आरोपों के चक्रव्यूह में उलझती स्वस्थ राजनीति

Healthy politics entangled in a web of allegations

सुरेश हिंदुस्तानी

वर्तमान में राजनीतिक चर्चाओं में जिस प्रकार का शोर सुनाई दे रहा है, वह सत्य का दबाने का एक प्रयास कहा जाए तो उचित ही होगा। क्योंकि राजनीति केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं होती, राजनीति तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। हम जानते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सत्ता प्राप्त करने की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं को समझने, राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने और समाज के सामने बेहतर विकल्प प्रस्तुत करने का माध्यम भी है। इसलिए राजनीति जितनी स्वस्थ, सकारात्मक और रचनात्मक होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। लेकिन आज की राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी राजनीति अपने मूल उद्देश्य की ओर बढ़ रही है?

आज राजनीतिक विमर्श में सकारात्मक मुद्दों की अपेक्षा आरोप-प्रत्यारोप अधिक दिखाई देते हैं। सत्ता पक्ष विपक्ष पर आरोप लगाता है और विपक्ष उससे भी अधिक तीखे आरोपों के साथ जवाब देता है। आरोपों का यह सिलसिला इतना बढ़ गया है कि कई बार मूल मुद्दे ही पीछे छूट जाते हैं। जनता यह जानना चाहती है कि उसके जीवन से जुड़े प्रश्नों का समाधान क्या है, रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे बेहतर होगी, किसानों की आय और युवाओं के भविष्य को कैसे सुरक्षित किया जाएगा, अर्थव्यवस्था को गति कैसे मिलेगी और देश विकास की नई ऊंचाइयों तक कैसे पहुंचेगा। लेकिन इन प्रश्नों के स्थान पर राजनीतिक बहस अक्सर इस बात में उलझ जाती है कि किसने किस पर क्या आरोप लगाया। सबसे गंभीर चिंता तब पैदा होती है, जब आरोप लगाए जाते हैं लेकिन उनके प्रमाण सामने नहीं रखे जाते। किसी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक दल पर गंभीर आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसे प्रमाणित करना कठिन। लोकतंत्र में किसी पर आरोप लगा देना ही सत्य का प्रमाण नहीं हो सकता। आरोप यदि तथ्य पर आधारित है तो उसके समर्थन में तथ्य भी सामने आने चाहिए। यदि आरोप के पीछे कोई ठोस आधार नहीं है तो केवल राजनीतिक लाभ के लिए उसे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।

राजनीति में शब्दों का बहुत महत्व होता है। एक सामान्य व्यक्ति द्वारा कही गई बात और किसी बड़े राजनीतिक नेता द्वारा कही गई बात के प्रभाव में जमीन-आसमान का अंतर होता है। नेता का एक बयान लाखों लोगों तक पहुंचता है और समाज में धारणा बनाता है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। उन्हें बोलने से पहले सोचना चाहिए कि उनके शब्दों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण रहे हैं, जब नेताओं ने बाद में अपने आरोपों के लिए खेद व्यक्त किया या माफी मांगी। यह स्वीकार करना कि किसी आरोप में भूल हुई, लेकिन बेहतर स्थिति यह होगी कि आरोप लगाने से पहले ही उसकी पूरी पड़ताल कर ली जाए। तथ्य की पुष्टि के बाद ही सार्वजनिक मंच से कोई बात कही जाए। इससे न केवल राजनीति की विश्वसनीयता बढ़ेगी, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

दुर्भाग्य से आज राजनीति में कई बार विरोध ही राजनीति का पर्याय बनता दिखाई देता है। सरकार कोई निर्णय ले तो उसका विरोध करना, विपक्ष कोई सुझाव दे तो उसे खारिज करना, यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है। विरोध लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन विरोध का अर्थ हर बात का विरोध नहीं हो सकता। स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति होनी चाहिए, लेकिन असहमति के साथ तर्क भी होना चाहिए और विकल्प भी।

यदि किसी सरकारी योजना में कमी है तो विपक्ष को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि योजना गलत है। उसे यह भी बताना चाहिए कि वह सत्ता में होता तो उस समस्या का समाधान कैसे करता। इसी प्रकार सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की प्रत्येक बात को केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करने के बजाय उसमें मौजूद उपयोगी सुझावों पर विचार करना चाहिए। लोकतंत्र में श्रेष्ठ विचार सत्ता और विपक्ष दोनों के बीच से निकल सकते हैं।

आज देश का युवा इस पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को बहुत बारीकी से देख रहा है। तकनीक ने सूचना की दुनिया को बदल दिया है। मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से युवा कुछ ही क्षणों में किसी बयान, दावे या आरोप की पड़ताल कर सकता है। वह विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करता है, तथ्यों की तुलना करता है और अपनी राय बनाता है। इसलिए अब केवल भाषणों के माध्यम से लंबे समय तक जनता को भ्रमित करना संभव नहीं है।

निश्चित रूप से गलत सूचना कुछ समय के लिए भ्रम पैदा कर सकती है, लेकिन सत्य को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। आज की पीढ़ी सवाल करती है कि इसका स्रोत क्या है? प्रमाण क्या है? आंकड़े क्या कहते हैं? वास्तविकता क्या है? यही सवाल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं। राजनीतिक दलों को भी इस बदलती हुई जनचेतना को समझना होगा। राजनीति को यह स्वीकार करना होगा कि जनता अब केवल यह सुनना नहीं चाहती कि सामने वाला कितना गलत है। वह केवल भाषण नहीं, कार्ययोजना चाहती है। वह केवल आरोप नहीं, समाधान चाहती है।

इसलिए समय आ गया है कि राजनीतिक दल अपनी राजनीति की दिशा पर गंभीरता से विचार करें। दूसरों के दोष गिनाने से पहले अपने गिरेबान में झांकने की आदत विकसित करनी होगी। जिस राजनीतिक दल को लगता है कि उसके पास बेहतर विचार हैं, उसे उन विचारों को जनता के सामने रखना चाहिए। उसे बताना चाहिए कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, महिला सुरक्षा, युवा विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर उसकी स्पष्ट नीति क्या है।

देश को ऐसी राजनीति चाहिए जिसमें प्रतिस्पर्धा हो, लेकिन प्रतिस्पर्धा विचारों की हो। यही सकारात्मक राजनीति है।

नकारात्मक राजनीति तत्काल राजनीतिक लाभ दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में वह लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता के विश्वास को नुकसान पहुंचाती है। लगातार आरोपों से राजनीति का स्तर गिरता है और जनता के मन में यह धारणा बनने लगती है कि राजनीतिक दलों के पास एक-दूसरे को दोष देने के अलावा कोई ठोस एजेंडा नहीं है। ऐसी धारणा लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। राजनीति में आलोचना अवश्य होनी चाहिए, लेकिन आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, अपमान नहीं। प्रश्न अवश्य पूछे जाने चाहिए, लेकिन प्रश्नों के साथ तथ्य भी होने चाहिए। आरोप लगाए जाएं तो प्रमाण के साथ। असहमति हो तो तर्क के साथ। और यदि कोई गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करने का साहस भी होना चाहिए। देश इस समय अनेक अवसरों और चुनौतियों के बीच खड़ा है। वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, विज्ञान, रक्षा, शिक्षा और युवा शक्ति के क्षेत्र में नई संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। ऐसे समय में हमारी राजनीतिक ऊर्जा यदि केवल आरोप-प्रत्यारोप में खर्च होती रही तो यह देश के हित में नहीं होगा।

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन देश स्थायी होता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन भारत की यात्रा निरंतर चलती रहती है। इसलिए राजनीति का अंतिम लक्ष्य सत्ता नहीं, राष्ट्रहित होना चाहिए। जनता को भी ऐसी राजनीति के लिए प्रोत्साहित करना होगा जो तथ्यों पर बात करे, समाधान प्रस्तुत करे और समाज को जोड़ने का काम करे। नेताओं को भी यह समझना होगा कि जनता केवल तालियां बजाने के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य का निर्णय करने के लिए उन्हें सुनती है। अब समय आरोपों के शोर से बाहर निकलने का है। समय है कि राजनीति अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर लौटे। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों के साथ भविष्य की योजनाएं बताए और विपक्ष आलोचनाओं के बजाय वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करे। दोनों पक्ष जनता को यह विश्वास दिलाएं कि राजनीति केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की साझा जिम्मेदारी है। झूठ कुछ समय के लिए चर्चा पैदा कर सकता है, लेकिन सत्य ही स्थायी विश्वास बनाता है। इसलिए भारतीय राजनीति को आरोपों की राजनीति से ऊपर उठकर प्रमाण, तर्क, नीति और सकारात्मक सोच की राजनीति को अपनाना होगा। देश को नकारात्मकता नहीं, नई ऊर्जा चाहिए। देश को आरोप नहीं, समाधान चाहिए। विरोध के लिए विरोध नहीं, स्वस्थ संवाद चाहिए। और सबसे बढ़कर देश को ऐसी राजनीति चाहिए जो सत्ता से पहले राष्ट्र और राजनीति से पहले जनहित को रखे। यही लोकतंत्र की गरिमा है, यही राजनीति की सार्थकता है और यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत आधारशिला भी।