ईश्वरचंद्र विद्यासागर: समाज सुधार के अग्रदूत

Ishwar Chandra Vidyasagar: A Pioneer of Social Reform

श्वेता गोयल

‘अपना काम स्वयं करो’ सिद्धांत के प्रवर्तक ईश्वरचंद्र विद्यासागर नारी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे, जिन्होंने सदैव लोगों को अपने क्रियाकलापों के माध्यम से स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की सीख दी। भारतीय इतिहास में उन्हें एक महान शिक्षक, फिलॉसोफर और समाज सुधारक जैसे कई रूपों में याद किया जाता है। अपने सादा जीवन, निडर स्वभाव, आत्म-बलिदान की भावना, शिक्षा के प्रति समर्पण और दलितों के हित के लिए किए गए कार्यों के कारण ईश्वरचंद्र विद्यासागर पूरी दुनिया के लिए एक महान व्यक्ति बन गए थे। संस्कृत कॉलेज में उन्होंने आधुनिक पश्चिमी विचारों के अध्ययन की शुरुआत की और तथाकथित निचली जातियों के छात्रों को संस्कृत का अध्ययन करने के लिए प्रवेश दिया। संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध ज्ञान होने के कारण उनकी महान विद्वता के लिए कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज, जिसके बाद में वे कुछ वर्षों तक प्रिंसिपल भी रहे, ने ही उन्हें विद्यार्थी जीवन में ही ‘विद्यासागर’ की उपाधि से सम्मानित किया था। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए जीवन पर्यन्त प्रयास किया। बांग्ला भाषा के गद्य को सरल और आधुनिक बनाने का उनका कार्य भी सदैव याद किया जाएगा। उन्होंने बांग्ला लिपि की वर्णमाला को सरल और तर्कसम्मत बनाया तथा बांग्ला पढ़ाने के लिए सैंकड़ों विद्यालय स्थापित किए और रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की।

नारी शिक्षा के लिए तो ईश्वरचंद्र ने व्यापक जनान्दोलन खड़ा किया ही था, उन्हीं के निरंतर प्रयासों और दृढ़संकल्प की बदौलत ही वर्ष 1856 में ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज सरकार विधवा पुनर्विवाह कानून पारित करने को विवश हुई थी, जिसके बाद भारतीय समाज में विधवाओं को नए सिरे से जीवन की शुरूआत कर सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त हुआ था। दरअसल उस समय हिंदू समाज में विधवाओं की स्थिति काफी चिंताजनक थी। 1820 में जिस समय वह बंगाल में पैदा हुए थे, उन दिनों समाज में अनेक कुरीतियां जड़ें जमाई हुई थी, जिनमें एक थी विधवा होने वाली महिलाएं या सती होने के लिए बाध्य की जाती थी या फिर उनका वैधव्य जीवन बेहद उपेक्षित और दयनीय स्थिति में बीतता था। ईश्वर चंद्र ही वह शख्सियत थे, जिन्होंने तमाम विरोधों के बाद भी न केवल बंगाल में विधवाओं का विवाह कराया बल्कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार को इस बारे में कानून बनाने के लिए भी बाध्य किया। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए लोकमत तैयार किया और उनके अटूट प्रयासों की बदौलत ही ‘विधवा पुनर्विवाह कानून’ पारित हो सका था। वह कानून पारित होने के तीन महीने बाद ही उन्होंने एक विधवा कमलादेवी का विवाह प्रतिष्ठित घराने के एक युवक के साथ कराया था, जो बंगाल का पहला विधवा विवाह था। उन्होंने 25 विधवाओं का पुनर्विवाह 1856-60 के बीच सम्पन्न कराया। यही नहीं, अपने इकलौते पुत्र नारायण का विवाह भी एक विधवा से कराकर समस्त उन्होंने भारतीय समाज के समक्ष कथनी और करनी के भेद को खत्म करने की अविस्मरणीय मिसाल पेश की थी।

पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले में धार्मिक प्रवृत्ति के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 26 सितम्बर 1820 को जन्मे ईश्वरचंद्र विद्यासागर जीवन पर्यन्त नैतिक मूल्यों के संरक्षक माने जाते रहे। वास्तव में वे एक ऐसी महान् शख्सियत थे, जिन्होंने नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ-साथ बहुपत्नी प्रथा और बहु-विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई। वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक नारी उत्थान के प्रबल समर्थक रहे। उनके अथक प्रयासों से ही कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल में कई स्थानों पर कई बालिका विद्यालयों की स्थापना हुई थी और उन्होंने कलकत्ता में मेट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना भी की थी। नारी शिक्षा के लिए गंभीर प्रयास करते हुए उन्होंने बैठुने स्कूल की स्थापना की और करीब तीन दर्जन स्कूल खुलवाए। इतना ही नहीं, इन स्कूलों के संचालन के लिए पूरे खर्च की जिम्मेदारी भी उन्होंने स्वयं उठाई थी। दरअसल स्कूलों के खर्च के लिए वे विशेष रूप से स्कूली बच्चों के लिए बंगाली में लिखी गई किताबों की बिक्री से फंड जुटाते थे। स्थानीय बांग्ला भाषा तथा लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंने स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कलकत्ता में मैट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना भी की थी। ब्रिटिश शासनकाल में ऐसे कॉलेज विरले ही होते थे, जिनका संचालन पूर्ण रूप से भारतीयों के ही हाथों में हो और जहां पढ़ाने वाले सभी शिक्षक भी भारतीय ही हों किन्तु ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने कोलकाता में वर्ष 1872 में विद्यासागर कॉलेज की स्थापना कर यह कारनामा भी कर दिखाया था।

बंगाल समाज के लिए किए गए इसी प्रकार के अनेक कार्यों की वजह से ही उन्हें बंगाल पुनर्जागरण का प्रमुख स्तंभ माना जाता है। समाज सुधार तथा समाज की भलाई के लिए किए जाने वाले कार्यों के चलते ही उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक तथा महान् समाज सुधारक के रूप में जाना जाने लगा। भारतीय समाज में आज भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर को स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, लेखक, शिक्षाविद्, दार्शनिक इत्यादि अनेक रूपों में स्मरण किया जाता है। 29 जुलाई 1891 को यह महान् शख्सियत हमेशा के लिए अटल शून्य में विलीन हो गई। हमेशा समाज की भलाई के लिए सोचने और समाज के लिए कुछ अलग करते रहने के कारण ही उन्हें एक महान् समाज सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी भी माना जाता रहा है। नैतिक मूल्यों के संरक्षक और महान शिक्षाविद विद्यासागर का मानना था कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं के ज्ञान का समन्वय करके ही भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठ को हासिल किया जा सकता है।