प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
हर युग अपनी पहचान अपने निर्माणों से छोड़ता है; लेकिन आने वाला समय यह पूछेगा कि इन निर्माणों ने इंसान की जिंदगी को कितना बेहतर बनाया। पुराने इंजीनियरों ने सड़कें, बाँध, रेल और कारखाने बनाए; नई पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और डिजिटल दुनिया रच रही है। कभी उसके हाथ में मिट्टी, पत्थर और लोहा था, आज डेटा, एल्गोरिद्म और स्क्रीन हैं। साधन बदल गए, जिम्मेदारी वही है—तकनीक जीवन आसान बनाए, इंसान को उसका गुलाम नहीं। इंजीनियर्स डे केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, भविष्य की दिशा तय करने का अवसर है। हर नए निर्माण से पहले सवाल होना चाहिए—“क्या यह केवल बन सकता है, या बनना भी चाहिए?” क्योंकि राष्ट्र की वास्तविक प्रगति निर्माणों की ऊँचाई से नहीं, लोगों के सुरक्षित, सम्मानजनक और बेहतर जीवन से मापी जाती है।
पुराने इंजीनियरों का समय कम चमकीला था, शायद इसलिए उनमें चमक अधिक थी। वे नदी के किनारे उसकी चाल समझते, खेतों की धूल में उतरते, पहाड़ काटते और नींव में जाकर देखते थे कि धरती कितना भार सह सकती है। उनकी गणना में बारिश, पानी, मिट्टी और भार का हिसाब होता था; ठेकेदार का कमीशन नहीं। वे सड़क बनाते थे तो श्रेय सड़क को देते थे, खुद को नहीं। उनकी डायरी में आँकड़े थे, आत्मप्रचार नहीं। राष्ट्र उनके लिए कोई प्रस्तुति नहीं, निर्माणाधीन जिम्मेदारी था। वे जानते थे कि एक गलत कोण वर्षों की मेहनत को मलबे में बदल सकता है। इसलिए इंजीनियरिंग उनके लिए नौकरी नहीं, जिम्मेदारी थी।
आज का इंजीनियर भी कम प्रतिभाशाली नहीं; उसके औजार बदल गए हैं। वह ऐसी दुनिया रच रहा है जहाँ शहर, घर और फोन स्मार्ट हैं—कभी-कभी मनुष्य को छोड़कर। ऐप एक क्लिक में खाना पहुँचा देता है, पर यह नहीं पूछता कि उसे खरीदने की क्षमता कितनों के पास है। स्मार्ट सिटी के कैमरे हर चेहरा पहचान लेते हैं, पर पानी की कतार में खड़े चेहरे को नहीं। डेटा समुद्र-सा बढ़ रहा है, समझ कुएँ-सी सूख रही है। पुराने इंजीनियर बाँध बनाकर बाढ़ रोकते थे; आज के इंजीनियर उसका लाइव डैशबोर्ड बना सकते हैं। सुविधा बढ़ी है, पर क्या मनुष्य भी उतना ही सुरक्षित, सम्मानित और सुखी हुआ है?
इंजीनियरिंग का विचित्र विरोधाभास है—इंजीनियर सुविधा बनाता है और फिर उसका गुलाम बन जाता है। पहले सर्वे के लिए धूप में चलना पड़ता था, अब उपग्रह तस्वीर भेज देता है। पहले रस्सी और पैमाने से नापते थे, अब सेंसर है। पहले चिट्ठी जाती थी, अब संदेश सेकंड में पहुँचता है। फिर भी मनुष्य के पास एक-दूसरे के लिए समय कम है। पहले प्रोजेक्ट की सफलता थी—सड़क टिके, पुल भार सहे और बिजली गाँव पहुँचे। अब उसमें प्रस्तुति, ब्रांडिंग, निवेश और लाइक्स भी जुड़ गए हैं। पहले इंजीनियर पूछता था—“यह टिकेगा कितने साल?” आज बाजार पूछता है—“यह बिकेगा कितने दिन?” गणित वही है, पर गणना का उद्देश्य बदल गया है।
इंजीनियर समस्या हल करता है, यही उसकी ताकत है; हर समाधान नई समस्या भी ला सकता है, यही उसकी चुनौती है। नहरों से खेत हरे हुए, पर विकास का लाभ सब तक नहीं पहुँचा। इंटरनेट ने ज्ञान की दीवारें तोड़ीं, तो अफवाहों के दरवाजे भी खोल दिए। मशीन ने श्रम घटाया, पर निर्भरता बढ़ा दी। एल्गोरिद्म हमारी पसंद समझने लगा और धीरे-धीरे तय भी करने लगा। इंजीनियर ने मशीन बनाई, मशीन ने आदत बनाई और आदत ने मनुष्य को उपयोगकर्ता बना दिया। यह प्रगति है या उसका विज्ञापन—फैसला विवेक करेगा। क्योंकि जो तकनीकी रूप से संभव है, जरूरी नहीं कि सामाजिक रूप से उचित भी हो।
आज इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी जरूरत नई मशीन नहीं, पुरानी नैतिकता है। पुल की डिजाइन में भार की सीमा तय होती है; समाज पर लालच, लापरवाही और स्वार्थ का भार कौन तय करेगा? कोड में गलती हो तो सिस्टम रुकता है, चरित्र में हो तो व्यवस्था चलती रहती है—गलत दिशा में। भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण और कागज पर पूरे, जमीन पर अधूरे प्रोजेक्ट मनुष्य की त्रुटियाँ हैं। इंजीनियर को तकनीकी दक्षता के साथ सामाजिक विवेक चाहिए। नक्शे पर सीधी रेखा आसान है, पर उसके रास्ते में घर, खेत, पेड़ और लोगों की जिंदगी होती है। असली इंजीनियर वही है, जिसकी गणना में इंसान की सुरक्षा और गरिमा भी हो।
पंद्रह सितंबर केवल इंजीनियरों को “राष्ट्र निर्माता” कहने का दिन नहीं; यह पूछने का दिन है—राष्ट्र किसका बन रहा है और उसमें कौन सुरक्षित रहेगा? पुराने इंजीनियरों ने लोहे-सीमेंट से भारत की आधारभूत संरचना खड़ी की; नए इंजीनियरों को डेटा-तकनीक से उसका मानवीय भविष्य बनाना है। पुल किनारों के साथ समुदायों को जोड़ें; तकनीक समय बचाने के साथ जीवन बेहतर करे। इंजीनियर की असली परीक्षा मशीन में नहीं, लोगों की जिंदगी में आए बदलाव में है। सबसे बड़ी उपलब्धि नाम वाली परियोजना नहीं, बल्कि वह जीवन है जो उसके काम से अधिक सुरक्षित, सक्षम और सम्मानजनक हुआ हो।
आखिर इंजीनियरिंग की सबसे कठिन गणना है—तकनीक की दौड़ में मनुष्य कितना बचा? पुल की मजबूती स्टील, भवन की कंक्रीट और सर्वर की क्षमता डेटा से मापी जा सकती है; लेकिन सभ्यता की मजबूती संवेदना से। इंजीनियर के सामने चुनौती केवल तकनीकी समाधान की नहीं, यह तय करने की भी है कि वह समाज और मनुष्य के लिए कितना उपयोगी, सुरक्षित और न्यायपूर्ण है। हर नई तकनीक सुविधा के साथ निर्भरता और जोखिम भी लाती है। अब फैसला है—तकनीक मनुष्य की सहायक बनेगी या मनुष्य उसका पुर्जा? इंजीनियर्स डे पर सम्मान यही होगा कि हर नया ढाँचा खड़ा करने से पहले इंजीनियर पूछे—“क्या यह केवल बन सकता है, या बनना भी चाहिए?” क्योंकि राष्ट्र की मजबूत इमारत वही है, जिसकी नींव में तकनीक के साथ मनुष्यता भी सुरक्षित हो।





