एनटीए में बदलाव: परीक्षा व्यवस्था के संकट से भरोसा बहाली तक की चुनौती

Changes at NTA: The challenge of restoring trust amidst the crisis in the examination system

बिशन पपोला

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एन टी ए में हालिया व्यापक बदलावों को केवल प्रशासनिक फेरबदल के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। 50 से अधिक कर्मचारियों को हटाने और महत्वपूर्ण पदों पर नए विशेषज्ञों की नियुक्ति का फैसला उस गहरे संकट की ओर संकेत करता है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में देश की परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। यह संकट सिर्फ एक सरकारी एजेंसी की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में वे लाखों विद्यार्थी हैं, जिनके लिए एक परीक्षा केवल कुछ घंटों की प्रक्रिया नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, उम्मीद और भविष्य का आधार होती है। इसलिए एन टी ए में सुधार की असली कसौटी यह नहीं होगी कि कितने लोगों को बदला गया, बल्कि यह होगी कि क्या इससे परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जवाबदेही वास्तव में बढ़ती है।

एन टी ए इस समय एक बार फिर यू जी सी नेट को लेकर सवालों के घेरे में है। एजेंसी ने हाल ही में इंग्लिश, कॉमर्स और सोशियोलॉजी के प्रश्नपत्रों में कई तरह की त्रुटियों की जानकारी दी। प्रश्नों के दोहराव के साथ तथ्यात्मक, टाइपिंग और अनुवाद संबंधी गलतियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि देश की महत्वपूर्ण परीक्षाओं के प्रश्नपत्र तैयार करने और उनकी अंतिम समीक्षा की व्यवस्था कितनी मजबूत है। किसी सामान्य परीक्षा में भी इस स्तर की गलतियां गंभीर मानी जाएंगी, लेकिन जब परीक्षा राष्ट्रीय स्तर की हो और उसमें लाखों अभ्यर्थी शामिल हों, तब ऐसी चूक का प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो जाता है। एक गलत प्रश्न केवल एक तकनीकी गलती नहीं होता; वह किसी विद्यार्थी के अंक, रैंक और अवसर को प्रभावित कर सकता है।

यही कारण है कि एन टी ए के मौजूदा संकट को केवल किसी एक परीक्षा की गड़बड़ी के रूप में देखना सही नहीं होगा। एजेंसी की स्थापना 2017 में इस उद्देश्य से की गई थी कि देश की महत्वपूर्ण प्रवेश और पात्रता परीक्षाओं को अधिक पेशेवर, वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से संचालित किया जा सके।

इसके पीछे विचार यह था कि परीक्षा संचालन के लिए एक ऐसी विशेषज्ञ संस्था विकसित की जाए, जो बड़े पैमाने पर परीक्षाएं कराने के साथ-साथ तकनीक और आधुनिक मूल्यांकन प्रणालियों का प्रभावी इस्तेमाल कर सके। लेकिन समय के साथ NTA से जुड़ी कई घटनाओं ने इस भरोसे को चुनौती दी। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, तकनीकी गड़बड़ियां, परिणामों को लेकर विवाद और पेपर लीक जैसे मुद्दों ने यह स्पष्ट किया कि परीक्षा व्यवस्था को केवल तकनीकी क्षमता के आधार पर सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता।

हालिया बदलाव इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सी टी ओ और सी एफ ओ जैसे पदों पर विशेषज्ञों की नियुक्ति तथा साइबर सिक्योरिटी, साइकोमेट्रिक्स और प्रश्नपत्र डिजाइन जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को शामिल करने की पहल यह संकेत देती है कि सरकार और एजेंसी अब परीक्षा प्रणाली को अधिक पेशेवर ढांचे में ले जाने की कोशिश कर रही हैं। यह बदलाव जरूरी भी है। आज की परीक्षा व्यवस्था केवल प्रश्नपत्र छापने और परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने का काम नहीं रह गई है। इसमें डिजिटल सिस्टम, डेटा सुरक्षा, एन्क्रिप्शन, सर्वर क्षमता, उम्मीदवारों के डेटा की सुरक्षा, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता, परीक्षा केंद्रों की निगरानी और परिणामों के वैज्ञानिक मूल्यांकन जैसे कई स्तर शामिल हैं।

विशेष रूप से साइबर सुरक्षा अब परीक्षा व्यवस्था का एक केंद्रीय हिस्सा बन चुकी है। प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर परीक्षा शुरू होने तक उसके डिजिटल और भौतिक स्वरूप की सुरक्षा के लिए कई स्तरों पर सुरक्षा प्रोटोकॉल की जरूरत है। इसमें किसी एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय एक ऐसा सिस्टम जरूरी है, जिसमें किसी एक स्तर की विफलता पूरी व्यवस्था को प्रभावित न कर सके। इसी तरह साइकोमेट्रिक्स की विशेषज्ञता परीक्षा के प्रश्नों की गुणवत्ता और उनके कठिनाई स्तर के वैज्ञानिक मूल्यांकन में मदद कर सकती है। प्रश्नपत्र डिजाइन में विशेषज्ञता यह सुनिश्चित कर सकती है कि सवाल स्पष्ट हों, पाठ्यक्रम के अनुरूप हों और उनमें अनावश्यक अस्पष्टता या दोहराव न हो।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल विशेषज्ञों की नियुक्ति से आगे का है। विशेषज्ञ आ जाने मात्र से व्यवस्था विशेषज्ञ नहीं बन जाती। उनकी विशेषज्ञता को संस्थागत प्रक्रिया में बदलना होगा। यदि निर्णय लेने की पुरानी शैली, कमजोर निगरानी और अस्पष्ट जवाबदेही बनी रहती है, तो नए पद और नए चेहरे भी अपेक्षित बदलाव नहीं ला पाएंगे। इसलिए NTA को मानव संसाधन में बदलाव के साथ अपनी पूरी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी होगी।

नीट पेपर लीक मामले में सीबीआई की चार्जशीट में कथित तौर पर विषय विशेषज्ञों की भूमिका का उल्लेख भी इस चुनौती को रेखांकित करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल विशेषज्ञों को व्यवस्था में शामिल करना पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञता के साथ सत्यनिष्ठा, स्वतंत्रता, निगरानी और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। जिस व्यक्ति के पास प्रश्नपत्र की जानकारी या परीक्षा प्रक्रिया तक विशेष पहुंच है, उसके लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल और हितों के टकराव से जुड़े नियम बेहद स्पष्ट होने चाहिए। परीक्षा प्रणाली में भरोसा तभी बन सकता है, जब इसमें शामिल हर व्यक्ति की भूमिका और उसकी जवाबदेही पहले से तय हो।

सबसे बड़ी जरूरत एक ऐसी एंड-टू-एंड जवाबदेही व्यवस्था की है, जिसमें प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर परिणाम घोषित होने तक हर चरण का रिकॉर्ड और जिम्मेदारी स्पष्ट हो। प्रश्नपत्र किसने तैयार किया, किसने समीक्षा की, किसने अंतिम मंजूरी दी, उसे किसने सुरक्षित किया, परीक्षा केंद्र तक उसकी पहुंच कैसे हुई, परीक्षा केंद्र पर निगरानी किस तरह की गई और किसी शिकायत की स्थिति में निर्णय किस स्तर पर लिया गया—इन सभी सवालों के जवाब व्यवस्था के भीतर मौजूद होने चाहिए। जवाबदेही का अर्थ केवल गलती होने के बाद किसी कर्मचारी या अधिकारी पर कार्रवाई करना नहीं है। वास्तविक जवाबदेही वह है जिसमें संभावित गलती को पहले ही रोकने के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाई जाए।

इसी के साथ शिकायत निवारण प्रणाली को भी अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है। परीक्षा से जुड़े विवादों में विद्यार्थी अक्सर सबसे कमजोर पक्ष होता है। वह न तो प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया देख सकता है और न ही परीक्षा संचालन की आंतरिक व्यवस्था। उसके पास केवल अपनी मेहनत और परिणाम होता है।

इसलिए यदि किसी प्रश्न, परीक्षा केंद्र, परिणाम या प्रक्रिया को लेकर गंभीर शिकायत सामने आती है, तो उसका समयबद्ध और स्वतंत्र तरीके से परीक्षण होना चाहिए। विद्यार्थियों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी शिकायत केवल एक ऑनलाइन फॉर्म बनकर सिस्टम में गुम नहीं होगी।
NTA के लिए एक और महत्वपूर्ण चुनौती पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाने की है। प्रश्नपत्र की सुरक्षा बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन परीक्षा के बाद प्रक्रिया से जुड़े जरूरी सवालों के जवाब भी सार्वजनिक होने चाहिए।

पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक कर दी जाए। इसका अर्थ यह है कि एजेंसी अपनी प्रक्रियाओं, मानकों और गलती होने पर सुधारात्मक कदमों के बारे में पर्याप्त जानकारी दे, ताकि विद्यार्थियों और समाज को यह समझ में आए कि व्यवस्था किस तरह काम करती है।

दरअसल, परीक्षा प्रणाली में भरोसा एक बार टूटने के बाद केवल एक प्रेस विज्ञप्ति से वापस नहीं आता। उसे लगातार बेहतर प्रदर्शन से अर्जित करना पड़ता है। एन टी ए को आने वाले समय में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए नियमित ऑडिट, स्वतंत्र सुरक्षा परीक्षण, प्रश्नपत्रों की बहुस्तरीय समीक्षा और परीक्षा केंद्रों की निगरानी जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा। साथ ही, परीक्षा के बाद सामने आने वाली हर बड़ी त्रुटि से सीख लेकर प्रक्रिया में स्थायी बदलाव करना होगा।

यह भी समझना होगा कि देश की परीक्षा व्यवस्था केवल एन टी ए की जिम्मेदारी नहीं है। विश्वविद्यालयों, परीक्षा केंद्रों, तकनीकी एजेंसियों, प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों और संबंधित सरकारी संस्थाओं की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। एक कमजोर कड़ी पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। इसलिए सुधार किसी एक संस्था तक सीमित नहीं होना चाहिए। परीक्षा संचालन के पूरे इकोसिस्टम के लिए साझा मानक और जवाबदेही तय करना समय की जरूरत है।

एन टी ए में 50 से अधिक कर्मचारियों को हटाना और नई विशेषज्ञता को शामिल करना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मानना जल्दबाजी होगी। यह सुधार की शुरुआत हो सकती है, मंजिल नहीं। असली बदलाव तब दिखाई देगा, जब परीक्षा से जुड़ी छोटी से छोटी तकनीकी त्रुटि को भी गंभीरता से लिया जाएगा, बड़ी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदारी तय होगी और विद्यार्थियों को बार-बार यह महसूस नहीं होगा कि उनकी मेहनत किसी प्रशासनिक या तकनीकी चूक के कारण जोखिम में पड़ सकती है।

आखिरकार, देश की परीक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं, बल्कि अवसर की समानता सुनिश्चित करना है। एक विद्यार्थी जब परीक्षा केंद्र में बैठता है, तो उसे विश्वास होना चाहिए कि उसके सामने रखा गया प्रश्नपत्र निष्पक्ष है, परीक्षा प्रक्रिया सुरक्षित है और उसके प्रदर्शन का मूल्यांकन बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के होगा। यही विश्वास प्रतियोगी परीक्षाओं की आत्मा है। एन टी ए में मौजूदा बदलाव तभी सफल माने जाएंगे, जब वे इसी विश्वास को मजबूत करने में कामयाब हों। नई नियुक्तियां, बेहतर तकनीक और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और संस्थागत ईमानदारी को केंद्र में रखना उससे भी ज्यादा जरूरी है। परीक्षा व्यवस्था का सुधार अंततः तकनीक या प्रशासन का नहीं, बल्कि करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य के प्रति जिम्मेदारी का सवाल है।