करवा चौथ: दांपत्य जीवन की मधुर परंपरा

Karva Chauth: Sweet tradition of married life

महेन्द्र तिवारी

भारतीय संस्कृति में त्योहारों और व्रतों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह केवल कर्मकांड नहीं हैं बल्कि मानवीय भावनाओं, रिश्तों और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव के प्रतीक हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व करवा चौथ है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ता है। दांपत्य जीवन में प्रेम, त्याग, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। यह व्रत सूर्योदय से पूर्व प्रारंभ होता है और रात्रि में चंद्रमा के दर्शन के पश्चात ही पूर्ण माना जाता है। इस पूरे दिन महिलाएं अन्न और जल का एक कण भी ग्रहण नहीं करती हैं। यह कठोर निर्जला व्रत स्त्री की मानसिक और शारीरिक दृढ़ता के साथ ही उसके असीम प्रेम को भी दर्शाता है।

इस पावन पर्व की उत्पत्ति और महत्व को लेकर अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा वीरावती की है जो सात भाइयों की इकलौती और लाडली बहन थी। विवाह के पश्चात जब उसने अपना पहला करवा चौथ का व्रत रखा तो भूख और प्यास से उसकी हालत बिगड़ने लगी। उसके भाइयों से अपनी बहन की यह पीड़ा नहीं देखी गई। उन्होंने छल से एक पेड़ के पीछे आग जलाकर अपनी बहन को कृत्रिम चंद्रमा दिखा दिया। वीरावती ने उसे ही वास्तविक चंद्रमा मानकर अपना व्रत खोल लिया। इस भूल के कारण उसके पति की मृत्यु हो गई। जब उसे अपनी गलती और भाइयों के छल का भान हुआ तो उसने अन्न और जल त्याग दिया। वह पूरे एक वर्ष तक अपने पति के मृत शरीर के पास बैठकर विलाप करती रही और कठोर तपस्या की। अगले वर्ष जब पुनः करवा चौथ का दिन आया तो उसने पूर्ण विधि विधान से व्रत रखा। उसकी असीम भक्ति और निष्ठा को देखकर देव प्रसन्न हुए और उन्होंने उसके पति को पुनः जीवित कर दिया। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची निष्ठा और अटूट संकल्प से कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी बदला जा सकता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार इस पर्व का नाम करवा नामक एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री के नाम पर पड़ा है। करवा अपने पति के साथ नदी के किनारे रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया जहां एक विशाल मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। पति के पुकारने पर करवा वहां पहुंची और उसने अपने तपोबल और सूत के कच्चे धागे से उस मगरमच्छ को बांध दिया। उसने मृत्यु के देवता यमराज का आह्वान किया और अपने पति के प्राणों की रक्षा की मांग की। यमराज को उस पतिव्रता स्त्री के सतीत्व और दृढ़ संकल्प के आगे झुकना पड़ा। उन्होंने मगरमच्छ को मृत्युदंड दिया और करवा के पति को जीवनदान दिया। इसी मान्यता के आधार पर इस व्रत में मिट्टी के करवे का विशेष महत्व होता है जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है।

इस व्रत की शुरुआत अत्यंत पवित्रता के साथ भोर के समय होती है। सूर्योदय से पूर्व तारे निकलते समय महिलाएं उठकर स्नान आदि से निवृत्त होती हैं। इस समय सास अपनी बहू को सरगी देती है। सरगी एक प्रकार का आशीर्वाद और प्रेम का प्रतीक है जिसमें फल, मिठाइयां, सूखे मेवे और सुहाग की सामग्री शामिल होती है। सरगी ग्रहण करने के पश्चात निर्जला व्रत आरंभ हो जाता है। दिनभर महिलाएं घर के कार्यों में व्यस्त रहती हैं लेकिन उनके मन में निरंतर अपने पति के कल्याण और ईश्वर की भक्ति का भाव रहता है। यह समय आत्म संयम का होता है। शारीरिक भूख और प्यास पर विजय प्राप्त कर मन को एकाग्र करना इस व्रत का मुख्य उद्देश्य है। यह केवल एक शारीरिक तप नहीं है बल्कि मानसिक शुद्धता का भी एक बहुत बड़ा माध्यम है।

भारत की विविधता इसके त्योहारों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यद्यपि करवा चौथ मुख्य रूप से उत्तर भारतीय राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश का पर्व है परंतु अब इसका विस्तार संपूर्ण भारत में हो चुका है। प्रत्येक क्षेत्र में इस व्रत को मनाने के कुछ अपने स्थानीय रीति रिवाज हैं। पंजाब में भोर के समय सरगी का अत्यधिक महत्व है और वहां की महिलाएं पूरे दिन लोकगीतों के माध्यम से इस उत्सव को मनाती हैं। राजस्थान में सुहागिनें अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर मिट्टी के करवे को सजाती हैं और समूह में बैठकर कथा वाचन करती हैं। स्थानों और परंपराओं की इस भिन्नता के बीच जो एक बात समान रहती है वह है पति पत्नी के बीच का निस्वार्थ प्रेम और पारिवारिक कल्याण की असीम कामना। यह क्षेत्रीय विविधता इस पर्व की सुंदरता को और भी अधिक बढ़ा देती है जिससे यह संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक सांस्कृतिक सूत्र बन जाता है।

संध्या का समय इस पर्व में एक नया उल्लास लेकर आता है। महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। लाल रंग को सुहाग, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है इसलिए इस दिन लाल रंग के वस्त्र, चूड़ियां, सिंदूर और मेहंदी का विशेष महत्व होता है। हाथों में रची मेहंदी केवल सौंदर्य का साधन नहीं है बल्कि इसे पति के प्रेम की गहराई का भी सूचक माना जाता है। सज धज कर महिलाएं एक स्थान पर एकत्रित होती हैं। एक घेरे में बैठकर सभी माता पार्वती, भगवान शिव, श्री गणेश और कार्तिकेय जी की पूजा करती हैं। बीच में मिट्टी का करवा रखा जाता है जिसमें जल और गेहूं के दाने भरे होते हैं। सभी महिलाएं एक दूसरे के साथ अपनी पूजा की थाली बदलती हैं। इस दौरान पारंपरिक लोक गीत गाए जाते हैं और वयोवृद्ध महिलाएं करवा चौथ की पौराणिक कथा सुनाती हैं। यह सामूहिक आयोजन सामाजिक समरसता और पारस्परिकता का एक अत्यंत सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है।

जैसे जैसे रात्रि होती है चंद्रमा की प्रतीक्षा बढ़ने लगती है। हर किसी की दृष्टि आकाश की ओर टिकी होती है। चंद्रमा के उदय होने का क्षण इस व्रत का सबसे भावुक और अलौकिक पल होता है। चंद्रमा को शीतलता, शांति और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। चांद के निकलने पर महिलाएं अपने हाथों में छलनी लेकर छत या आंगन में जाती हैं। इस पर्व में छलनी से चंद्रमा को देखने के पीछे भी एक अत्यंत गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि छलनी के माध्यम से चंद्रमा की किरणें छनकर आती हैं जिससे उनकी शीतलता और पवित्रता और अधिक बढ़ जाती है। स्त्री जब उस छलनी से अपने पति को देखती है तो वह यह प्रार्थना करती है कि उसके पति के जीवन में भी चंद्रमा के समान शीतलता, शांति और तेज बना रहे। छलनी का उपयोग इस बात का भी प्रतीक है कि दांपत्य जीवन में जो भी दोष या बुराइयां हों वे सब छनकर बाहर निकल जाएं और केवल प्रेम, विश्वास और शुद्धता ही शेष रहे। सबसे पहले वे छलनी से चंद्रमा के दर्शन करती हैं और उसकी पूजा कर अर्घ्य अर्पित करती हैं। चंद्रमा से अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करने के बाद वे उसी छलनी से अपने पति का मुख देखती हैं। इसके पश्चात पति अपनी पत्नी को अपने हाथों से जल पिलाकर और कोई मिठाई खिलाकर उसका व्रत पूर्ण करवाते हैं।

यह पर्व कृषि और प्रकृति से भी बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। कार्तिक मास में गेहूं की बुवाई का समय होता है। पूजा में उपयोग होने वाले मिट्टी के करवे में गेहूं के दाने रखे जाते हैं जो अच्छी फसल और घर में समृद्धि की कामना का प्रतीक हैं। प्रकृति के पंचतत्वों में से एक जल का संरक्षण और उसका सम्मान भी इस व्रत में देखा जा सकता है। मिट्टी का पात्र, जल, चंद्रमा और अन्न, ये सभी प्राकृतिक तत्व इस पर्व को प्रकृति के अत्यंत समीप ले जाते हैं। यह हमें स्मरण कराता है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति के बिना संभव नहीं है।

वर्तमान समय में इस व्रत का स्वरूप थोड़ा विस्तृत हुआ है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहकर दो लोगों के बीच के गहरे भावनात्मक रिश्ते का उत्सव बन गया है। यह पर्व यह संदेश देता है कि वैवाहिक जीवन केवल कर्तव्यों का निर्वाह नहीं है बल्कि यह एक दूसरे की भलाई के लिए किए गए निरंतर प्रयासों, सम्मान और निस्वार्थ प्रेम की एक यात्रा है। करवा चौथ का यह पावन पर्व सदियों से भारतीय समाज में पारिवारिक मूल्यों और दांपत्य जीवन की पवित्रता को सींचता आ रहा है और भविष्य में भी यह अपनी इसी गरिमा के साथ हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न अंग बना रहेगा।