सत्य भूषण शर्मा
रात के लगभग नौ बज चुके थे।
सर्द हवा शहर की गलियों में धीरे-धीरे उतर रही थी।
दुकानों के शटर गिरने लगे थे, लेकिन मोबाइल स्क्रीन पर आने वाले ऑर्डर अभी भी लोगों की भूख और अकेलेपन का पता दे रहे थे।
मैं एक डिलीवरी बॉय हूँ।
दिनभर शहर की सड़कों पर दौड़ता रहता हूँ—कभी धूप से लड़ता, कभी बारिश से, तो कभी लोगों की झुंझलाहट से।
मेरे लिए हर ऑर्डर बस एक नंबर होता था—एक पता, एक पैकेट और कुछ मिनटों की दौड़।
लेकिन उस रात मुझे नहीं पता था कि मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सीख एक छोटे-से खाने के पैकेट में छिपी बैठी है।
मोबाइल पर आख़िरी ऑर्डर आया।
सिर्फ़ एक सादी खिचड़ी, थोड़ा दही और दो केले।
मैंने मन ही मन सोचा—
“किसी बीमार या बूढ़े इंसान का ऑर्डर होगा…”
रेस्टोरेंट से खाना लेकर मैं पुराने शहर की तरफ निकल पड़ा।
गलियाँ सुनसान थीं।
टिमटिमाती पीली लाइटों के बीच एक जर्जर-सी बिल्डिंग सामने खड़ी थी, मानो वक्त की मार झेलते-झेलते थक चुकी हो।
तीसरी मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूल गई।
मैंने डोरबेल दबाई।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।
सामने एक बुज़ुर्ग अम्मा खड़ी थीं।
सफेद बिखरे बाल… काँपते हाथ… झुर्रियों से भरा चेहरा… और आँखों पर मोटा चश्मा।
लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब-सी प्रतीक्षा थी—जैसे वे किसी अपने का इंतज़ार करते-करते थक चुकी हों।
उन्होंने धीमे से कहा—
“बेटा… ज़रा खाना अंदर रख दो… हाथ काँपते हैं।”
मैंने खाना टेबल पर रख दिया।
मुड़कर जाने ही वाला था कि उनकी धीमी आवाज़ फिर सुनाई दी—
“अगर जल्दी न हो… तो दो मिनट बैठ जाओ।
अकेले खाना अच्छा नहीं लगता।”
उन शब्दों में ऐसी नमी थी कि मेरे कदम रुक गए।
मैं कुर्सी खींचकर बैठ गया।
कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पसरी थी।
पुरानी घड़ी की टिक-टिक पूरे कमरे में गूंज रही थी।
एक कोने में भगवान की छोटी-सी तस्वीर थी, जिसके सामने बुझता हुआ दिया टिमटिमा रहा था।
और दीवारों पर लगी तस्वीरें बता रही थीं कि कभी यह घर हँसी से भरा होगा।
अम्मा ने थाली खोली।
धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं।
हर कौर के साथ वे मुझे ऐसे देखतीं, जैसे बरसों बाद किसी अपने के साथ बैठी हों।
फिर उन्होंने दीवार पर लगी एक तस्वीर की ओर इशारा किया।
“ये मेरे पति हैं… रेलवे में थे।
बहुत हँसमुख इंसान थे।
घर में कभी सन्नाटा नहीं रहने देते थे।”
उनकी आवाज़ अचानक धीमी पड़ गई।
“पाँच साल पहले चले गए…
उस दिन के बाद ये घर भी चुप हो गया।”
मैं चुपचाप सुनता रहा।
फिर उन्होंने दूसरी तस्वीर की ओर देखा।
“ये बेटा है… कनाडा में रहता है।
बहुत अच्छा है।
हर महीने पैसे भेजता है… दवाइयाँ भी पूछता है…”
इतना कहकर वे रुक गईं।
होंठ मुस्कुराए… लेकिन आँखें भर आईं।
“बस… अपना समय नहीं भेज पाता।”
मेरे भीतर कुछ कसक उठा।
उन्होंने तीसरी तस्वीर की तरफ देखा।
“ये बेटी है… बंगलुरु में।
अपनी दुनिया में खुश है।
होना भी चाहिए…
बच्चे अगर उड़ेंगे नहीं, तो माँ-बाप की परवरिश अधूरी रह जाएगी।”
इतना कहकर वे कुछ पल चुप रहीं।
फिर बहुत धीरे से बोलीं—
“बस कभी-कभी लगता है… इस घर की दीवारें मुझसे ज़्यादा बात करती हैं।”
उनकी आवाज़ टूट गई।
मैंने पहली बार महसूस किया कि दुनिया का सबसे बड़ा दुख शायद भूख नहीं, अकेलापन होता है।
अचानक उन्होंने मेरी ओर देखा—
“तुम्हारी माँ है?”
मैंने सिर हिलाया—
“हाँ…”
“रोज़ बात करते हो?”
मैं चुप हो गया।
सच तो यह था कि मैं भी कई-कई दिन माँ को फोन नहीं करता था।
हर बार यही सोचता—
“अभी थका हूँ… कल कर लूँगा…”
लेकिन “कल” अक्सर बहुत देर से आता है।
अम्मा ने मेरी खामोशी पढ़ ली।
वे मुस्कुराईं और बोलीं—
“माँ-बाप बेटा पैसे नहीं गिनते…
बस इंतज़ार गिनते हैं।
दरवाज़े की आहट गिनते हैं…
फोन की घंटी गिनते हैं…
और बच्चों की आवाज़ में अपनी पूरी दुनिया सुन लेते हैं।”
मेरी आँखें झुक गईं।
उस पल मुझे अपनी माँ याद आ गई—
जो हर फोन पर यही पूछती थीं—
“खाना खाया ना बेटा?”
और मैं अक्सर जल्दी में कह देता—
“हाँ माँ, बाद में बात करता हूँ…”
शायद मैंने कभी महसूस ही नहीं किया था कि उन शब्दों के पीछे कितनी ममता छिपी होती है।
खाना खत्म हुआ।
अम्मा ने काँपते हाथों से पानी पिया।
फिर अपने पुराने पर्स से पाँच सौ रुपये निकालकर मेरी तरफ बढ़ाए।
मैं घबरा गया—
“अम्मा, इसकी क्या ज़रूरत है?”
वे मुस्कुराईं—
“ये टिप नहीं है बेटा…
ये उस आधे घंटे की कीमत है, जिसमें तुमने मुझे इंसान होने का एहसास कराया।
आज तुमने सिर्फ़ खाना नहीं पहुँचाया… साथ पहुँचाया है।”
मेरी आँखें भर आईं।
मैंने पैसे ले तो लिए, लेकिन ऐसा लगा जैसे हाथों में नोट नहीं, किसी माँ का आशीर्वाद रखा हो।
जाते-जाते उन्होंने आवाज़ दी—
“और हाँ…
आज घर जाकर माँ को फोन ज़रूर करना।
क्योंकि कुछ आवाज़ें देर होने पर हमेशा के लिए खामोश हो जाती हैं।”
उनकी बात मेरे सीने में उतर गई।
उस रात मैंने बिल्डिंग के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की।
सड़क किनारे खड़े-खड़े माँ का नंबर मिलाया।
उधर से घबराई हुई आवाज़ आई—
“आज अचानक फोन? सब ठीक है ना बेटा?”
बस इतना सुनते ही मेरी आँखें छलक पड़ीं।
मैंने काँपती आवाज़ में कहा—
“हाँ माँ…
बस आपकी आवाज़ सुननी थी।”
कुछ पल ख़ामोशी रही।
फिर माँ बोलीं—
“खाना खाया?”
और मैं सड़क किनारे खड़ा रो पड़ा।
उस रात के बाद मेरी ज़िंदगी बदल गई।
अब हर डिलीवरी मेरे लिए सिर्फ़ खाना पहुँचाना नहीं रही।
मैंने महसूस किया—
किसी घर में दवा जाती है…
किसी घर में उम्मीद…
किसी घर में इंतज़ार…
और किसी घर में बस दो शब्दों की गर्माहट।
अब मैं दरवाज़ा खुलते ही जल्दी नहीं करता।
चेहरे पढ़ता हूँ।
कभी पूछ लेता हूँ—
“और सब ठीक है?”
ज़्यादातर लोग मुस्कुरा देते हैं।
लेकिन कुछ आँखें बता देती हैं कि वे पूरे दिन किसी इंसान की आवाज़ सुनने को तरसे हैं।
करीब दो महीने बाद उसी पते का फिर ऑर्डर आया।
मैं खुशी-खुशी वहाँ पहुँचा।
लेकिन इस बार दरवाज़ा किसी और ने खोला।
पड़ोस वाली आंटी थीं।
उन्होंने धीमे से कहा—
“अम्मा पिछले हफ्ते चली गईं…”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उन्होंने अंदर जाकर एक छोटा-सा लिफाफा लाकर मेरे हाथ में रखा।
“ये तुम्हारे लिए छोड़ गई थीं।”
काँपते हाथों से मैंने लिफाफा खोला।
अंदर वही पाँच सौ रुपये थे।
और एक छोटी-सी पर्ची।
जिस पर लिखा था—
“बेटा,
अगर ये पढ़ रहे हो, तो मैं जा चुकी हूँ।
धन्यवाद उस रात मेरे साथ खाना खाने के लिए।
तुमने मुझे खाना नहीं, सम्मान दिया।
और हाँ… माँ को फोन करते रहना।
क्योंकि दुनिया में सबसे दर्दनाक चीज़ किसी माँ का अकेले इंतज़ार करना होता है।
— अम्मा”
उस दिन मैं पहली बार किसी ग्राहक के घर से बाहर निकलकर फूट-फूटकर रोया।
आज भी वो पाँच सौ रुपये मेरे बैग की अंदर वाली जेब में रखे हैं।
वे मेरे लिए पैसे नहीं, एक माँ की आख़िरी सीख हैं।
अब मैं हर रात माँ को फोन करता हूँ।
और जब भी किसी बुज़ुर्ग के काँपते हाथों में खाना देता हूँ, तो लगता है जैसे कहीं न कहीं अम्मा फिर मुस्कुरा रही हों।
क्योंकि अब समझ आया है—
इस दुनिया में सबसे गरीब इंसान वह नहीं जिसके पास पैसे नहीं,
बल्कि वह है जिसके पास बात करने वाला कोई अपना नहीं।
हम सब अपनी-अपनी भूख लेकर जी रहे हैं—
किसी को रोटी चाहिए,
किसी को दवा,
किसी को सम्मान,
और किसी को बस थोड़ा-सा साथ।
कभी-कभी इंसान को खाने से पहले एक आवाज़ की ज़रूरत होती है।





