अपराधी आकाओं का ढहता साम्राज्य: सात समंदर पार टूटता गैंगस्टरों का अभेद्य किला

Collapsing empire of criminal bosses: The impenetrable fort of gangsters breaking across the seven seas

रुम्मान उल्ला खान

वैश्विक पटल पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक धमक और देश की आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के अभूतपूर्व तालमेल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित अपराध के खिलाफ एक नए और निर्णायक युग की शुरुआत कर दी है। हाल ही में अमेरिका के लास वेगास में कुख्यात गैंगस्टर हिमांशु भाऊ और उसके मुख्य रणनीतिकार नीरज फरीदपुरिया की अमेरिकी आव्रजन एजेंसी द्वारा हुई गिरफ्तारी, और उससे पहले अनमोल बिश्नोई व वेंकटेश गर्ग जैसे वांछित अपराधियों का विदेशों से किया गया डिपोर्टेशन और प्रत्यर्पण, इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि भारतीय कानून के हाथ अब भौगोलिक सीमाओं के मोहताज नहीं रहे। यह बदलता परिदृश्य यह साबित करता है कि फर्जी पासपोर्ट के सहारे विदेशी धरती पर बैठकर भारत में दहशत का कारोबार करने वाले आकाओं के लिए अब दुनिया का कोई भी कोना सुरक्षित पनाहगाह नहीं रह गया है। हरियाणा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स, सीबीआई, एनआईए और इंटरपोल के साझा ऑपरेशन्स के कारण पिछले कुछ समय में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गठजोड़ को नेस्तनाबूद किया गया है, जिससे यह संदेश साफ गया है कि अपराधी चाहे सात समंदर पार ही क्यों न छिपा हो, भारत उसे कानून के कटघरे में लाकर रहेगा।

इस पूरे वैश्विक एक्शन में जिन चेहरों पर शिकंजा कसा है, उनकी क्राइम कुंडली देश की सुरक्षा के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई थी। रोहतक का मूल निवासी हिमांशु भाऊ महज़ 17 साल की उम्र से अपराध जगत में सक्रिय था और उस पर हत्या, रंगदारी और जानलेवा हमलों सहित 64 से अधिक गंभीर मामले दर्ज थे। यूट्यूबर एल्विश यादव के घर पर फायरिंग और रोहतक बाईपास पर दिनेश गोगा की सरेआम हत्या का मुख्य साजिशकर्ता रहा हिमांशु भाऊ लास वेगास में नेवादा के हेंडरसन डिटेंशन सेंटर में बंद है, जहाँ से उसे भारत लाने की प्रक्रिया जारी है। उसके साथ ही पकड़ा गया नीरज फरीदपुरिया भी दिल्ली-एनसीआर और पंजाब में मर्डर और एक्सटॉर्शन सिंडिकेट संचालित करने के 25 से ज्यादा मामलों में नामजद है। इनसे ठीक पहले, जेल में बंद कुख्यात लॉरेंस बिश्नोई के छोटे भाई और सिंडिकेट के मुख्य संचालक अनमोल बिश्नोई को भी अमेरिका से डिपोर्ट कर दिल्ली लाया जा चुका है। अनमोल बिश्नोई पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड, अभिनेता सलमान खान के घर के बाहर हुई फायरिंग और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की हत्या जैसी हाई-प्रोफाइल वारदातों का मुख्य आरोपी है, जिसे भारत पहुंचते ही एनआईए ने कस्टडी में ले लिया था। इसी कड़ी में अंबाला के मोस्ट-वांटेड शूटर वेंकटेश गर्ग को पूर्वी यूरोपीय देश जॉर्जिया से सफलतापूर्वक प्रत्यर्पित कर भारत लाया गया, जो दोनों देशों के बीच इस तरह का पहला ऐतिहासिक प्रत्यर्पण था। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात यानी दुबई से संचालित होने वाले रंगदारी रैकेटों पर भी प्रहार करते हुए वहाँ से भी सक्रिय भगोड़ों को डिपोर्ट कराकर भारत वापस लाया गया है।

विगत कुछ वर्षों में इन अपराधियों ने देश के भीतर वारदातों को अंजाम देने का एक बेहद खतरनाक कॉर्पोरेट और डिजिटल मॉडल विकसित कर लिया था। ये गैंगस्टर खुद फर्जी दस्तावेजों के सहारे नेपाल या दुबई के रास्ते अमेरिका, कनाडा या यूरोप भाग जाते हैं और वहाँ सुरक्षित बैठकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से देश के बेरोजगार और भटके हुए युवाओं को पैसे और हथियारों का लालच देकर अपने जाल में फंसाते हैं। भारत में किसी भी बड़ी हत्या या रंगदारी की वारदात को अंजाम इनके स्थानीय शूटर देते हैं, जबकि इसकी पूरी प्लानिंग एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के जरिए सात समंदर पार बैठे इन आकाओं द्वारा की जाती है। वारदात के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेकर खौफ का माहौल बनाना और फिरौती वसूलना इनका मुख्य जरिया बन चुका था। हिमांशु भाऊ और लॉरेंस बिश्नोई गैंग इसी डिजिटल सिंडिकेट के सबसे बड़े उदाहरण हैं, लेकिन लास वेगास से लेकर जॉर्जिया तक की हालिया गिरफ्तारियों ने इस वायरलेस और डिजिटल नेटवर्क के घमंड को नेस्तनाबूद कर दिया है।

अतीत में किसी भी भगोड़े अपराधी को भारत वापस लाना एक अंतहीन कानूनी और प्रशासनिक दुःस्वप्न जैसा होता था, जहाँ अपराधी विदेशी अदालतों में मानवाधिकारों और प्रत्यर्पण संधियों की तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर दशकों तक बचे रहते थे। परंतु आज का भारत एक अलग कूटनीतिक रणनीति के साथ काम कर रहा है, जिसके तहत गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने मित्र देशों के साथ न केवल खुफिया इनपुट्स को साझा करने के तंत्र को सुदृढ़ किया है, बल्कि तकनीकी निगरानी को भी वैश्विक स्तर पर फैलाया है। खासकर अमेरिका की एफबीआई और होमलैंड सिक्योरिटी जैसी शीर्ष एजेंसियों के साथ भारतीय खुफिया तंत्र का समन्वय अब तक के सबसे मजबूत दौर में है। हरियाणा एसटीएफ के आंकड़े बताते हैं कि वह अब तक कुल 27 बड़े गैंगस्टरों को विदेशों से डिपोर्ट या प्रत्यर्पित कराकर भारत वापस ला चुकी है, जिसमें से आधे से अधिक कार्रवाइयां इसी अकेले वर्ष में अंजाम दी गई हैं। यह आंकड़ा साबित करता है कि भारतीय सुरक्षा तंत्र की वैश्विक पहुंच अब अपराधियों को पकड़ने में पूरी तरह सक्षम हो चुकी है।

विदेशी धरती से इन चेहरों का एक-एक कर सलाखों के पीछे आना देश की कानून-व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक जीत है, जिसने जमीनी स्तर पर काम कर रहे छोटे अपराधियों और शूटरों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि उनके आका अब उन्हें बचाने की स्थिति में नहीं हैं। परंतु, सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह लड़ाई अभी सिर्फ आधी जीती गई है। इन गैंगस्टरों को शारीरिक रूप से भारत लाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती इनके वित्तीय स्रोतों को पूरी तरह से बंद करने की है। जब तक डार्क वेब, हवाला नेटवर्क और अवैध सट्टेबाजी के जरिए विदेशों में पहुंच रहे पैसों को पूरी तरह जब्त नहीं किया जाता, तब तक नए चेहरों का उभरना रोकना मुश्किल होगा। इन गिरफ्तारियों के बाद अब सुरक्षा एजेंसियों को देश के भीतर इनके मददगार सफेदपोशों, स्थानीय स्लीपर सेल्स और इनके बेनामी निवेशों पर कड़ा प्रहार करना होगा, तभी जाकर इस संगठित आपराधिक तंत्र को भारतीय समाज की जड़ों से सदा के लिए उखाड़ फेंका जा सकेगा।