चरित्र हनन पर उतारू घिनौना गोदी मीडिया

Disgusting Godi media bent on character assassination

निर्मल रानी

भारतीय मीडिया की साख और स्वतंत्रता की स्थिति वैश्विक स्तर पर अत्यंत चिंताजनक है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ द्वारा जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स 2026’ में भारत 180 देशों की सूची में 157वें स्थान पर खिसक गया है, जो कि 2025 में 151वें स्थान पर था। प्रेस स्वतंत्रता के मामले में यह स्थिति “बेहद गंभीर” श्रेणी में आती है। पड़ोसी देशों नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश की रैंकिंग भी भारत से बेहतर है यहाँ तक कि पाकिस्तान भी 153वें पर रहकर भारत से बेहतर स्थिति में है। इसके कई मुख्य कारण हैं। एक तो यह कि मीडिया का मालिकाना हक़ अर्थात मीडिया घरानों का स्वामित्व कुछ गिने-चुने बड़े उद्योगपतियों के हाथों में केंद्रित है। इसके साथ ही कथित मुख्यधारा का यही मीडिया सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव के चलते पूरे विश्व में “गोदी मीडिया” के नाम से बदनाम हो चुका है। इतना ही नहीं बल्कि सरकार या सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले पत्रकारों को उत्पीड़न, धमकियों और शारीरिक हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। अनेक मामलों में आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को दबाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानूनों, मानहानि और देशद्रोह से जुड़े कड़े क़ानूनों का भी इस्तेमाल किया जा चुका है। वैश्विक विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय मुख्यधारा के न्यूज़ चैनलों पर ग़रीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे गंभीर और जनहित के मुद्दों के बजाय सनसनीख़ेज़ ख़बरों, मंदिर मस्जिद,हिन्दू मुस्लिम जैसे राजनीतिक ध्रुवीकरण और इनपर आधारित शोर-शराबे वाली बहसों को तरजीह दी जाती है। वैश्विक स्तर पर बीबीसी या न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे मीडिया संस्थान जहां अपनी खोजी और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं वहीँ इसके विपरीत, भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों और आर्थिक लाभ के दबाव में आकर केवल ‘प्रेस रिलीज़’ और सरकार के एजेंडे को ही आगे बढ़ाता हुआ दिखाई देता है। यही वजह है कि जहाँ एक ओर कथित मुख्यधारा के टीवी चैनल्स और अनेक बड़े अख़बारों की साख अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गिरी है वहीं आज के दौर में भारत के अनेक स्वतंत्र लेखकों व डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स और ईमानदार खोजी व सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखने वाले यूट्यूब पत्रकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए सराहा भी जा रहा है।

मुख्यधारा के इसी भारतीय मीडिया का हिस्सा कहे जाने वाले एबीपी नेटवर्क के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने पिछले दिनों एक ऐसा झूठा व घिनौना प्रसारण किया जिससे “गोदी मीडिया” का चरित्र एक बार फिर बेनक़ाब हो गया। सत्ता से सवाल पूछने वाली भारत की एक जानी मानी लोक गायिका नेहा सिंह राठौर से जुड़ी एक भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से ग़लत ख़बर ‘एबीपी न्यूज़’ पर प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट में नेहा का नाम एक हॉस्टल में चलने वाले कथित सेक्स रैकेट से जोड़ने जैसी बात सामने आई थी। इस ख़बर के प्रकाशित होते ही नेहा सिंह राठौर ने आरोप लगाया कि ‘एबीपी न्यूज़ चैनल उन्हें दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से ‘वैश्या’ और ‘कॉल गर्ल’ के रूप में चित्रित करना चाहता है। उन्होंने इसे सरकार से सवाल पूछने पर उनकी छवि धूमिल करने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की ‘सुपारी पत्रकारिता’ बताया। हालांकि विवाद बढ़ने और आलोचनाएं होने के बाद, एबीपी न्यूज़ ने अपनी ग़लती स्वीकार की। 17 अक्टूबर 2026 को चैनल ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के ज़रिए इस त्रुटिपूर्ण प्रसारण पर खेद व्यक्त किया और सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगी। चैनल ने स्पष्ट किया कि यह एक तथ्यात्मक भूल थी और उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। ख़बर है कि एबीपी नेटवर्क ने इस संपादकीय चूक को गंभीरता से लेते हुए अपने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के तीन प्रमुख कर्मचारियों को नौकरी से बर्ख़ास्त भी कर दिया है। एबीपी न्यूज़ डिजिटल से तीन लोगों को प्रबंधन द्वारा निष्कासित किया जा चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना से दूसरे गोदी मीडिया हाउस में कार्यरत लोग भी सबक़ लेते हुये झूठी,मनगढ़ंत व किसी बेगुनाह का चरित्र हनन करने वाली ख़बरों को क्रॉसचेक किये बिना प्रकाशित या प्रसारित करने से परहेज़ करेंगे। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुये सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर संबंधित नियामक और मीडिया स्व-नियामक संस्थाओं के माध्यम से 15 दिनों के भीतर समयबद्ध कार्रवाई और रिपोर्ट मांगी है।

परन्तु सवाल यह उठ रहा है कि यह कोई चूक या त्रुटि थी अथवा जानबूझकर किया गया आपराधिक कृत्य ? नेहा सिंह राठौर ने भी चैनल की माफ़ी को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया है कि वे इस मामले को लेकर अदालत जाएंगी और क़ानूनी लड़ाई लड़ेंगी। यहां यह सवाल पूछना लाज़िमी है कि आख़िर किसी भी ख़बर को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की जांच करना ज़रूरी है भी या नहीं ? अगर कोई ख़बर ग़लत साबित होती है, तो क्या केवल मुआफ़ी मांग लेना भर पर्याप्त है? निश्चित रूप से नेहा सिंह राठौड़ का चरित्र हनन करने के घिनौने प्रयास का यह मामला मीडिया की जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। बेशक यदि कोई न्यूज़ चैनल या डिजिटल प्लटफ़ॉर्म कोई मनगढ़ंत ख़बर चलाकर किसी महिला को अपमानित करता है तो उस न्यूज़ चैनल की विश्वसनीयता तो ख़त्म होती ही है साथ ही पीड़ित महिला की अनंत तकलीफ़ें भी उसी अफ़वाहों से शुरू होती हैं। यह संतोष की बात है कि राष्ट्रीय महिला आयोग ने नेहा का नाम जोड़कर चलाई गई एबीपी न्यूज़ की झूठी व घटिया ख़बर का स्वतः संज्ञान लिया है। उम्मीद की जानी चाहिये कि दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।

लेकिन यह पूरा मामला चूँकि सत्ता की मुखर आलोचक के रूप में अपनी पहचान रखने वाली लोक गायिका नेहा राठौर व सत्ता की चापलूसी में दंडवत करते रहने वाले शुद्ध व्यावसायिक मानसिकता वाले मीडिया घराने से जुड़ा है इसलिये यह संदेह होना भी जायज़ है कि यह वास्तव में भूलवश या ग़लती से किया गया प्रसारण था अथवा जानबूझकर किसी के इशारे पर या किसी को ख़ुश करने के लिये किया गया अपराध ? यह तो क़ानूनी कार्रवाई के द्वारा पता चल सकेगा या फिर इस मामले को लेकर संबंधित मीडिया हॉउस से निष्कासित किये गये कर्मचारियों की स्वीकारोक्ति इस मामले का पटाक्षेप कर सकती है। परन्तु फ़िलहाल इस घटना से देश और दुनिया में गिरती भारतीय मीडिया की साख के बीच में ही यह सन्देश फिर चला गया है कि घिनौना गोदी मीडिया चरित्र हनन पर उतारू हो चुका है।