टीएमयू में भारतीय शिक्षा परंपरा, गुरु-शिष्य संस्कृति, अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली के ऐतिहासिक प्रभावों पर मंथन

Brainstorming on Indian educational tradition, Guru-disciple culture, historical effects of English education system in TMU

रविवार दिल्ली नेटवर्क

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम-सीआईकेएस के तत्वावधान में औपनिवेशिक संपर्क से मैकॉले के मिनट और अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली का विकास पर 18वीं राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम-सीआईकेएस के तत्वावधान में औपनिवेशिक संपर्क से मैकॉले के मिनट और अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली का विकास पर हुई 18वीं राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव में भारतीय पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था, औपनिवेशिक शिक्षा नीतियों के प्रभाव और समकालीन शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा हुई। एक्सपर्ट्स वक्ताओं ने शिक्षा के उद्देश्य को केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित न रखते हुए ज्ञान, विवेक, नैतिक मूल्यों, स्वतंत्र चिंतन और सामाजिक उत्तरदायित्व के विकास से जोड़ने पर जोर दिया। कॉन्क्लेव में वर्धमान कॉलेज, बिजनौर में प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो. यशवेंद्र धाका बतौर एक्सपर्ट वक्ता और ध्यानशाला के संस्थापक एवम् भारतीय ज्ञान परंपरा के शिक्षाविद् श्री शुभम सिंह ने विभिन्न ऐतिहासिक और शैक्षणिक पहलुओं पर विचार रखे। वक्ताओं ने भारतीय शिक्षा की ऐतिहासिक यात्रा, गुरु-शिष्य परंपरा, प्राचीन ज्ञान केंद्रों और शिक्षा के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, औपनिवेशिक काल में हुए नीतिगत बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। इससे पूर्व मां सरस्वती की वंदना के संग कॉन्क्लेव का शुभारम्भ हुआ।

वक्ताओं ने मातृभाषा और भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर देते हुए कहा, पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करके शिक्षा को अधिक समावेशी, उपयोगी और प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके लिए शोध, अनुवाद, परियोजना-आधारित अध्ययन और जीवनोपयोगी ज्ञान को प्रोत्साहित करना जरूरी है। साथ ही भारतीय ज्ञान प्रणालियों का अध्ययन ऐतिहासिक स्रोतों, प्रमाणों और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलित शैक्षणिक संवाद विकसित हो सके। श्री शुभम सिंह ने भारत की शिक्षाः एक सभ्यता का संघर्ष के जरिए शिक्षा के व्यापक उद्देश्य पर पुनर्विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, शिक्षा को केवल प्रमाणपत्र हासिल करने या रोजगार प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके जरिए स्टुडेंट्स में तार्किक क्षमता, नैतिकता, रचनात्मकता, स्वतंत्र चिंतन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होनी चाहिए। उन्होंने तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन ज्ञान केंद्रों की विरासत का उल्लेख करते हुए भारतीय शिक्षा की बौद्धिक एवम् सांस्कृतिक परंपराओं को समझने पर बल दिया।

व्याख्यानों में वर्ष 1835 के मैकॉले मिनट, अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली के विकास, अधोमुखी निस्पंदन सिद्धांत, वर्ष 1854 के वुड्स डिस्पैच जैसे ऐतिहासिक प्रसंगों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आए परिवर्तनों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने बताया, इस दौर में शिक्षा की भाषा, पाठ्यक्रम, शिक्षण-पद्धति और संस्थागत संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। इन ऐतिहासिक नीतियों का अध्ययन भारतीय शिक्षा के विकासक्रम और वर्तमान व्यवस्था को समझने के लिए आवश्यक है। भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा से जोड़ने के लिए केवल अतीत की उपलब्धियों का उल्लेख पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके ऐतिहासिक संदर्भों, बौद्धिक योगदान और वर्तमान उपयोगिता का गंभीर अध्ययन भी आवश्यक है। कॉन्क्लेव में टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन, डीन-अकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन के संग-संग कॉलेज ऑफ एजुकेशन, के प्राचार्य एवम् कन्वीनर डॉ. विनोद कुमार जैन, सीआईकेएस की कोर्डिनेटर डॉ. अलका अग्रवाल आदि मौजूद रहे। संचालन फैकल्टी डॉ. माधव शर्मा ने किया।