आचार्यश्री विद्यासागर जी — वे संसार में रहे, पर संसार उनमें कभी नहीं रहा

Acharyashri Vidyasagar Ji - He lived in the world, but the world never lived in him.

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शरद पूर्णिमा की चाँदनी एक प्रश्न छोड़ जाती है—क्या उज्ज्वल होना केवल चमकना है, या अपने त्याग से दूसरों का अंधकार हरना भी? 10 अक्टूबर 1946 की शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में कर्नाटक के बेलगाँव जिले के सदलगा ग्राम में जन्मे विद्याधर ने अपने जीवन से इसका उत्तर दिया। वैभव के सम्मुख वैराग्य, स्वार्थ के सम्मुख परमार्थ और भौतिक उपलब्धियों के सम्मुख आत्मविजय को प्रतिष्ठित करते हुए वे दिगंबर जैनाचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज बने—जिनके व्यक्तित्व में चंद्रमा की शीतलता, हिमालय की ऊँचाई और महासागर की गहराई एकाकार थीं। शरद पूर्णिमा पर उनका स्मरण जन्मोत्सव भर नहीं, जीवन की कसौटी है—हमने कितना अर्जित किया, इससे नहीं; अपने होने से संसार को कितना समृद्ध किया, इससे हमारी सार्थकता तय होती है।

जब स्वार्थ संवेदना को निगलने लगे, तब संत का एक वाक्य भी पूरे युग का चरित्र उजागर कर देता है। आचार्यश्री कहते थे, “कौन दुःखी है, कौन सुखी है, आज इसकी बात नहीं होती, आज तो अपने स्वार्थ की बात होती है…” यह कथन समाज के अंतर्मन पर खड़ा वह प्रश्न है, जिससे मुँह मोड़ना आसान नहीं। भारतभूमि के प्रखर तपस्वी, आचार्य ज्ञानसागर के विद्याहंस, प्रभु महावीर के संदेशवाहक, अहिंसा के आराधक, अनियत विहारी, अध्यात्म-मर्मज्ञ, प्रवचन-प्रभाकर, शब्द-शिल्पी, अनुपम मेधावी, सिद्धांतागम के पारगामी, अयाचक वृत्ति के साधक, कवि, चिंतक और विश्ववंद्य राष्ट्रसंत—विशेषणों की पूरी माला भी उनके विराट व्यक्तित्व को परिभाषित करने में अधूरी पड़ जाती है। आठ से अधिक भाषाओं के ज्ञाता और अनेक धर्मशास्त्रों के रचयिता होते हुए भी उनकी सर्वोच्च उपलब्धि ज्ञान का विस्तार नहीं, उसका जीवन में साक्षात् अवतरण था। उन्हें शब्दों में समेटना आकाश को मुट्ठी में बाँधने जैसा है—वे किसी एक परिचय के नहीं, समूची मानवता की करुणा के संत थे।

जिस घर में संस्कार संकल्प बन जाएँ, वहाँ त्याग जीवन की दिशा बन जाता है। पिता श्री मल्लप्पा (मुनि मल्लिसागर) और माता श्रीमंती (आर्यिका समयमति) के घर जन्मे विद्याधर ने नौ वर्ष की आयु से ही धर्म के प्रति अनुराग दिखाया। कन्नड़ माध्यम से नवीं कक्षा तक शिक्षा के बाद उन्होंने सांसारिक आकर्षण त्याग आत्मकल्याण का मार्ग चुना। 30 जून 1968 को अजमेर में आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज (आचार्य शांतिसागर की परंपरा) से बाईस वर्ष की आयु में मुनि-दीक्षा लेकर वे विद्यासागर बने। 22 नवम्बर 1972 को नसीराबाद में आचार्य पद प्राप्त कर उन्होंने दिगंबर जैन संघ को नई दिशा दी। उनके तीन भाई—योगसागर, समयसागर और उत्कृष्टसागर—भी मुनि बने तथा माता-पिता ने भी संन्यास ग्रहण किया। एक परिवार का सामूहिक श्रमण-पथ पर चलना उस संस्कार-शक्ति का प्रमाण है, जहाँ त्याग शब्दों से नहीं, जीवन के निर्णयों से पीढ़ियों में उतरता है।

तप वह अग्नि है, जिसमें इच्छाएँ भस्म और आत्मबल कुंदन बनता है। आचार्यश्री का जीवन इसी तपसाधना का प्रतिमान था। अनियत विहार, कठोर तप, दीर्घ ध्यान और अयाचक वृत्ति उनकी साधना के आधार थे। चीनी, नमक, फल, दूध, घी, तेल और हरी सब्जियों सहित अनेक वस्तुओं का त्याग कर भी वे संतोषपूर्वक साधनारत रहे। पैदल विहार से उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में धर्म का संदेश पहुँचाया। उनकी वाणी अहिंसा और आचरण समता का साक्षात् रूप था। “पुरुषार्थ करो, अंतरंग सुधारो”—इस संदेश में उन्होंने आत्मपरिवर्तन का सूत्र दिया। उनके मार्गदर्शन में बुंदेलखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य, गौ-रक्षा और धार्मिक जागरण को प्रोत्साहन मिला। उनके सान्निध्य में सैकड़ों मुनि, आर्यिकाएँ, क्षुल्लक और ब्रह्मचारी दीक्षित हुए तथा दिगंबर मुनि-संघ का बड़ा हिस्सा उनकी शिष्य-परंपरा से जुड़ा। उनकी प्रेरणा से अनेक चैत्यालय, स्वाध्यायशालाएँ, औषधालय और यात्री-निवास स्थापित हुए। इस तरह उनका धर्म आराधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, सेवा और संस्कार बनकर समाज में प्रवाहित हुआ।

जिस लेखनी में आत्मबोध की दृष्टि हो, वह मिट्टी में महाकाव्य और मौन में दर्शन खोज लेती है। आचार्य विद्यासागर जी का साहित्य उनकी साधना का ही विस्तार था। संस्कृत की ‘निरंजन शतक’, ‘भावना शतक’, ‘परीषह जय शतक’, ‘सुनीति शतक’ और ‘श्रमण शतक’ जैन दर्शन की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। हिंदी महाकाव्य ‘मूकमाटी’ में उन्होंने मिट्टी के माध्यम से श्रम, साधना, रूपांतरण और जीवन-मूल्यों को गहन अभिव्यक्ति दी। ‘नर्मदा का नरम कंकर’, ‘डूबो मत लगाओ डुबकी’ और ‘तोता क्यों रोता’ जैसी रचनाओं में दार्शनिक चिंतन सहज भाषा में उतरा। संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, मराठी, कन्नड़ और अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं के ज्ञाता आचार्यश्री ने सैकड़ों हाइकु भी रचे। उनकी कृतियों पर शोध हुए और अनेक रचनाएँ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हुईं। उनकी लेखनी की विशिष्टता यह थी कि वह केवल विचार नहीं जगाती थी, पाठक को अपने ही अंतर्मन के सम्मुख खड़ा कर देती थी।

महापुरुषों को जीवित रखने का सामर्थ्य स्मारकों में नहीं, उन मूल्यों में होता है, जिन्हें वे समाज को सौंप जाते हैं। शरद पूर्णिमा आचार्यश्री के जन्मस्मरण का पावन अवसर है, किंतु वे अपने सान्निध्य में जन्मदिन मनाने की परंपरा के पक्षधर नहीं थे। इसलिए अनुयायियों के लिए यह तिथि उत्सव से अधिक आत्मचिंतन का अवसर है। 18 फरवरी 2024 को डोंगरगढ़ के चंद्रगिरि में समाधिमरण द्वारा उन्होंने देह त्याग दी। अंतिम दिनों में मुनि समयसागर जी को उत्तराधिकारी निर्दिष्ट कर उन्होंने सिद्ध किया कि संत की विदाई परंपरा का अंत नहीं, बल्कि उसकी अखंड धारा का नवीन आरंभ है। उनकी तपस्या, वाणी, साहित्य और जीवन-मूल्य आज भी अक्षुण्ण एवं शाश्वत हैं। लाखों श्रद्धालुओं के हृदय में उनकी स्मृति आज भी प्रेरणा की अखंड ज्योति है। क्योंकि कुछ संत देह से विदा होकर भी विचारों में जीवित रहते हैं और उनका जीवन अपने समय से आगे आने वाली पीढ़ियों का पथ आलोकित करता है।

शरद पूर्णिमा का चंद्रमा आकाश को आलोकित करता है, आचार्य विद्यासागर जी महाराज का जीवन अंतर्मन को निर्मल करने की प्रेरणा देता है। उन्होंने महावीर के संदेश को युगजीवन में उतारकर सिद्ध किया कि धर्म परिवर्तन में, अहिंसा आचरण में और श्रद्धा अनुकरण में सार्थक होती है। उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है—स्वार्थ पर परार्थ, उपभोग पर संयम, कटुता पर करुणा और आडंबर पर आत्मशुद्धि को चुनना। देह पंचतत्त्व में विलीन हुई, किंतु उनका संदेश प्रत्येक अहिंसक विचार, त्यागपूर्ण निर्णय और सत्यनिष्ठ कर्म में जीवित है। कुछ जीवन इतिहास में नहीं, चेतना में अमर होते हैं। आचार्यश्री का तप त्याग की मशाल, चिंतन चेतना का शंखनाद और जीवन आत्मविजय का उद्घोष है। शरद पूर्णिमा की चाँदनी ढल जाएगी, समय बदल जाएगा, किंतु उनका त्याग तभी सार्थक होगा, जब मनुष्य अपने भीतर के स्वार्थ को परास्त कर मानवता को विजयी बनाएगा। नमोस्तु, हे तपोनिधि!