ऐतिहासिक पाप विकसित देशों का, तो पर्यावरण का आर्थिक और सामाजिक दंड भारत क्यों भुगते?

Historical sin of developed countries, so why should India suffer the economic and social punishment of environment?

अशोक भाटिया

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण आज इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े वैश्विक विमर्श बन चुके हैं। दुनिया भर के नीति-निर्माता, वैज्ञानिक और राष्ट्राध्यक्ष साल-दर-साल बड़े-बड़े सम्मेलनों में बैठते हैं, पर्यावरण को बचाने की कसमें खाते हैं और नई प्रतिबद्धताओं के घोषणापत्र जारी करते हैं। लेकिन इन भव्य आयोजनों की चमक-दमक के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जिसे वैश्विक मंचों पर अक्सर दबाने की कोशिश की जाती है। यह कड़वा सच है ‘जलवायु न्याय’ का अभाव और विकसित देशों का वह ऐतिहासिक पाखंड, जिसने आज पूरी दुनिया को विनाश की कगार पर ला खड़ा किया है। सदियों से चले आ रहे इस पाखंड को दुनिया के सामने पूरी तार्किकता और आक्रामकता के साथ बेनकाब करने का काम हाल ही में भारत ने किया है। जर्मनी में आयोजित ‘बर्लिन ग्लोबल डायलॉग’ के प्रतिष्ठित मंच से भारत के केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों पर जो तीखा प्रहार किया, उसने वैश्विक पर्यावरण राजनीति की चूलें हिला दी हैं। पीयूष गोयल ने बिना किसी हिचकिचाहट के विकसित देशों के प्रतिनिधियों के सामने यह स्पष्ट और दो-टूक सवाल दागा कि आखिर इस पूरी गड़बड़ी के लिए असली जिम्मेदार कौन है। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि ओजोन परत को नुकसान किसने पहुंचाया, वातावरण में यह सारा जहरीला कार्बन किसने भेजा, यह पूरी समस्या पश्चिमी और विकसित देशों की ही पैदा की हुई है। पीयूष गोयल का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उन अरबों लोगों की आवाज है जो बिना किसी गलती के विकसित देशों के ऐतिहासिक पापों का सामाजिक और आर्थिक दंड भुगतने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं।

यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें और औद्योगिक क्रांति के दौर से लेकर आज तक के आंकड़ों का निष्पक्ष विश्लेषण करें, तो जिम्मेदार और पीड़ित का अंतर साफ नजर आता है। आज जो देश खुद को पर्यावरण का मसीहा घोषित कर रहे हैं और विकासशील देशों को उपदेश दे रहे हैं, उन्होंने अपनी समृद्धि की इमारत जीवाश्म ईंधन की अंधाधुंध भट्टी पर खड़ी की है। यूरोप और अमेरिका ने सदियों तक कोयले, तेल और गैस का बेतहाशा इस्तेमाल करके अपने उद्योगों को चमकाया, अपने नागरिकों को विलासिता का जीवन दिया और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत किया। उस दौर में न तो उन्हें कार्बन उत्सर्जन की चिंता थी और न ही पृथ्वी के बढ़ते तापमान की। आज वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैसों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं विकसित देशों की ऐतिहासिक देन है। दूसरी ओर, भारत जैसे देश का इतिहास देखें, तो हमारी संस्कृति और जीवनशैली हमेशा से प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने की रही है। आंकड़ों के आईने में यह सच साफ झलकता है कि भारत दुनिया की लगभग सत्रह प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन वैश्विक ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन में हमारा योगदान तीन प्रतिशत से भी कम है। वर्तमान में भी एक औसत भारतीय का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन, किसी भी यूरोपीय या अमेरिकी नागरिक के उत्सर्जन के मुकाबले एक बेहद छोटा हिस्सा मात्र है। ऐसे में यह सवाल उठना पूरी तरह न्यायसंगत है कि जिस औद्योगिक विकास की मलाई विकसित देशों ने खाई, उसका सामाजिक और आर्थिक दंड भारत का गरीब किसान, मजदूर और आम नागरिक क्यों भुगते।

वैश्विक मंचों पर जब भी पर्यावरण संरक्षण के नियमों की बात आती है, तो विकसित देश बड़ी चतुराई से ‘समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों’ के सिद्धांत को दरकिनार करने की कोशिश करते हैं। साल २०१५ के ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते में इस सिद्धांत को कानूनी रूप से स्वीकार किया गया था, जिसका सीधा मतलब था कि जिन्होंने पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, वे इसके सुधार के लिए ज्यादा वित्तीय और तकनीकी जिम्मेदारी उठाएंगे। इसी समझौते के तहत विकसित देशों ने वादा किया था कि वे विकासशील और गरीब देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए हर साल १०० अरब डॉलर की ‘क्लाइमेट फंडिंग’ प्रदान करेंगे। लेकिन इस वादे की हकीकत क्या है, इसे भी केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बेहद मुखरता से दुनिया के सामने रखा। उन्होंने साफ किया कि इस वादे को एक दशक से भी ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन जमीन पर पश्चिमी देशों की तरफ से वित्तीय सहायता की डिलीवरी पूरी तरह शून्य रही है। विकसित देशों ने न केवल अपने वित्तीय वादों से पल्ला झाड़ लिया है, बल्कि वे अब तकनीक के हस्तांतरण में भी कड़ा रुख अपना रहे हैं। जब भारत जैसे देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वच्छ तकनीकों की मांग करते हैं, तो उन्हें महंगी दरों और बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के मकड़जाल में उलझा दिया जाता है। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि विकसित देश पर्यावरण को लेकर गंभीर होने का सिर्फ नाटक करते हैं, जबकि उनका असली मकसद विकासशील देशों की आर्थिक रफ्तार को रोकना होता है।

इस वित्तीय और तकनीकी धोखाधड़ी के बाद भी विकसित देश यहीं नहीं रुके हैं। यूरोपीय संघ द्वारा लागू किया जा रहा ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ यानी कार्बन टैक्स इसका सबसे ताजा और क्रूर उदाहरण है। इस नए नियम के तहत, यूरोप उन देशों से आने वाले स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे उत्पादों पर भारी टैक्स लगाने जा रहा है, जहां उत्पादन के दौरान कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। पीयूष गोयल ने इस नीति की कड़ी आलोचना करते हुए इसे पूरी तरह से अनुचित और व्यापारिक भेदभाव की दीवार करार दिया है। एक तरफ तो पश्चिमी देश भारत को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिए वित्तीय मदद और सस्ती तकनीक नहीं देते, और दूसरी तरफ वे भारतीय उद्योगों पर कार्बन टैक्स लगाकर उनके निर्यात को पंगु बनाने की साजिश रचते हैं। यह भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं पर लगाया जाने वाला एक ऐसा सामाजिक और आर्थिक दंड है, जिसकी कोई कानूनी या नैतिक वैधता नहीं हो सकती। इसे यदि ‘हरित उपनिवेशवाद’ कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, जहां पर्यावरण संरक्षण के नाम पर गरीब और विकासशील देशों के आर्थिक विकास का गला घोंटा जा रहा है।

भारत के सामने आज चुनौतियां दोहरी और बेहद जटिल हैं। एक तरफ हमें अपनी १.४ अरब से अधिक की आबादी को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालना है, उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करने हैं, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और चौबीसों घंटे बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचानी हैं। इन सब कार्यों के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। दूसरी तरफ, वैश्विक दबाव और हमारी अपनी नैतिक प्रतिबद्धताओं के कारण हमें कार्बन उत्सर्जन को भी कम करना है। इस दोहरे मोर्चे पर भारत बिना किसी बड़ी बाहरी वित्तीय सहायता के जो काम कर रहा है, वह दुनिया के लिए एक मिसाल है। भारत आज वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा और सबसे तेज स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम चला रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अब ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत ने जो प्रगति की है, उसने दुनिया को अचंभित किया है। हमने अपनी स्थापित बिजली क्षमता का एक बड़ा हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य समय से पहले ही पूरा कर लिया है। लेकिन इस अभूतपूर्व प्रयास की एक बड़ी आर्थिक कीमत भारत को अपने आंतरिक संसाधनों से चुकानी पड़ रही है। जो पैसा देश के स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर खर्च होना चाहिए था, उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा हमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेअसर करने और स्वच्छ ऊर्जा ढांचे को खड़ा करने में लगाना पड़ रहा है।

अंततः, यह पूरी बहस इस बात पर आकर टिकती है कि क्या विश्व वास्तव में पर्यावरण को बचाना चाहता है या यह सिर्फ अमीर देशों द्वारा गरीब देशों को दबाने का एक नया हथियार है। यदि विकसित देशों की नीयत साफ है, तो उन्हें खोखली बयानबाजी और खोखले वादों के दायरे से बाहर आना होगा। उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि अतीत में उनके द्वारा किए गए अंधाधुंध दोहन के कारण ही आज पूरी मानवता संकट में है। पीयूष गोयल का बर्लिन में दिया गया वक्तव्य वैश्विक राजनीति के लिए एक वेक-अप कॉल है, जो यह याद दिलाता है कि भारत अब किसी भी ऐसे अन्यायपूर्ण समझौते को स्वीकार नहीं करेगा जो उसके नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक हितों के खिलाफ हो। पर्यावरण को बचाने की लड़ाई केवल विकासशील देशों के कंधों पर बंदूक रखकर नहीं लड़ी जा सकती। यदि पश्चिमी देश वास्तव में इस धरती को सुरक्षित देखना चाहते हैं, तो उन्हें बिना किसी शर्त के सस्ती, सुलभ तकनीक और वित्तीय सहायता विकासशील देशों को हस्तांतरित करनी होगी। जब तक ‘क्लाइमेट जस्टिस’ को इस वैश्विक लड़ाई का मूल आधार नहीं बनाया जाता, तब तक पर्यावरण संरक्षण के नाम पर की जाने वाली हर कोशिश बेईमानी होगी और भारत जैसे देश अपने विकास के अधिकार की रक्षा के लिए हर मंच पर इसी तरह अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे।