
संघ की शताब्दी यात्रा का उद्देश्य केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों में संतुलन, संस्कार और एकता लाना है। डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत अखंड है और हिन्दू राष्ट्र की भावना जीवन और संस्कृति में निहित है। संघ का कार्य निःस्वार्थ सेवा, शिक्षा में संस्कार और सामाजिक उत्थान पर केंद्रित है। आर्थिक स्वावलंबन, स्वदेशी और रोजगार सृजन पर बल दिया गया। संघ महिलाओं को नेतृत्व में सक्रिय करता है। जनसंख्या संतुलन, आरक्षण और सांस्कृतिक जागरूकता पर ध्यान देते हुए संघ समाज के कोने-कोने तक सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
डॉ सत्यवान सौरभ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उदय भारत की आत्मा और उसकी सभ्यता को केंद्र में रखकर हुआ है। संघ का कार्य केवल संगठन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के उस लक्ष्य की ओर अग्रसर है जहाँ राष्ट्र विश्वगुरु के रूप में पुनः स्थापित हो सके। संघ की प्रार्थना का अंतिम उद्घोष “भारत माता की जय” इस यात्रा का प्रेरणास्रोत है। यही कारण है कि संघ की कार्यप्रणाली धीमी, दीर्घकालिक और सतत है।
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शताब्दी वर्ष के अवसर पर यह स्पष्ट किया कि संगठन का अर्थ किसी के विरोध में खड़ा होना नहीं है। संघ का मर्म ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ है— पूरा विश्व एक परिवार है। इस दृष्टि से संघ ने स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज और राष्ट्र की एकता के लिए कार्य किया है। स्वयंसेवक स्वयं तैयार होते हैं और दूसरों को तैयार करते हैं। संगठन की यह प्रक्रिया आत्मनिर्भर है, जिसमें ‘गुरु दक्षिणा’ जैसे उपक्रम केवल प्रतिबद्धता और आस्था का प्रतीक हैं।
भारत की राष्ट्र-परिभाषा पश्चिमी अवधारणा से भिन्न है। यहाँ राष्ट्र सत्ता पर आधारित नहीं, बल्कि संस्कृति और आत्मा पर आधारित है। अंग्रेजों की गुलामी के दौरान भी भारत राष्ट्र था, क्योंकि राष्ट्र का आधार यहाँ केवल शासन नहीं बल्कि साझा परंपरा, श्रद्धा और संस्कार रहे हैं। यही कारण है कि संघ का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के नैतिक उत्थान के द्वारा राष्ट्र का पुनर्निर्माण करना है।
“विविधता में एकता और समन्वय का संदेश”
भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधता में एकता है। डॉ. भागवत ने कहा कि भारतीय समाज का स्वभाव संघर्ष का नहीं, बल्कि समन्वय का है। इस भूमि ने हमेशा भीतर झाँककर सत्य की खोज की है, बाहर देखने की आवश्यकता कम ही रही। यही कारण है कि यहाँ के महापुरुषों ने मानवता, सृष्टि और मनुष्य को आपस में जुड़े हुए रूप में समझा।
स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों ने अपने विचारों से इस चेतना को जागृत किया। वहीं, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने यह अनुभव किया कि समाज की कुरीतियाँ और आंतरिक दोष हमें बार-बार गुलामी की ओर धकेलते हैं। उन्होंने ठाना कि संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन कर ही इन दोषों को दूर किया जा सकता है। यही उद्देश्य लेकर 1925 में संघ की स्थापना हुई।
‘हिन्दू’ शब्द को धार्मिक सीमा में बाँधना उचित नहीं है। यह शब्द समावेश का प्रतीक है, जिसमें हर किसी की श्रद्धा का सम्मान है। हिन्दू का अर्थ है दूसरों को बदलने की आवश्यकता न समझना, बल्कि उन्हें उनके मार्ग पर सम्मानपूर्वक चलने देना। इस दृष्टि से हिन्दू कहना “हिन्दू बनाम अन्य” नहीं है, बल्कि यह विविधता में एकता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
आज जब जीवन की गुणवत्ता और सामाजिक समरसता पर प्रश्न उठते हैं, तो लोग अपने मूल की ओर लौटते हैं। इसीलिए धीरे-धीरे वे लोग भी स्वयं को हिन्दू कहने लगे हैं, जो पहले इससे दूरी रखते थे। संघ इस प्रक्रिया को बल देता है, लेकिन किसी पर दबाव नहीं डालता। संघ के लिए हिन्दू राष्ट्र सत्ता या शक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समन्वय की स्वाभाविक परिणति है।
“संघ की शताब्दी यात्रा और नये क्षितिज की ओर कदम”
संघ ने अपने शताब्दी वर्ष को केवल उत्सव तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे आत्ममंथन और भविष्य-दृष्टि का अवसर बनाया है। संघ यह मानता है कि भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। इस सांस्कृतिक राष्ट्र की विशेषता यह है कि इसमें विविधताओं का सम्मान है, परंतु यह विविधता विभाजन का कारण नहीं बनती।
आज की पीढ़ी में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि हिन्दू राष्ट्र का अर्थ क्या है? डॉ. भागवत ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि हिन्दू राष्ट्र का अर्थ किसी के बहिष्कार से नहीं है। यह सबको साथ लेकर चलने का मंत्र है। संघ सत्ता की राजनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज की चेतना और संस्कृति के उत्थान का साधन है।
भारत की प्रगति और विश्व नेतृत्व तभी संभव है जब समाज संगठित और आत्मविश्वासी बने। संघ ने शिक्षा, सेवा और सामाजिक सुधार के अनेक क्षेत्रों में काम करके यह दिखाया है कि संगठन के बल पर समाज की दिशा बदली जा सकती है। ‘सेवा ही संगठन’ का यह भाव संघ के कार्य में स्पष्ट झलकता है।
संघ की शताब्दी यात्रा भारत के नये क्षितिज खोलने की ओर संकेत कर रही है। यह केवल संघ का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उत्सव है। जब हर व्यक्ति अपने धर्म, भाषा और परंपरा का सम्मान करते हुए एक साझा राष्ट्रीय धारा से जुड़ता है, तब वह भारत माता की सच्ची सेवा करता है। यही संघ का सपना है और यही भारत को विश्वगुरु बनाने का मार्ग भी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संदेश स्पष्ट है— समाज के संगठन और समन्वय के बिना राष्ट्र का पुनरुत्थान संभव नहीं। विविधता में एकता भारत की पहचान है और इसी के आधार पर भविष्य का निर्माण होना चाहिए। संघ की शताब्दी दृष्टि केवल संगठन की शक्ति को ही नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को विश्व मंच पर पुनः प्रतिष्ठित करने का संकल्प भी है।