क्या बंगाल भी बिहार के रास्ते पर चलने को तैयार है

Is Bengal also ready to follow the path of Bihar?

बिहार के बाद महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम ने लोगों को फिर चौकाया है। बीजेपी के प्रति इतना जबर्दस्त समर्थन अब विरोधियों को भी यह कहने पर मजबूर कर रहा है कि भगवा पार्टी कमाल कर रही है। उसका संगठन अब इतना मजबूत हो चुका है कि कोई अन्य पार्टी उसके आस पास भी खड़ी नहीं हो पा रही है। तो क्या अब बंगाल में भी मिलेगी बीजेपी को बड़ी सफलता ?

गीता शुक्ला

बिहार के बाद महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम ने लोगों को फिर चौकाया है। बीजेपी के प्रति इतना जबर्दस्त समर्थन अब विरोधियों को भी यह कहने पर मजबूर कर रहा है कि भगवा पार्टी कमाल कर रही है। उसका संगठन अब इतना मजबूत हो चुका है कि कोई अन्य पार्टी उसके आस पास भी खड़ी नहीं हो पा रही है। जाहिर है बीजेपी में जिस प्रोफेशनल एक्सेलेन्स की बात अखिलेश यादव ने की है, उसे पार्टी में लाने का श्रेय किसी को जाता है तो वह गृह मंत्री अमित शाह हैं, और अब उन्हीं गृह मंत्री के हाथों में बीजेपी ने बंगाल और तमिलनाडु का चुनाव प्रभार सौंप दिया है। अब लोगों में यह उम्मीद बंध गयी है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भी इस बार बीजेपी को दो-तिहाई बहुमत लेकर आएगी।

बंगाल से जुड़े कई स्वतंत्र टिप्पणीकार यह कहने लगे हैं कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी 50 सीटों से भी नीचे चली जाएगी और आशंका यह भी व्यक्त की जा रही है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी सीट भवानीपुर को भी बचाने में बड़े पापड़ बेलने पड़ सकते हैं। पश्चिम बंगाल की सत्ता से यदि टीएमसी बाहर होती है, तो इसके पीछे बीजेपी के उत्थान के साथ ममता बनर्जी के ध्रुवीकरण वाली राजनीति का पतन भी एक बड़ा कारण होगा। क्योंकि अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति से प्रदेश की 70 फीसदी जनता ऊब चुकी है और इस बार बदलाव की आवाज साफ सुनाई दे रही है। जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले महीने 29 से 31 दिसंबर तक की कोलकाता की यात्रा की स्थानीय लोगों और बीजेपी कार्यकर्त्ताओं में इसी तरह का जज़्बात साफ दिखाई दिया था। यह पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव अभियान की एक तरह से शुरुआत थी। अमित शाह ने अपने चीरपरिचित अंदाज में मैराथन संगठनात्मक बैठकें कीं पार्टी कार्यकत्ताओं के साथ साथ आरएसएस के पदाधिकारियों को भी जाग्रत कर दिया और लगे हाथ उन्होंने पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए दो-तिहाई बहुमत की भविष्यवाणी भी कर दी।

अमित शाह जिस भी विधान सभा चुनाव की जिम्मेदारी लेते हैं, वहाँ सबसे पहले संगठन को कसने से ही शुरुआत करते हैं। विधायकों, सांसदों के साथ साथ नगर निगम पार्षदों तक के साथ लगातार बंद कमरे में बात करते हैं और कहीं भी किसी गफलत की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं। अपने वैचारिक मूल संगठन के बीच का उनका समन्वय जबर्दस्त होता है। फिर अपने प्रतिस्पर्धियों की कमजोरियों और मुद्दों को चिन्हित कर उनके काउन्टर नैरेटिव तैयार करवाते हैं और उस पर कार्पेट बॉम्बिंग शुरू कर देते हैं। पश्चिम बंगाल में भी अमित शाह ने ममता सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार, चिट फंड घोटाला, नौकरी घोटाला, कोयला घोटाला और पशु तस्करी के मुद्दे चिन्हित कर लिए हैं और उसमें संलिप्त तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के नाम भी उजागर कर दिए हैं। राज्य के कई मंत्रियों के भ्रष्टाचार में शामिल होने के कारण जेल जाने की घटनाएं लोगों के दिमाग में पहले से ही अंकित है। और सबसे ऊपर बीजेपी जिस मुद्दे को लेकर चुनाव जितने के प्रति आश्वस्त है वह है बांग्लादेश से घुसपैठ का मुद्दा। ममता बनर्जी इस मुद्दे पर घिर चुकी हैं। अमित शाह के इस आरोप का उनके पास जवाब नहीं है कि आखिर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए उन्होंने बीएसएफ़ को ज़मीन देने से क्यों इनकार किया।

बीजेपी ने यह रिकार्ड पेश किया है कि असम और त्रिपुरा से घुसपैठ की घटनाएं लगभग बंद हो गई हैं जबकि पश्चिम बंगाल में अब भी जारी है। इस कारण बंगाल की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। खड़गपुर से कोलकाता और बर्धमान से सिलीगुड़ी तक का पूरा इलाका डेमोग्राफिक रूप से बदल गया है। स्थानीय लोग ही बताते हैं कि ये सारे इलाके अब बांग्लादेशी निवासियों से भर गए हैं। ये पश्चिम बंगाल के मूल निवासी नहीं हैं, लेकिन संसाधनों पर इनका कब्जा हो चुका है। वे बेहतर पैसे और अच्छी ज़िंदगी के लालच में आए थे, लेकिन बंगाल के राजनीतिज्ञों ने उनका यहीं बसेरा बना दिया। बंगाल की संस्कृति, जीवन शैली, परंपरा, आदि. सब कुछ बदल गया है। बीजेपी के इस वायदे में बंगाली समुदाय को एक विश्वास दिखता है कि घुसपैठ पर लगाम के लिए एक नेशनल ग्रिड बनना चाहिए और गृह मंत्री इसको चुनावी अभियान का हिस्सा बनाना चाहते हैं।

देखा जाए तो बीजेपी की चुनावी राजनीति की कमान जब से अमित शाह संभाल रहे हैं, तब से लगातार पश्चिम बंगाल में भी पार्टी की स्थिति सुधर रही है। 2016 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी को केवल में 3 विधानसभा सीटों में ही जीत हासिल हुईं थी, लेकिन 2021 में 77 सीटों को जीतने में बीजेपी सफल रही। उसी तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में बीजेपी को 17 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को 39 प्रतिशत वोटों का सहारा मिला। बीजेपी अमित शाह के नेतृत्व में बिहार की ही तरह बूथ-केंद्रित रणनीति अपनाने जा रही है। पश्चिम बंगाल के कुल 81,000 मतदान बूथों में से बीजेपी ने 65,000 के लिए बूथ समितियां बना ली है और सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों में विस्तारक तैनात कर दिए हैं।

दूसरी तरफ ममता बनर्जी के शासन काल में अपराध और अपराधियों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है। खुद मुख्यमंत्री अराजकता की लाइन पार करती दिखाई देती हैं। वह प्रधानमंत्री पद की गरिमा का भी अक्सर उल्लंघन करती दिखाई देती हैं। केंद्र के साथ बैठकों में भी कागज़ फेंकने, झल्लाने और घमंड दिखाने से बाज नहीं आतीं। बंगाल के लोगों को ममता की इस शासन संस्कृति से लज्जित होना पड़ता है। पीएम मोदी लगातार धैर्य और सहिष्णुता से पेश आते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में ईडी के अधिकारियों के साथ ममता के असंवैधानिक व्यवहार उनकी सरकार को बर्खास्त करने का कारण बन सकता था। फिर भी बीजेपी नेतृत्व इसकी मांग से बच रहा है। बीजेपी संभवतः यह मान रही है कि 2026 में बंगाल की सीएम ममता नहीं होंगी और टीएमसी के लिए खुद को बचाए रखना भी संभव नहीं होगा। क्योंकि मुस्लिम वोट के लिए हिंदुओं के साथ भेद भाव का यह दौर अब आगे नहीं चल सकता। अमित शाह ज़्यादातर मामलों में अपनी बात पर खरे उतरे हैं, बंगाल भी उनके लिए उनके वायदे के साथ खड़ा होगा क्या?