चीन की शेयर बाज़ार सुनामी से वैश्विक अर्थव्यवस्था में भूचाल?

China's stock market tsunami causing earthquake in the global economy?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर दुनियाँ की अर्थव्यवस्था आज ऐसे दौर से गुजर रही है,जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी निवेशकों की उम्मीदें, चीन की आर्थिक सुस्ती, अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव,विदेशी पूंजी का प्रवाह, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और बदलती भू- राजनीतिक परिस्थितियां आर्थिक भविष्य की दिशा तय कर रहीहैं। भारत के सामने इस समय चुनौतियों के साथ- साथ वैश्विक विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, निवेश और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। चीन के शेयर बाजार में लगभग 20 प्रतिशत गिरावट के दावे, भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार में कमी,केंद्रीय बजट 2027-28 की तैयारियों और क्रिप्टो तथा एआई जैसे उभरते क्षेत्रों की संसदीय समीक्षा को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि आने वाला समय भारतीय आर्थिक नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहने वाला है। हालांकि किसी भी बाजार संबंधी आंकड़े या गिरावट के कारण को अंतिम तथ्य मानने से पहले सटीकता से उसके आधिकारिक स्रोत की पुष्टि आवश्यक है।

साथियों बात अगर हम चीन के शेयर बाजार में गिरावट: वैश्विक निवेशकों के लिए खतरे की घंटी? को समझने की करें तो, चीन के प्रमुख सीएसआई 300 सूचकांक के जून के उच्चतम स्तर से लगभग 20 प्रतिशत नीचे आने के दावे ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में चिंता बढ़ाई है। यदि किसी सूचकांक में अपने हालिया उच्च स्तर से 20 प्रतिशत या उससे अधिक की गिरावट आती है, तो सामान्य बाजार परिभाषा के अनुसार उसे बेयर मार्केट कहा जाता है।प्रस्तुत जानकारी के अनुसार चीन में 22 और 23 अक्टूबर को तेज बिकवाली हुई तथा हांगकांग में सूचीबद्ध चीनी कंपनियों के शेयरों पर भी दबाव देखा गया। 24 अक्टूबर 2026 को शनिवार होने के कारण चीन के मुख्य शेयर बाजार में नियमित कारोबार बंद था। इसलिए उस दिन की स्थिति का आकलन पिछले कारोबारी सत्रों और उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।
साथियों,इस गिरावट के पीछे तीन संभावित प्रमुख कारण हैं,पहला,एआई और टेक्नोलॉजी कंपनियों के ऊंचे मूल्यांकन को लेकर चिंता; दूसरा,चीन के रियल एस्टेट क्षेत्र की परेशानियों और घरेलू उपभोग में कमजोरी के कारण कंपनियों के मुनाफे पर दबाव; और तीसरा, निवेशकों की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यापक सरकारी प्रोत्साहन पैकेज नहीं मिलने की आशंका। एआई क्षेत्र में भारी निवेश के बावजूद यदि कंपनियां अपेक्षित राजस्व और मुनाफा उत्पन्न नहीं करतीं, तो निवेशक अपने मूल्यांकन पर पुनर्विचार करते हैं। यही स्थिति किसी तेजी से बढ़े बाजार में मुनाफावसूली को व्यापक बिकवाली में बदल सकती है।हालांकि,चीन की अर्थव्यवस्था और वहां के शेयर बाजार को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए।उपलब्ध कराई गई जानकारी में सितंबर तिमाही की जीडीपी वृद्धि 4.5 प्रतिशत बताई गई है,लेकिन इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही हो, तब भी उसके शेयर बाजार में गिरावट आ सकती है, क्योंकि शेयरों की कीमतें भविष्य की कमाई, ब्याज दरों, जोखिम और निवेशकों की उम्मीदों पर निर्भर करती हैं। इसी तरह, लगभग 2.4 ट्रिलियन डॉलर की बाजार पूंजी नष्ट होने के दावे को भी संबंधित सूचकांकों और अवधि के आधार पर सत्यापित करना जरूरी है।

साथियों बात अगर हम भारतीय शेयर बाजार पर चीन की मंदी का कितना असर पड़ेगा? इसको समझने की करें तो,चीन की शेयर बाजार संबंधी उथल-पुथल का भारत पर प्रभाव कई रास्तों से पहुंच सकता है। पहला रास्ता विदेशी संस्थागत निवेशकों का है। यदि वैश्विक निवेशक जोखिम कम करने के लिए उभरते बाजारों से पूंजी निकालते हैं, तो भारतीय शेयर बाजार पर भी बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है। लेकिन इसका उलटा भी संभव है यदि निवेशक चीन से पूंजी हटाकर भारत जैसे बाजारों में निवेश बढ़ाते हैं, तो भारतीय शेयरों को लाभ मिल सकता है। इसलिए चीन में गिरावट का अर्थ यह नहीं कि भारतीय बाजार अनिवार्य रूप से गिरेंगे। दूसरा प्रभाव धातु क्षेत्र पर पड़ सकता है।चीन दुनिया के प्रमुख औद्योगिक उपभोक्ताओं में शामिल है।वहां निर्माण रियल एस्टेट और औद्योगिक गतिविधियां कमजोर होने पर स्टील,लौह अयस्क, तांबा तथा अन्य धातुओं की मांग प्रभावित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय धातु कीमतों और भारतीय धातु कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी ओर,सस्ते कच्चे माल से कुछ भारतीय उद्योगों को लाभ मिल सकता है।हालांकि, चीन से अत्यधिक सस्ते उत्पादों का आयात भारतीय निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा की चुनौती भी बन सकता है।

साथियों तीसरा प्रभाव टेक्नोलॉजी और एआई कंपनियों पर पड़ेगा। यदि निवेशकों का विश्वास एआई कंपनियों की कमाई और भविष्य के मूल्यांकन को लेकर कमजोर होता है,तो इसका असर दुनिया भर की टेक कंपनियों के शेयरों पर पड़ सकता है।भारतीय आईटी कंपनियों के लिए इसका परिणाम मिला-जुला रहेगा।एक तरफवैश्विक कंपनियां लागत घटाने के लिएतकनीकी सेवाओं पर खर्च कम कर सकती हैं,दूसरी तरफ एआई अपनाने, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटलपरिवर्तन की जरूरतें नए व्यावसायिक अवसर पैदा कर सकती हैं।भारतीय निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि केवल किसी देश के बाजार में आई गिरावट देखकर निवेश का निर्णय नहीं लेना चाहिए।कंपनियों की वास्तविक कमाई, कर्ज मूल्यांक़न वैश्विक मांग और निवेश जोखिम का आकलन जरूरी है। चीन के बाजार में गिरावट के बाद आकर्षक मूल्यांकन वाले अवसर पैदा हो सकते हैं, लेकिन गिरावट अपने आप में सस्ते और सुरक्षित निवेश की गारंटी नहीं है।

साथियों बात अगर हम विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट:क्या रुपये पर बढ़ेगा दबाव? इसको समझने की करें तो,भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण खबर विदेशी मुद्रा भंडार की है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 16 अक्टूबर 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5.011 अरब डॉलर घटकर 721.016 अरब डॉलर रह गया। इससे पहले 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भी इसमें 8.578 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी। इस प्रकार दो सप्ताह में कुल गिरावट लगभग 13.589 अरब डॉलर रही। विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश की आर्थिक सुरक्षा के महत्वपूर्ण आधारों में से एक है। इसका उपयोग विदेशी भुगतान संबंधी जरूरतों को पूरा करने, आयात के लिए डॉलर की उपलब्धता बनाए रखने और रुपये मेंअत्यधिक उतार-चढ़ाव की स्थिति में बाजार को स्थिर करने के लिए किया जा सकता है। भारत जैसे देश के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और अनेक औद्योगिक वस्तुओं के आयात के लिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की जरूरत होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 16 अक्टूबर वाले सप्ताह में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 5.758 अरब डॉलर घटकर 591.847 अरब डॉलर रह गईं, जबकि स्वर्ण भंडार में 706 मिलियन डॉलर की वृद्धि हुई।एसडीआर और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की आरक्षित स्थिति में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। विशेषज्ञों ने विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के संभावित कारणों में रुपये को अत्यधिक अस्थिर होने से बचाने के लिए आरबीआई की डॉलर बिक्री और एफ़सीएनंआर(बी) संसाधनों के उपयोग का उल्लेख किया है।

साथियों बात अगर हम बर्लिन से भारत की आर्थिक कूटनीति को नई गति: मुक्त व्यापार समझौतों से खुलेगा वैश्विक बाजार? इसको समझने की करें तो,भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति भी इस समय विशेष महत्व रखती है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 22 से 24 अक्टूबर तक जर्मनी की यात्रा के दौरान बर्लिन में भारत-जर्मनी व्यापार, निवेश, औद्योगिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया।भारत सरकार की 23 अक्टूबर की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार,उन्होंने जर्मनी की आर्थिक मामलों की मंत्री कैथरीना राइखे के साथ बातचीत की और भारत- यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से व्यापार तथा निवेश के अवसर बढ़ाने पर चर्चा की। इस यात्रा का उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका को मजबूत करना भी है। पीयूष गोयल ने भारत को वैश्विक व्यापार से जुड़ी एक खुली और उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करते हुए उद्योग विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बीच सहयोग की आवश्यकता बताई। जर्मनी की विशेषता प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक को औद्योगिक उत्पादन तक पहुंचाना है, जबकि भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, कुशल मानव संसाधन और विनिर्माण विस्तार की संभावनाएं हैं।दोनों देशों के बीच प्रभावी साझेदारी से मशीनरी, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्वच्छ ऊर्जा, औद्योगिक सॉफ्टवेयर और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में सटीकता से नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

साथियों,भारत की मुक्त व्यापार समझौता नीति का महत्व केवल आयात-निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इन समझौतों के जरिए भारतीय उत्पादों को दूसरे देशों में कम शुल्क पर प्रवेश मिल सकता है, सेवाओं के निर्यात के अवसर बढ़ सकते हैं और विदेशी कंपनियां भारत में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित हो सकती हैं। सितंबर में वाणिज्य मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार,भारत के नौ एफ़टीए ऐसे अर्थतंत्रों से जुड़े हैं जिनकी संयुक्तजीडीपी लगभग 60 ट्रिलियन डॉलर बताई गई है। सरकार का लक्ष्य नए समझौतों और बाजार पहुंच के विस्तार के माध्यम से वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना है। लेकिन इन समझौतों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब भारतीय एमएसएमईं किसान निर्यातक और स्टार्टअप उनका उपयोग कर सकें। इसके लिए उत्पादों की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन,सस्ती लॉजिस्टिक्स समय पर भुगतान, व्यापार वित्त और निर्यात संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाना आवश्यक है। यदि भारतीय उद्योग प्रतिस्पर्धी कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बना सके,तो एफ़टीए रोजगार, उत्पादन तकनीकी हस्तांतरण और विदेशी मुद्रा आय को बढ़ावा दे सकते हैं। दूसरी ओर, घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में संतुलित नीति भी सटीकता से जरूरी होगी।
साथियों बात अगर हम बजट 2027-28:क्या एलटीसीज़ी टैक्स में बदलाव से विदेशी निवेश लौटेगा? इसको समझने की करें तो,वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय बजट 2027-28 की तैयारियां शुरू कर दी हैं। मंत्रालय के बजट विभाग के कार्यक्रम के अनुसार, बजट-पूर्व बैठकें 12 अक्टूबर से 13 नवंबर 2026 तक आयोजित की जा रही हैं। इन बैठकों में विभिन्न मंत्रालयों के संशोधित अनुमान 2026- 27 और बजट अनुमान 2027 -28 पर विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सरकारी खर्च, योजनाओं की जरूरतों और अगले वित्त वर्ष की प्राथमिकताओं का आकलन करना है।निवेशकों के लिए एक प्रमुख मुद्दा दीर्घकालीन पूंजीगत लाभ कर यानी एलटीसीज़ी टैक्स है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 13 अक्टूबर को निवेशकों के विचार सुनने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने एलटीसीज़ी, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स और विभिन्न परिसंपत्ति वर्गों के कर- व्यवहार पर चल रही चर्चा को स्वीकार किया, लेकिन टैक्स समाप्त करने की कोई निश्चित घोषणा नहीं की।

साथियों बात अगर हम क्रिप्टो,एआई और 46 आर्थिक मुद्दे: संसद की निगरानी से बदल सकती है वित्तीय व्यवस्था को समझने की करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति द्वारा सामने आया है। 24 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने वित्त वर्ष 2026-27 में विस्तृत अध्ययन और रिपोर्ट तैयार करने के लिए 46 विषयों का चयन किया है। इनमें वित्तीय क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता,आभासी डिजिटल परिसंपत्तियां यानी क्रिप्टो,मुद्रा प्रबंधन, मूल्य स्थिरता, वित्तीय नियमन, सार्वजनिक क्षेत्र की परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण, बैंकिंग,पेंशन,स्वास्थ्य बीमा और असंगठित क्षेत्र की सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।

साथियों बात अगर हम भारतीय अर्थव्यवस्था की आगे की दिशा: संकट में अवसर तलाशने की जरूरत को समझने की करें तो,24 अक्टूबर 2026 की आर्थिक परिस्थितियां भारत को एक स्पष्ट संदेश देती हैं, वैश्विक अनिश्चितता के बीच केवल तेज जीडीपी वृद्धि पर्याप्त नहीं है; अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम बनाना भी जरूरी है। चीन के शेयर बाजार में गिरावट वैश्विक निवेशकों के जोखिम संबंधी नजरिए को प्रभावित कर सकती है। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी रुपये की स्थिरता पर ध्यान देने की जरूरत बताती है।वहीं, जर्मनी और अन्य व्यापारिक साझेदारों के साथ सहयोग, मुक्त व्यापार समझौतों का प्रभावी उपयोग और आगामी बजट की तैयारी भारत के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बजट 2027-28 भारत की आर्थिक प्राथमिकताओं को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर है।यदि सरकार विकास खर्च, रोजगार, राजकोषीय अनुशासन निवेश-अनुकूल कर व्यवस्था, विदेशी व्यापार और वित्तीय नियमन के बीच सहीसंतुलन स्थापित करती है, तो वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बावजूद भारत अपनी आर्थिक क्षमता को मजबूत कर सकता है। चीन की बाजार संबंधी परेशानियां हों या अंतरराष्ट्रीय पूंजी का बदलता रुख,भारत की दीर्घकालीन सफलता का आधार घरेलू उत्पादकता, मजबूत संस्थाएं, प्रतिस्पर्धी उद्योग और भरोसेमंद आर्थिक नीतियां ही होंगी। सवाल केवल यह नहीं कि वैश्विक बाजारों में आगे क्या होगा, बल्कि यह है कि भारत इन बदलती परिस्थितियों को अपने लिए टिकाऊ विकास के अवसर में कितनी कुशलता से बदल पाता है।