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	<title>शख्सियत Archives - Ravivar Delhi</title>
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	<link>https://ravivardelhi.com/category/शख्सियत/</link>
	<description>National Hindi Newspaper &#38; Magazine</description>
	<lastBuildDate>Mon, 06 Jul 2026 17:54:28 +0000</lastBuildDate>
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	<title>शख्सियत Archives - Ravivar Delhi</title>
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	<item>
		<title>स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ : बदलते समय में अमर जीवन-दर्शन</title>
		<link>https://ravivardelhi.com/the-teachings-of-swami-vivekananda-an-immortal-philosophy-of-life-for-changing-times/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Jul 2026 18:49:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[शख्सियत]]></category>
		<category><![CDATA[The Teachings of Swami Vivekananda: An Immortal Philosophy of Life for Changing Times]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सत्य भूषण शर्मा &#8220;राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा शक्ति के चरित्र में बसता है।&#8221; यह विचार केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानंद के संपूर्ण जीवन-दर्शन का सार है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, सभ्यताएँ नई करवट लेती हैं, विज्ञान नई ऊँचाइयाँ छूता है; किंतु कुछ विचार ऐसे होते हैं जो काल की &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>सत्य भूषण शर्मा </strong></p>



<p>&#8220;राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा शक्ति के चरित्र में बसता है।&#8221; यह विचार केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानंद के संपूर्ण जीवन-दर्शन का सार है। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, सभ्यताएँ नई करवट लेती हैं, विज्ञान नई ऊँचाइयाँ छूता है; किंतु कुछ विचार ऐसे होते हैं जो काल की सीमाओं से परे जाकर मानवता के स्थायी पथप्रदर्शक बन जाते हैं। स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ इसी श्रेणी में आती हैं। वे किसी एक युग, धर्म या देश के संत नहीं थे; वे मानव चेतना के ऐसे जागरण-पुरुष थे जिनकी वाणी आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी डेढ़ सौ वर्ष पूर्व थी।</p>



<p>आज का मनुष्य अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति के बीच खड़ा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति और वैश्विक संपर्क ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु मनुष्य का अंतर्मन पहले से अधिक अकेला, अस्थिर और बेचैन दिखाई देता है। ज्ञान का विस्फोट हुआ है, परंतु विवेक का क्षरण भी उतनी ही तेजी से हुआ है। सूचनाओं की बाढ़ है, लेकिन जीवन का उद्देश्य धुंधला पड़ता जा रहा है। ऐसे संक्रमणकाल में स्वामी विवेकानंद की वाणी मानो समय के पार से पुकारती है—&#8221;मनुष्य, अपनी शक्ति को पहचानो; तुम्हारे भीतर अनंत संभावनाएँ हैं।&#8221;</p>



<p>विवेकानंद का सबसे बड़ा संदेश था—आत्मविश्वास। उनका मानना था कि जो स्वयं पर विश्वास नहीं करता, वह किसी भी महान उपलब्धि का अधिकारी नहीं बन सकता। आज का युवा प्रतिस्पर्धा, असफलता के भय, मानसिक तनाव और सामाजिक तुलना के दबाव से जूझ रहा है। सोशल मीडिया ने उपलब्धियों की चमक तो बढ़ाई है, किंतु आत्मस्वीकृति की रोशनी को कहीं धुंधला भी किया है। ऐसे समय में विवेकानंद का संदेश युवाओं के भीतर छिपी ऊर्जा को जागृत करता है कि सफलता बाहर नहीं, भीतर के विश्वास से जन्म लेती है।</p>



<p>उन्होंने शिक्षा को केवल जानकारी अर्जित करने की प्रक्रिया नहीं माना। उनके अनुसार शिक्षा वह है, जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करे। आज जब शिक्षा का उद्देश्य अनेक बार केवल अंक, डिग्री और रोजगार तक सीमित होकर रह जाता है, तब विवेकानंद का शिक्षा-दर्शन हमें स्मरण कराता है कि चरित्र, संवेदनशीलता, नैतिकता और विवेक के बिना ज्ञान अधूरा है। एक शिक्षित मस्तिष्क यदि मानवीय मूल्यों से रिक्त हो जाए, तो वह समाज के लिए वरदान नहीं, चुनौती भी बन सकता है।</p>



<p>स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्रभक्ति को संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि जनसेवा, आत्मगौरव और सामाजिक उत्तरदायित्व का नाम दिया। उनके लिए भारत केवल भूभाग नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना था। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे राष्ट्र निर्माण को अपना जीवन-धर्म बनाएँ। आज जब भारत विश्व मंच पर नई पहचान बना रहा है, तब आवश्यकता केवल आर्थिक प्रगति की नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों की है जिनके भीतर ईमानदारी, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और सेवा-भाव समान रूप से विद्यमान हों।</p>



<p>उनका मानवतावाद आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। धर्म, जाति, भाषा और विचारधारा के नाम पर बढ़ती कटुता के बीच विवेकानंद का यह संदेश कि प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का अंश विद्यमान है, समाज को नई दिशा देता है। उन्होंने किसी धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि सभी मार्गों में निहित सत्य का सम्मान करना सिखाया। विश्व धर्म सम्मेलन में उनका उद्बोधन केवल भारत की विजय नहीं था; वह मानवता की साझा चेतना का उद्घोष था।</p>



<p>विवेकानंद का जीवन यह भी सिखाता है कि आध्यात्मिकता संसार से पलायन नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर उसके दुःख-दर्द को अपना मानने का नाम है। उन्होंने भूखे व्यक्ति के लिए रोटी को ही पहला धर्म बताया। आज जब विकास के बावजूद आर्थिक असमानता और सामाजिक विषमता बनी हुई है, तब उनका सेवा-दर्शन हमें बताता है कि सच्चा धर्म मंदिरों की घंटियों से अधिक पीड़ित मानव की सहायता में प्रकट होता है।</p>



<p>यदि हम आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती खोजें, तो वह है—मूल्यों का संकट। सुविधा बढ़ी है, किंतु संतोष घटा है; साधन बढ़े हैं, पर साधना कम हुई है; संपर्क बढ़े हैं, लेकिन संबंध कमजोर हुए हैं। इस विडंबना का समाधान विवेकानंद के संतुलित जीवन-दर्शन में मिलता है। वे विज्ञान का विरोध नहीं करते थे, बल्कि चाहते थे कि विज्ञान के साथ विवेक, शक्ति के साथ संवेदना और प्रगति के साथ नैतिकता भी चले। यही संतुलन किसी भी सभ्यता को दीर्घकाल तक टिकाऊ बनाता है।</p>



<p>महिला सशक्तीकरण पर उनके विचार आज भी उतने ही क्रांतिकारी प्रतीत होते हैं। वे मानते थे कि जिस समाज में नारी सम्मानित और शिक्षित नहीं होगी, वह समाज कभी पूर्ण विकास नहीं कर सकता। आज जब महिलाओं की भूमिका प्रत्येक क्षेत्र में निरंतर बढ़ रही है, तब विवेकानंद का दृष्टिकोण सामाजिक समानता की मजबूत आधारशिला सिद्ध होता है।</p>



<p>पर्यावरण संकट, उपभोक्तावाद और असीमित भौतिक इच्छाओं से जूझती दुनिया में उनका संयमपूर्ण जीवन-दर्शन भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने सादगी को कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का प्रतीक माना। प्रकृति के साथ संतुलित संबंध और आवश्यकताओं को सीमित रखने की भावना आज सतत विकास की वैश्विक अवधारणा से पूर्णतः मेल खाती है।</p>



<p>वास्तव में, स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं की प्रासंगिकता इसलिए बनी हुई है क्योंकि उन्होंने समस्याओं का नहीं, मनुष्य का समाधान प्रस्तुत किया। उनका विश्वास था कि यदि मनुष्य का चरित्र सुदृढ़ हो जाए, तो समाज, राष्ट्र और विश्व स्वतः सुदृढ़ हो जाएगा। इसलिए उन्होंने बाहरी परिवर्तन से पहले भीतरी जागरण का आह्वान किया।</p>



<p>आज आवश्यकता केवल विवेकानंद को स्मरण करने की नहीं, बल्कि उन्हें जीने की है। उनके विचार यदि विद्यालयों की पुस्तकों से निकलकर परिवारों की संस्कृति, युवाओं के संकल्प, राजनीति की नैतिकता, शिक्षा की आत्मा और समाज की संवेदना बन जाएँ, तो भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व अधिक मानवीय, शांतिपूर्ण और समृद्ध बन सकता है।</p>



<p>अंततः कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानंद का जीवन एक दीपस्तंभ है, जो हर युग के अंधकार में नई दिशा दिखाता है। बदलते समय में साधन बदल सकते हैं, चुनौतियाँ बदल सकती हैं, किंतु सत्य, चरित्र, आत्मविश्वास, सेवा और मानवता जैसे मूल्य कभी अप्रासंगिक नहीं होते। इसलिए स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ केवल इतिहास की धरोहर नहीं, वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की अनिवार्यता हैं। जब तक मानव अपने भीतर छिपी दिव्यता की खोज करता रहेगा, तब तक विवेकानंद का संदेश उसकी राह को आलोकित करता रहेगा।</p>
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		<title>राजस्थान को विकास पथ पर ले जाते मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा</title>
		<link>https://ravivardelhi.com/chief-minister-bhajan-lal-sharma-steering-rajasthan-onto-the-path-of-development/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 19:16:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्थान]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[शख्सियत]]></category>
		<category><![CDATA[Chief Minister Bhajan Lal Sharma steering Rajasthan onto the path of development]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गोपेन्द्र नाथ भट्ट ढाई साल पहले दिसम्बर 2023 में जयपुर के सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित होने और राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कई लोगों को यह सन्देह था कि सत्ता चलाने का अनुभव नहीं होने के कारण भजन लाल शर्मा देश के सबसे बड़े भौगोलिक प्रदेश राजस्थान &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>गोपेन्द्र नाथ भट्ट</strong></p>



<p>ढाई साल पहले दिसम्बर 2023 में जयपुर के सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित होने और राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कई लोगों को यह सन्देह था कि सत्ता चलाने का अनुभव नहीं होने के कारण भजन लाल शर्मा देश के सबसे बड़े भौगोलिक प्रदेश राजस्थान की सरकार कैसे चलाएंगे लेकिन सत्ता संभालते ही चीते की चाल चलने वाले सरल स्वभाव लेकिन मजबूत और दूरदर्शी इरादे एवं दृढ़ इच्छा शक्ति वाले व्यक्तित्व के धनी भजन लाल शर्मा ने अपेक्षाकृत कम समय में जिस गति से राजस्थान की विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने का प्रयास किया है, उसने राज्य की विकास यात्रा को एक नई दशा और दिशा मिली है।</p>



<p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके चाणक्य केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन, भाजपा एवं आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व एवं केन्द्र सरकार के सहयोग और ‘डबल इंजन सरकार’ की कार्यशैली ने भजन लाल शर्मा को राजस्थान के चहुमुखी विकास के मार्ग पर चलने की मजबूती दी है। मुख्यमंत्री शर्मा की कार्यशैली की विशेषता यह रही है कि उन्होंने केन्द्र और राज्य के बीच समन्वय को प्राथमिकता दी है और अपने हर नई दिल्ली दौरे में राजस्थान के लिए एक नई सौगात लाये हैं । मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में विकसित राजस्थान का सपना अब योजनाओं से आगे बढ़कर धरातल पर आकार लेता दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि अनेक राजनीतिक विश्लेषक और आमजन उन्हें राजस्थान के उभरते हुए ‘विकास पुरुष’ के रूप में देख रहे हैं।</p>



<p>अपने कार्यकाल के आधे सफ़र में उनकी पूरी कहानी लगभग 80,000 करोड़ की <em>पचपदरा रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स</em> का हाल ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों राष्ट्र को समर्पण कराने की निर्णायक पहल से और अधिक मजबूत हुई है। यहां लोकार्पण से पहले ही आगजनी की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद जिस तेजी से 60 दिनों में इसे प्रधानमंत्री के हाथों उद्घाटन के लिए पुनः तैयार किया गया वह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। भारत सरकार और राजस्थान सरकार के सयुंक वेंचर की यह महत्वाकांक्षी परियोजना राजस्थान में अब तक की सबसे बड़े निवेश वाली परियोजना है और यह न केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के औद्योगिक विकास का एक नया अध्याय लिखे जाने वाली परियोजना मानी जा रही है। इससे हजारों प्रत्यक्ष एवं लाखों अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे तथा पेट्रोकेमिकल उद्योगों का विशाल नेटवर्क विकसित होगा।</p>



<p>इस महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक लाख करोड़ की अन्य योजनाओं का शुभारंभ और शिलान्यास किया गया। पीएम मोदी ने जोधपुर के नए हवाई अड्डे का उद्घाटन किया गया वहीं 13000 करोड़ रु की लागत से बनने वाली <em>जयपुर मेट्रो फेज-2</em>की आधारशिला भी रखी गई है। इससे जयपुर शहर में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को नई गति मिलेगी और तेजी से बढ़ते शहरी विस्तार को आधुनिक यातायात सुविधा प्राप्त होगी।</p>



<p>राजस्थान में <em>रेल विकास</em> के नए आयाम स्थापित हो रहें है। विभिन्न रेलवे लाइनों के दोहरीकरण, रेलवें स्टेशनों का पुनर्विकास, नई रेल परियोजनाओं तथा कार्यक्रमों को भी गति मिली है। राजस्थान में ₹57,247 करोड़ कुल 30 रेलवे परियोजनाएँ (11 नई रेल लाइनें,14 दोहरीकरण परियोजनाएँ और 5 गेज परिवर्तन परियोजनाएँ पूरी या आंशिक रूप से पूर्ण हुई है अथवा स्वीकृत होकर प्रगति पर हैं। 2014 के बाद राजस्थान में 3,784 किलोमीटर नई रेलवे लाइन/ट्रैक का निर्माण (नई लाइन, दोहरीकरण आदि सहित) किया गया है।5,143 किलोमीटर से अधिक रेलमार्ग का विद्युतीकरण पूरा किया जा चुका है, जिससे राजस्थान लगभग पूर्ण विद्युतीकृत ब्रॉडगेज नेटवर्क वाला राज्य बन गया है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2025-26 के रेल बजट में राजस्थान के लिए ₹9,960 करोड़ का प्रावधान किया गया, जो 2009–14 की औसत वार्षिक राशि (₹682 करोड़) की तुलना में लगभग 15 गुना अधिक है। वर्तमान में ₹12,480 करोड़ नई रेल लाइनें (लगभग 555 किमी), ₹8,204 करोड़ की दोहरीकरण (लगभग 832 किमी) ₹1,716 करोड़ रु गेज परिवर्तन (लगभग 152 किमी) की परियोजनाएँ प्रगति पर हैं</p>



<p><em>जल संकट</em> आजादी से पहले से ही राजस्थान की सबसे बड़ी चुनौती रहा है। मुख्यमंत्री शर्मा ने प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकताओं के अनुरूप जल संरक्षण और जल प्रबंधन को सर्वोच्च महत्व दिया। पूर्वी राजस्थान की जीवन रेखा मानी जाने वाली 73,000 करोड़ की <em>पुनर्गठित ईआरसीपी –पीकेसी लिंक परियोजना (रामसेतु परियोजना)</em> को अमलीजामा पहनाने के लिए चम्बल और अन्य नदियों को जोड़ने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए उन्होंने भारत सरकार और मध्य प्रदेश सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किए। हाल ही प्रदेश के शेखावाटी अंचल की प्यासी भूमि की प्यास बुझाने केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह के सहयोग से हरियाणा के साथ किए गए ₹34,102 करोड़ के यमुना जल समझौते को राजस्थान के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। इस समझौते से शेखावाटी के चूरू, सीकर और झुंझनु आदि जिलों को भविष्य में यमुना का जल उपलब्ध होने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इस उपलब्धि के बाद मुख्यमंत्री का प्रदेशभर में अभूतपूर्व स्वागत इस बात का प्रमाण है कि जनता इस पहल को विकास के नए युग की शुरुआत मान रही है।</p>



<p>अपनी सरकार के पहले ही वर्ष में उन्होंने <em>राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट</em> का आयोजन किया और इसके माध्यम से राज्य में 35 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए जिनमें से ₹7 लाख करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव धरातल पर उतर चुके है । इन निवेशों का उद्देश्य केवल बड़े उद्योग स्थापित करना नहीं, बल्कि युवाओं के लिए व्यापक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना रहा है। निवेश प्रक्रिया को सरल बनाने, अनुमतियों की समयबद्ध व्यवस्था तथा उद्योगों के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भजनलाल सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा। औद्योगिक निवेश आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार ने निवेश-अनुकूल वातावरण तैयार करने की दिशा में कई कदम उठाए है। साथ ही देश विदेश में बसे प्रवासी राजस्थानियों को अपनी <em>कर्मभूमि से मातृभूमि</em>से जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री शर्मा ने जयपुर में <em>प्रथम प्रवासी राजस्थानी दिवस</em> कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया और देश-विदेश में राजस्थान फाउंडेशन की 26 शाखाएं खोली है जिनमें 14 भारत में और 12 चैप्टर्स विदेशों में खोले गए है ।</p>



<p>प्रदेश में आ रहे विशाल निवेश, आधुनिक आधारभूत संरचना, ऊर्जा परियोजनाएँ, जल प्रबंधन, उद्योग, परिवहन और रोजगार के क्षेत्र में उठाए गए कदम भविष्य के राजस्थान की मजबूत नींव तैयार कर रहे हैं। देश के सबसे बड़े और राजस्थान जैसे विशाल भौगोलिक क्षेत्र वाले राज्य के लिए आधारभूत संरचना का विकास सबसे बड़ी आवश्यकता रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भजन लाल शर्मा ने सड़क, रेल, मेट्रो, एक्सप्रेस-वे तथा औद्योगिक कॉरिडोर को प्राथमिकता दी और केन्द्र सरकार के सहयोग से अनेक राष्ट्रीय राजमार्गों तथा स्टेट हाई वे के निर्माण और विस्तार को तेज गति से आगे बढ़ाया है । परिणाम स्वरूप जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर, और भरतपुर संभागों को बेहतर सड़क संपर्क उपलब्ध कराने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य हुए है ।</p>



<p>मुख्यमंत्री शर्मा ने <em>ऊर्जा क्षेत्र</em> को आत्मनिर्भर बनाने का भी स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है। राजस्थान पहले से ही देश में सौर ऊर्जा का अग्रणी राज्य रहा है, लेकिन नई सरकार ने <em>सौर, पवन और हरित ऊर्जा</em> परियोजनाओं को और अधिक प्रोत्साहन दिया। राज्य में ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर, सौर पार्कों का विस्तार तथा ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं पर विशेष बल दिया गया है। कुल मिलाकर राजस्थान में 50 गीगावाट (50,000 मेगावाट) से अधिक की सौर, पवन और हरित ऊर्जा परियोजनाएँ संचालित अथवा निर्माणाधीन हैं जिन पर लगभग ₹4.5 से ₹5 लाख करोड़ के कुल निवेश की संभावना है।इससे राजस्थान देश की ऊर्जा राजधानी बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।</p>



<p><em>पर्यटन</em> के क्षेत्र में राजस्थान की विश्व विख्यात ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण तथा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी अनेक परियोजनाएँ प्रारम्भ की गई हैं। विरासत स्थलों के संरक्षण, सड़क संपर्क, सुविधाओं के विस्तार तथा पर्यटन अवसंरचना के विकास से राज्य की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संचालित विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे <em>विकसित भारत@2047, स्वच्छ भारत मिशन,हर घर जल, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, पीएम सूर्य घर योजना तथा आधारभूत संरचना विकास</em> आदि को राजस्थान में प्रभावी ढंग से लागू करने का प्रयास कर रहें हैं । उन्होंने <em>हरियालों राजस्थान</em> कार्यक्रम के अंतर्गत गत वर्ष राज्य में ग्यारह करोड़ पौधे लगवाये और इस वर्ष भी दस करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है । <em>स्वच्छता अभियान</em> को गति देने के लिये मुख्यमंत्री शर्मा बहुत अधिक गंभीर दिखते है।इन्हीं कारणों से मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को प्रदेशवासी राजस्थान के एक उभरते हुए ‘विकास पुरुष’ के रूप में देखने लगे हैं।</p>



<p>निश्चित रूप से किसी भी सरकार का अंतिम मूल्यांकन उसके पूरे कार्यकाल के बाद ही किया जाता है, किन्तु मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के वर्ष 2023 से अब तक की ढाई वर्षों की अवधि यह संकेत अवश्य देती है कि राजस्थान में विकास की गति तेज हुई है। यदि विकास की यह गति और समन्वय आगे भी बना रहेगा तो राजस्थान केवल मरुस्थलीय राज्य की पहचान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उद्योग, ऊर्जा, पर्यटन और आधारभूत संरचना,शिक्षा,ग्रामीण विकास,कृषि और संबद्ध क्षेत्रों आदि में देश के अग्रणी राज्यों में अपना स्थान बनाएगा इसमें कोई संदेह नहीं है।</p>
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		<title>दूरदर्शी राजनेता थे वन महोत्सव के प्रणेता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jul 2026 18:53:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[शख्सियत]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रयाग पाण्डे आज से करीब साढ़े सात दशक पूर्व जब पर्यावरण अपघटन, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण बात-बहस और चिंता का विषय नहीं थे। तब भारत वनों और वन संपदा के मामले में आज के बनिस्बत बहुत समृद्ध था। देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुए तीन वर्ष का वक्त भी नहीं बीता &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>प्रयाग पाण्डे</strong></p>



<p>आज से करीब साढ़े सात दशक पूर्व जब पर्यावरण अपघटन, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण बात-बहस और चिंता का विषय नहीं थे। तब भारत वनों और वन संपदा के मामले में आज के बनिस्बत बहुत समृद्ध था। देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुए तीन वर्ष का वक्त भी नहीं बीता था। उस समय भारत के तत्कालीन नेतृत्व के सामने पर्यावरण के बजाय देश की दूसरी अनेक ज्वलंत समस्याएं चुनौती बनी हुई थीं। उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में देश की तात्कालिक समस्याओं के मुकाबले पेड़ और पर्यावरण के मुद्दे गौण थे। बावजूद इसके हमारे दूरदर्शी राजनेता पर्यावरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। उन्हें भविष्य में पेश आने वाली पर्यावरणीय समस्याओं का भान था। उन्हीं में से एक राष्ट्रवादी नेता थे- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी। श्री मुंशी की दीर्घकालिक सोच, पर्यावरण के प्रति भारतीय संस्कृति की समझ, संवेदनशीलता और पहल का ही सुफल है- &#8216;वन महोत्सव।&#8217;</p>



<p>कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी अग्रणीय पंक्ति के स्वाधीनता संग्राम सेनानी, प्रख्यात साहित्यकार, शिक्षाविद और श्रेष्ठ राजनेता थे। वे संविधान सभा के सदस्य थे। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में बनी संविधान सभा की प्रारूप समिति के महत्वपूर्ण सदस्य भी रहे थे। 13 मई,1950 को कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भारत के तीसरे कृषि मंत्री बने। उन्होंने वन और पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति जन-जागरूकता पैदा करने की मंशा से वृक्षारोपण अभियान चलाने का मन बनाया। भारत सरकार के कृषि एवं खाद्य मंत्री के रूप में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के कार्यकाल के दौरान 1950 में पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण का राष्ट्रव्यापी अभियान प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया था। जिसको नाम दिया गया-&#8216;वन महोत्सव।&#8217; एक जुलाई, 1950 को दिल्ली के राजघाट से वन महोत्सव का शुभारंभ हुआ।</p>



<p>आधुनिक भारत में प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए वन महोत्सव जैसे राष्ट्रव्यापी अभियान का शुभारंभ प्रथमदृष्टया अभिनव प्रयोग प्रतीत होता है । वस्तुतः यह विचार पेड़, पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर भारत की प्राचीन संस्कृति और अवधारणा से प्रेरित था। भारत की प्राचीन संस्कृति में वृक्ष रोपण की परंपरा बहुत पुरानी है। हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य धर्म ग्रंथों में पौधों, वृक्षों और वन्यप्राणियों के महत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। वराह पुराण में स्वर्ग प्राप्ति के लिए नियमित वृक्षारोपण की सलाह दी गई है। मत्स्य पुराण और पद्मपुराण में भी वृक्ष महोत्सव का वर्णन हुआ है। मत्स्य पुराण में एक वृक्ष रोपण को दस पुत्रों के समान बताया गया है। प्रकृति को देव तुल्य माना गया है। प्रकृति की विभिन्न संरचनाओं में देवी &#8211; देवताओं की संकल्पना की गई है।</p>



<p>2 जून, 1952 को कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी अविभाजित उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बने। 1953 में नैनीताल प्रवास के दौरान उन्होंने ही नैनीताल के राजभवन में वन महोत्सव की शुरूआत की थी। वन महोत्सव का शुभारंभ करते हुए श्री मुंशी ने राजभवन परिसर, नैनीताल में बांज का पौधा लगाया था। कालांतर में श्री मुंशी द्वारा रोपा गया पौधा राजभवन परिसर में मौजूद अनगिनत दरख्तों का हिस्सा बन गया। हर साल वन महोत्सव मनाने की परंपरा का निर्वहन होता रहा, लेकिन किसी ने भी वन महोत्सव के प्रणेता द्वारा लगाए गए बांज के पौधे की सुध लेने की आवश्यकता नहीं समझी।</p>



<p>पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के करीब पंद्रह वर्ष बाद 2015 में डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल उत्तराखंड के राज्यपाल बने। चूंकि डॉक्टर पॉल पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील और प्रकृति प्रेमी हैं। जब डॉक्टर पॉल नैनीताल प्रवास में आए तो उन्होंने श्री मुंशी द्वारा राजभवन परिसर में लगाए गए बांज के वृक्ष को खोजने में गहरी दिलचस्पी दिखाई। लोक निर्माण विभाग एवं वन विभाग के अफसरों को इस पेड़ को खोजने के आदेश दिए। लंबी -चौड़ी कसरत के बाद अंततः श्री मुंशी द्वारा लगाए गए बांज के पेड़ की शिनाख्त कर ली गई। तत्कालीन राज्यपाल डॉक्टर पॉल के आदेश पर इस वृक्ष में विधिवत सूचना पट्टिका लगा दी गई थी। श्री मुंशी द्वारा करीब तिहत्तर साल पहले नैनीताल के राजभवन परिसर में लगाया गया बांज का वह नन्हा पौधा अब दरख़्त बन गया है और हमारे तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की पर्यावरण संरक्षण के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता की कहानी बयां कर रहा है।</p>



<p>आज जबकि संपूर्ण विश्व पर्यावरण अपघटन से उपजी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। लगातार हो रहे वन विनाश से पर्यावरण में असंतुलन पैदा हो गया है। अनियंत्रित एवं असंयोजित विकास, नगरीकरण और बढ़ती आबादी के कारण नित बढ़ते ध्वनि, वायु, मृदा, जल एवं स्थल प्रदूषण से पर्यावरणीय संकट बढ़ा है। पृथ्वी के सभी जीवधारी ग्लोबल वॉर्मिंग से उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। वनोन्मूलन के कुप्रभावों से बचने और पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सघन वृक्षारोपण की वकालत की जा रही है, लेकिन जंगलात महकमे ने पर्यावरण संरक्षण के इस महत्वपूर्ण अभियान को महज रस्म अदायगी बना दिया है। पिछले करीब साढ़े सात दशक से वन महोत्सव के दौरान लाखों हेक्टेयर भूमि में पौधे रोपे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। वृक्षारोपण के नाम पर सरकारी खजाने से बेहिसाब धन खर्चा जाता रहा है, लेकिन वृक्षारोपण अभियान की जमीनी कामयाबी और उपलब्धियों की पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई जाती है।</p>



<p>हर साल बरसात में जुलाई के महीने वन महोत्सव मनाया जाता है। पौधारोपण होता है। जंगलात विभाग की फाइलों में झक हरियाली छा जाती है। गर्मी के मौसम में अक्सर जंगलों में आग लग जाया करती है। वृक्षारोपण की जमीनी असलियत दावाग्नि की लपटों की ओट में छिप जाती है। नतीजतन जिन स्थानों में पिछले वर्षों वन महोत्सव मनाया गया, उनमें से अधिकतर जगहें वृक्ष विहीन ही नज़र आती हैं। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए वन महोत्सव जैसे व्यापक जन सहभागिता वाले कार्यक्रम का शुभारंभ करने वाले राजनेताओं का नज़रिया भले ही दूरगामी रहा हो, लेकिन अब वन महोत्सव अन्य सरकारी कार्यक्रमों जैसा ही उपक्रम बन कर रह गया है। पर्यावरण अपघटन से उपजी समस्याओं से निपटने के लिए वन महोत्सव जैसे राष्ट्रव्यापी अभियानों की अब तक की उपलब्धियों और विफलताओं का तटस्थ आकलन किया जाना आवश्यक है। अन्यथा वन महोत्सव भी मात्र औपचारिकता बन कर रह जाएगा।</p>



<p><strong>(लेखक उत्तराखण्ड के नैनीताल निवासी वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)</strong></p>
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