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।
विश्व खाद्य दिवस पर सबसे अहम सवाल यही है कि क्या देश की कृषि उपलब्धियां हर परिवार की थाली तक पहुंच रही हैं? भूख मुक्त भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा, जब किसी परिवार को आर्थिक मजबूरी में पेट भरने और पौष्टिक भोजन पाने के बीच चुनाव न करना पड़े। भरे गोदाम खाद्य सुरक्षा की उपलब्धि हैं, लेकिन हर थाली में पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन तथा हर नागरिक का बेहतर स्वास्थ्य ही इसकी असली सफलता है।




